तेज़ी से पिघल रहे ग्लेशियर, हिमाचल की अधिकतर नदियां खतरे में, कुछ दशकों में 50% ग्लेशियर पिघलने की आशंका

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global warming in himachal

हिमाचल की सतलुज, रावी, पार्वती और ब्यास नदियों के हिम स्रोत पिछले 25 वर्षों में 450 वर्गमीटर तक सिकुड़ चुके हैं,रेडिएशन से बीमारियां फैलने का खतरा, अगले पचास वर्षों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका है,ग्लेशियर पिघलने से एशिया के इंडो-गंगेटिक एरिया में रह रही विश्व की 40 फीसदी आबादी पर अनाज और पेयजल का संकट गहराएगा

शिमला- ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालय से निकलने वाली नदियों के हिम स्रोत चिंताजनक रफ्तार से सिकुड़ रहे हैं। हिमाचल की सतलुज, रावी, पार्वती और ब्यास नदियों के हिम स्रोत पिछले 25 वर्षों में 450 वर्गमीटर तक सिकुड़ चुके हैं। इन नदियों को सदानीरा करने वाले ग्लेशियर 21 से 28 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघल रहे हैं।

पार्वती नदी के ग्लेशियर सबसे अधिक तेज रफ्तार से पिघल रहे हैं। इसका खुलासा इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) की अध्ययन रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर पिछले 25 वर्षों में 850 मीटर सिकुड़ा है।

इसरो के वैज्ञानिक डॉ. अनिल वी. कुलकर्णी के नेतृत्व में हुई स्पॉट स्टडी और सेटेलाइट इमेजरी में यह तथ्य सामने आए हैं कि बड़ा शिकरी, छोटा शिकरी, म्याड़, मुर्खिला, पार्वती और दूधन जैसे ग्लेशियर हर वर्ष 21 से 28 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघल रहे हैं।

किस नदी में कितने छोटे-बडे़ ग्लेशियर

नदी ग्लेशियर
रावी—172
चंद्रभागा—1278
ब्यास—277
सतलुज—926
(पार्वती ब्यास की सहायक नदी है)

ग्लेशियर पिघलने से यहां बन रही झील, ला सकती है तबाही

हिमाचल की अधिकतर नदियां इन्हीं ग्लेशियरों से निकलती हैं। रिपोर्ट में आगाह किया है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देने वाली ग्रीन हाउस गैसों एवं कार्बन के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो अगले पचास वर्षों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका है।

गोपांग घाटी में बनी बड़ी झील, मनाली-लेह मार्ग को खतरा

डॉ. अनिल वी. कुलकर्णी के अनुसार लाहौल में ग्लेशियरों के पिघलने से गेपांग घाटी में बड़ी झील बन गई है। इससे सिस्सू गांव तथा मनाली-लेह मार्ग को खतरा बन गया है। इन झीलों का आकार बढ़ता रहा तो ये भारत-पाक के लिए वाटर बम बनकर भारी तबाही ला सकती हैं।

हिमालयन पर्यावरण अनुसंधान केंद्र मौहल के वैज्ञानिक जेसी कुनियाल ने बताया कि इसरो के अध्ययन में उक्त चिंताएं सामने आई थीं। नासा की ओर से सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों से यह बात पुख्ता हो गई है।

ग्लेशियर पिघलने से गहराएगा पेयजल संकट

ग्लेशियर पिघलने से एशिया के इंडो-गंगेटिक एरिया में रह रही विश्व की 40 फीसदी आबादी पर अनाज और पेयजल का संकट गहराएगा। वन, हरित क्षेत्र और वन्य प्राणियों पर संकट के साथ पारिस्थितिक और पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा जाएगा। सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी इसका असर पड़ेगा।

रेडिएशन से बीमारियां फैलने का खतरा

इसरो की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियरों के बर्फ के रूप में रेडिएशन को नियंत्रित न करने से बीमारियां फैलने भी संभावना बनी हुई है। ग्लेश्यिर रेडिएशन को कंट्रोल कर रहे हैं।

इसरो की रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। पहले तो हमें इससे होने वाले खतरे से बचना होगा। वहीं ये भी सोचना होगा कि ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार को कैसे कम किया जाएगा। पर्यावरण प्रदूषण को कैसे रोका जाए। इसमें आम लोगों और पर्यटकों का सहयोग जरूरी है।

रवि ठाकुर, विधायक, लाहौल स्पीति

Photo: Wiki Media

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