वैज्ञानिकों का खुलासा- हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से चढ़ रहा हिमाचल के पहाड़ों का तापमान

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हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं,अध्ययन के अनुसार लारजी और पंडोह डैम के निर्माण के बाद कुल्लू-मनाली के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है।

शिमला- हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं। हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों के वाटर रेजरवायरों से उत्सर्जित मिथेन गैस से ठंडे पहाड़ों का पारा चढ़ रहा है। डैमों से निकलने वाली सीएच-4 मिथेन गैस आबोहवा को गर्म कर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा दे रही है।
ठंड के चलते प्रदेश के जिन इलाकों में साल भर ऊन के कपड़े पहनने पड़ते थे, वहां अब गर्मियों में पंखे और कूलर चल रहे हैं। हिमाचल के कई इलाकों में पन बिजली परियोजनाओं के विशाल डैमों के निर्माण से मई- जून में तापमान 33 से 41 डिग्री तक चढ़ रहा है।

इनके बनने से पहले यहां तापमान 20 और 24 डिग्री के बीच रहता था। जीबी पंत नेशनल पर्यावरण अनुसंधान केंद्र मौहल के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

वैज्ञानिकों के अध्ययन में हुआ खुलासा

संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक जेसी कुनियाल की अगुवाई में हुए इस अध्ययन के अनुसार लारजी और पंडोह डैम के निर्माण के बाद कुल्लू-मनाली के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है।

इसरो की मदद से मनाली के कोठी में स्थापित ऑब्जर्वेटरी के आंकड़े बताते हैं कि इसका असर ग्लेशियरों पर भी दिखने लगा है। पहले जहां मनाली क्षेत्र के लोग साल भर ऊनी कोट पहने रखते थे।

अब इस क्षेत्र में लोगों को घरों में पंखे लगाने पड़ रहे हैं। इसी तरह गोबिंद सागर डैम के निर्माण से पहले बिलासपुर और पौंग डैम बनने से पहले कांगड़ा में भी इतनी गर्मी नहीं पड़ती थी।

सेब की फसल पर भी असर

बागवानी उपनिदेशक रोशन लाल का कहना है कि कुछ अरसा पहले तक कुल्लू के बजौरा में सेब की फसल होती थी, लेकिन तापमान में एकाएक बढ़ोतरी से अब सेब की बेल्ट बजौरा के बजाय रायसन तक खिसक गई है।

कुल्लू फल उत्पादक मंडल के अध्यक्ष महेंद्र उपाध्याय का कहना है कि पहले तापमान कम रहने से पूरा साल पहाड़ों पर बर्फ रहती थी। इससे फसल भी बेहतर रहती थी। सेब की सेल्फ लाइफ ज्यादा थी।

पंखे- कूलर यहां के लिए अनजानी चीजें थीं। लेकिन गर्मी बढ़ने से फसल को तुड़ान के एकदम बाद मार्केट में लाना पड़ता है ताकि यह खराब न हो जाए।

लेह-लद्दाख की ओर मुड़ रहे सैलानी

हिमालय के जानकार और इतिहासकार छेरिंग दोरजे का कहना है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले कर्नल जॉनसन, रैनिक, मिनिकन एवं थॉमस जैसे अंग्रेज अफसरों ने कुल्लू व मनाली का मौसम इंग्लैंड की तरह होने के चलते यहां बसने का इरादा बनाया था।

लेकिन, अब अंग्रेज सैलानी भी गर्मियों के मौसम में यहां ठहरने की बजाए लेह-लद्दाख का रुख करने लगे हैं।

Photo: WikiMedia/Representational image

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