IGMC Shimla Burn unit
File Photo: Himachal Watcher/2015

शिमला- आगजनी से पीडि़त लोगों के इलाज के लिए अस्पतालों में अलग बर्न यूनिट की व्यवस्था की जानी चाहिए, लेकिन प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी में अभी तक यह सुविधा नहीं है। बर्न यूनिट के नाम पर जनरल सर्जरी में चार बेड लगाए गए हैं। यूनिट चलाने के लिए प्लास्टिक सर्जन का होना जरूरी है, लेकिन आईजीएमसी में एक ही प्लास्टिक सर्जन है। उसी के सहारे पूरा प्रदेश है।

टांडा अस्पताल की बात करें तो वहां एक कमरे में बर्न यूनिट खोल दिया गया है, लेकिन यहां प्लास्टिक सर्जन ही नहीं है। दोनों ही अस्पतालों में सर्जरी के डाक्टरों के सहारे ही काम चल रहा है। यूनिट चलाने के लिए न तो दोनों अस्पतालों में अभी तक स्टाफ पूरा है और न ही जगह। इसलिए बर्न यूनिट महज औपचारिकता ही बन गए हैं। दिवाली आने वाली है और इस मौके पर जलने के कई केस अस्पताल पहुंचते हैं।

आईजीएमसी के लिए बर्न यूनिट की मंजूरी काफी पहले मिल चुकी है, लेकिन अभी तक बर्न यूनिट नहीं खुल पाया। बर्न यूनिट के लिए जगह की कमी एक बार फिर आईजीएमसी प्रशासन के लिए रोड़ा बन रही है। केंद्र ने बर्न यूनिट के लिए सहमति तो दी, मगर आईजीएमसी के पास जगह ही नहीं है। एक ओर लाखों रुपए का प्रोजेक्ट इंडियन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से मंजूर है, दूसरी ओर ये दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं। जब केंद्र की टीम ने दौरा किया था तो आईजीएमसी प्रशासन ने हड़बड़ाहट में टीम को आश्वासन दिया कि वे एक माह के अंदर फाइनल रिपोर्ट तैयार कर देंगे। अब प्रशासन का तर्क है कि चम्याणा में आईजीएमसी को जो नया कैंपस खुलेगा, उसमें आधुनिक सुविधाआें से लैस बर्न यूनिट स्थापित किया जाएगा।

ट्रॉमा वार्ड की हालत भी पस्त

आईजीएमसी प्रदेश का राज्य स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र है, मगर अभी तक अस्पताल में न तो बर्न यूनिट बना है, न ही ट्रॉमा वार्ड की बेहतर सुविधाएं मरीजों को मिल रही हैं। ऐसे में मरीजों को पीजीआई के लिए रैफर किया जाता है, मगर अस्पताल में अब कई तरह की दिक्कतें मरीजों को पेश आ रही हैं। एक ओर मरीजों को सुविधाएं नहीं हैं, दूसरी ओर बाहरी राज्यों में मरीजों को दोगुने पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जिससे गरीब मरीजों को काफी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं।

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