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File Photo: Himachal Watcher/2012

केएनएच में आने वाली वार्ड सिस्टर दो से तीन महीने बाद ही डेपुटेशन का जुगाड़ कर लेती हैं। इसके कारण वहां स्थायी तौर पर काम कर रही वार्ड नर्सों पर काम का बोझ बढ़ जाता है

शिमला- प्रदेश में स्टाफ की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं लगातार प्रभावित हो रही है। कहीं स्टाफ की कमी है तो कहीं जरूरत से ज्यादा स्टाफ है। हालांकि पिछली विधानसभा में मुख्यमंत्री ने डेपुटेशन रद्द करने के आदेश दिए थे, लेकिन डेपुटेशन अभी भी बदस्तूर जारी है। इसके कारण कई चिकित्सा संस्थानों में स्टाफ की कमी भारी पड़ रही है।

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File Photo: Himachal Watcher

प्रदेश के इकलौते मातृ शिशु अस्पताल में भी स्थिति कुछ ऐसी है। यहां पर स्थिति इतनी खराब है कि अस्पताल में 188 बेड के लिए मात्र 58 नर्सें दिन-रात सेवाएं दे रही हैं। स्टाफ की कर्मी का खामियाजा मरीजों को भी भुगतना पड़ रहा है। यहीं नहीं, वार्ड सिस्टर तक पूरी नहीं है। दरअसल केएनएच में वार्ड सिस्टर के 16 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में 10 की तैनाती है। मुश्किल तब हो जाती है, जब अधिकतर वार्ड सिस्टर डेपुटेशन का जुगाड़ कर अपनी मनमर्जी के स्टेशनों पर चली जाती हैं। ऐसा कई बार हो चुका है।

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सूत्रों का कहना है कि एक वार्ड सिस्टर पिछले छह महीनों से डेपुटेशन पर मंडी में सेवाएं दे रही है। यही हाल नई ज्वाइन करने वाली वार्ड सिस्टरों का भी है, जो ज्वाइंनिंग के दौरान ही दो या तीन महीने बाद मनमर्जी के स्टेशनों के जुगाड़ में लगी हैं। केएनएच में 16 डिपार्टमेंट हैं, लेकिन वार्ड सिस्टर मात्र 10 ही हैं, जिनकी संख्या सोमवार तक केवल दस थी, लेकिन तीन वार्ड सिस्टर ने हाल ही में ज्वाइन किया है। इनमें से भी दो से तीन वार्ड सिस्टर छुट्टी पर हों तो मरीजों की देखभाल करना अस्पताल प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो जाती है।

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अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि पहुंच के चलते केएनएच में आने वाली वार्ड सिस्टर दो से तीन महीने बाद ही डेपुटेशन का जुगाड़ कर लेती हैं। इसके कारण वहां स्थायी तौर पर काम कर रही वार्ड नर्सों पर काम का बोझ बढ़ जाता है । हालात यह है कि हाउस किपिंग का जिम्मा तक वार्ड सिस्टर के हवाले है। इस एकमात्र महिला अस्पताल में मात्र तीन प्रशिक्षित मिडवाइफ हैं तथा क्लास-4 स्टॉफ की भी भारी कमी है।

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अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने कहा कि सरकारें एवं स्वास्थ्य विभाग के बड़े-बड़े दावों के बावजूद यह अस्पताल बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। विशेषकर स्टाफ नर्सें व निचली श्रेणी के स्टॉफ की जितनी संख्या होनी चाहिए उससे कई गुना कम है ।

प्रत्येक वार्ड में तीन शिफ्टों में केवल एक नर्स पूरा वार्ड देखती है। समिति की शिमला इकाई की अध्यक्ष आशु भारती का कहना है कि डाक्टरों के ड्यूटी के घंटे अधिक होने के साथ-साथ नर्सिंग स्टॉफ कम होने के कारण 10-12 दिनों में नाइट ड्यूटी लगती है। लेबर वार्ड में तो आठ दिन के बाद नाइट ड्यूटी लगती है। कई नर्सिज को तो लगातार एक-एक महीने तक सेवाएं देनी पड़ती हैं। जब तक सरकार एवं स्वास्थ्य प्रशासन अस्पताल की बेहतरी के लिए प्राथमिकता के तौर पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक गुणवत्तापूर्ण सुविधाओं की अपेक्षा करना बेमानी होगा।

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