क्या स्मार्टसिटी धर्मशाला के पास गरीबों के लिए नहीं कोई जगह ?

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शिमला- जितनी मशकत हिमाचल के नेताओं और सरकार ने धर्मशाला को स्मार्ट सिटी की पदवी हासिल कराने में लगाई उससे बहूत कम समय और उर्जा लगी जिला प्रशासन की इस शहर की पैंतीस साल पुरानी बस्ती को उजाड़ने में! स्मार्ट सिटी बनने का मामला तो करोड़ों रुपयों का है पर धर्मशाला की सबसे गरीब जनता को सस्ते में निपटा दिया गया!

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17 जून को धर्मशाला नगर निगम ने लगभग 300 परिवारों की चरान खड्ड में बनी झुग्गियों पर बुलडोज़र चला दिया! शहर की मेयर रजनी देवी का कहना है की यह काम “बेरहमी से नहीं किया गया” बल्कि बड़े प्यार से 16 मई को दस दिन की महुलत देते हुए धर्मशाला नगर निगम ने बस्ती को खाली करने के अादेश दिए!

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Photo: Akshay Jasrotia

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Photo: Akshay Jasrotia

हालाकी इसके विरोध में शिमला उच्चय न्यायालय का दरवाजा चरान खड्ड के निवासियों ने ज़रूर खटखटाया ! न्यायालय ने फैसला सरकार पर छोड़ दिया और जिला प्रशाशन ने लोगो को यह अश्वासन देते हुवे मामला अागे बढ़ाया की उनका पुनर्वास किया जाएगा। कोर्ट का फैसला 24 मई को अाया और जून के पहले हफ्ते में नगर निगम ने झुग्गियों को हटाने का नोटिस जारी कर दिया! अादेश में बस्ती को हटाने के पीछे की वजह यह बताई गई की यहां के लोग खुले में शौच करते हैं जिससे महामारी फैलेने का खतरा हो सकता है! इस तर्क का खोकलापन साबित करने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की अावश्यकता भी नही। यदि उंगली में चोट हो तो हाथ नही काटा जाता। स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर जो लाखों रुपये शौचालय बनाने के लिए केंद्र सरकार ने दिए हैं वो अाखिर किस काम में लग रहे हैं ये एक महत्वपूर्ण सवाल है जो कोई नहीं पूछ रहा।


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चरान खड के बाशिंदों को पुनर्वास के नाम पर बिना किसी प्रक्रिया या कार्यवाही के बड़े ही अनौपचारिक रूप से तीन अलग गावों गमरू, पास्सू और सर्रां में खाली ज़मीन दिखा के बोला गया ‘यहाँ बस जाओ’! इन गांवो के स्थानीय लोगों ने बिफर कर अपना विरोध जताया। और गांव की सामूहिक ज़मीन दिखाने से पहले, प्रशासन को स्थानीय लोगो से वार्तालाप की प्रक्रिया चलाना भी अनिवार्य है! पर जिला प्रशासन ने ऐसा कुछ न करते हुए झुग्गियां तुड़वा दी! रातों रात, महिलायें, बच्चे, बूढ़े, बीमार सड़क पर अा गए! इसके बाद पुलिस का इस्तमाल करते हुए प्रशासन ने इनको डराया धमकाया और सड़क से भी खदेड़ के निकाल दिया! नगर निगम ने यह अादेश जारी कर दिया की क्षेत्र मेें यदि किसी भी व्यक्ति ने इन को बसाया तो निगम सख्त कार्यवाही करेगा। परिणामस्वरूप इनको देव भूमि में कहीं भी टिकने का ठिकाना नही रहा!
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इस प्रकरण में धर्मशाला के निवासियों, मीडिया की चुप्पी और प्रशासन की उदासीनता की वजह क्या है अाखिर? यही की ये इस समुदाय की पहचान,’गंदा’, ‘चोर’, ‘नीच’ और ‘बाहरी’ जैसे शब्दों से करते है! परंतु इनकी जो असली पहचान है वो सब भूल गए हैं! ये लोग न केवल गरीब हैं पर बेघर भी, जो वर्षों पहले अपने गांव छोड़ के यहाँ अा बसे! इनका प्रवास मुख्य रूप से राजस्थान और महाराष्ट्रा से हुअा! राजस्थान से जो 1980 के दशक में अाये ज्यादातर सांसी समुदाय के लोग हैं जो ऐतिहासिक रूप से एक घुमंतू जाती थी! भारत की अधिकतर घुमंतू जातियां अाज के दिन कहीं भी बसने और अाजीविका कमाने के लिए संघर्ष कर रही हैं क्यों की समाज ने इनको कभी अपना हिस्सा नही माना। वैसे ही महाराष्ट्रा से अाये समुदाय अपने को मांगरोड़ी बताते हैं ! इस समाज के लोग भी अनुसूचित जाती की श्रेणी में अाते हैं! इज़्ज़त से दो वक्त की रोटी कमाना इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी! इसके बावजूद हिमाचल में इन्होंने पनाह पाई और अाजीविका के साधन भी!

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अधिकतर लोग शहर के निर्माण कार्यों में कई वर्षों से दिहाड़ी लगा रहें हैं, कुछ मिनियारी के ठेले हैं और कुछ कबाड़ इकठ्ठा व अलग करने का कार्य करते हैं! कई बुज़ुर्ग बताते हैं की शहर की सड़कों और घरों के निर्माण में उन्होंने काम किया है! किसी भी शहर को बनाने और बसाने में कामगार वर्ग का बड़ा योगदान रहता है! इसके बावजूद भी शहर इनको अपनाने से क्यों कतराता है ? हम इनके कपड़े, इनकी बस्तियों को देख कर नाक सिकुड़ते हैं पर हमें इनकी मजबूरी और इनकी अस्मिता, दोनो नज़र नहीं अाती। हम नहीं सोचते की चंद रुपयों की दिहाड़ी में ये कैसे गुज़र बसर करते हैं!Charan Khad Slum Dharamsala 5

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शहर की ज़मीन के उछलते दाम देख लीजिए – क्या यह लाग कभी भी निजी संपत्ति हासिल कर पाएंगे। जब प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और बिजली जैसी सुविधा भी मुश्किल से मुहइया होती है! कितनी असानी से हैम कह देते हैं की ये ‘बाहरी’ और ‘अवैध’ हैं! क्या हम भूल जाते हैं कि पहाड़ में अधिकतर लोग कभी न कभी बाहर से अा कर बसे हैं! क्या हम भूल जाते हैं कि कई पहाड़ी लोग और जगह गए हैं अाजीविका कमाने के लीए ? क्या हम सब एक देश के नागरिक नहीं ? या देश प्रेम केवल क्रिकेट मैच में टीम इंडिया को चीयर करते वक्त और पाकिस्तान को गाली देते वक्त ही याद रहता है हमें। ज़रूर किसी भी भूमि पर अवैध कब्जे का विरोध होना चाहिए, खासकर जब किसान या स्थानीय लोगों को ज़मीन हथियाने के लिए बेदखल किया जा रहा हो! और इसके लिए हमारे पास कानून भी हैं और इन कानूनों की रक्षा होना भी अनिवार्य है! परंतु चरान खड्ड में तीन दशक से अधिक से बसे लोग जिनकी जन संख्या अाज 1000 के करीब है केवल चंद कनाल में सीमित थे। क्या धर्मशाला शहर एक टुकड़ा ज़मीन का मात्र् अावास के लिए इनके साथ बांटने में असमर्थ है?

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यदी कानूनी रूप से बात करें तो, केवल 9 माह पहले बाने नगर निगम को सारी नितियों और नियमों को समझने का समय लेना चाहिए था। प्रधान मंत्री अावास योजना, जिसके दस्तावेज़ निगम की वेबसाइट पर हैं के अंतर्गत किसी भी बस्ती को विकसित करने का प्रावधान है ! चाहे केंद्र या राज्य सरकार की भूमि पर काबिज़ हो साथ ही जब नगर निगम का क्षत्र निर्धारित होने के पश्चात चरान खड्ड को स्लम एरिया इम्प्रूवमेंट एक्ट 1979 के तहत ‘स्लम एरिया’ घोषित करना चाहिए था! हाल ही में पंजाब उच्च न्यायालय की बेंच ने चंडीगढ़ में बस्तियों को उजाड़ने पर स्टे आर्डर दिया था. 2010 में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने बस्ती को ‘इनसिटू’ यानी उसी स्थान पर पनर्विकसित करने का फैसला पारित किया था!

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हमारे भारतीय संविधान की धारा 21 जीने के अधिकार को मूल भूत मानती है जिसमे सिर छुपाने के लिए एक छत होने का अधिकार भी शामिल है! कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार का यह फ़र्ज़ बनता है कि समाज के गरीब, पिछड़े और दबे तबकों के इस अधिकार की रक्षा करे। धर्मशाला प्रशासन व नगर निगम द्वारा संवैधानिक व लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हनन गहन चिंता का विषय है! अाज चरान खड्ड के समुदाय के अधिकतर बच्चे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर के अागे बढ़ रहें हैं. इनमें एक नया हौंसला दिखता है अपनी गरीबी मिटाने का पर सरकार के इस एक कदम ने इनको कई वर्ष पीछे धकेल दिया है ! अब जो बच्चे परीक्षाओं के बीच में ही सड़क पर अा गये क्या होगा उनका भविष्य?

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By Manshi Asher

Manshi is an activist who has been working on environmental and issues pertaining to social justice. She is a member of Kangra Citizens Rights Group.

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Photos: Akshay Jasrotia

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