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देवभूमि हिमाचल व शिमला जैसे शांत व सुरक्षित शहर में ऐसी दुष्कर्म की घटना होना कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह: चौहान

शिमला– शिमला शहर मैं रविवार को एक 19 वर्षीया युवती के अपहरण व् चलती कर में दुष्कर्म की घटना को लेकर माहौल गरमा गया है।

जनता का गुस्सा भांप मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंगलवार को एडीएम शिमला प्रभा राजीव को मजिस्ट्रियल जांच सौंप दी है और 24 घंटे में रिपोर्ट तलब की है। साथ ही दुष्कर्म की छानबीन के लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शिमला प्रवीर ठाकुर के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया गया है। एसआईटी में सात सदस्य भी होंगे। ये एएसपी शिमला अभिषेक यादव, डीएसपी योगेश जोशी, इंस्पेक्टर राजकुमार, सब इंस्पेक्टर डिंपल, एसएचओ महिला थाना न्यू शिमला दयावती, एएसआई पुलिस चौकी संजौली रंजना और एएसआई राजीव कुमार होंगे।

विपक्षी पार्टी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए शहर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी ने शिमला में युवती से हुए दुष्कर्म की शर्मसार करने वाली घटना को लेकर गम्भीर चिंता व्यक्त करती है। पार्टी ने कहा कि देवभूमि हिमाचल व शिमला जैसे शांत व सुरक्षित शहर में इस प्रकार की घटना का घटित होना कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है।

राज्य सचिवमण्डल के सदस्य संजय चौहान ने कहा कि पिछले कुछ समय से प्रदेश में इस प्रकार के अपराधियों घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। हत्या व महिलाओं के प्रति अपराध जिसमें विशेष रूप से बलात्कार के मामलों में बहुत वृद्धि दर्ज की गई हैं। प्रदेश सरकार इस प्रकार के संगीन अपराधों को रोकने में पूरी तरह से विफल रही है।

चौहान ने ये भी कहा कि वर्ष 2017 में ‘गुडिया’ की निर्मम हत्या की घटना ने प्रदेश में कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्तिथि को स्पष्ट रूप से दर्शाया था और तत्कालीन सरकार को इसका परिणाम भी भुगतना पड़ा था। परन्तु ये अत्यंत खेदजनक है कि अन्वेषण एजेंसियां आजतक इसका संतोषजनक परिणाम नहीं निकाल पाई है। जिससे आज प्रदेश में कानून व्यवस्था पर आम जनता असमंजस की स्थिति में है। जिस प्रकार से इस अत्यंत संवेदनशील घटना की पुलिस या सीबीआई ने जांच की और लगभग तीन वर्ष बीतने के बावजूद कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाने से प्रदेश में कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रशन चिन्ह खड़ा होता है।

चौहान ने आरोप लगाया कि इसी लचर कानून व्यवस्था के कारण आये दिन अपराधी महिलाओं की हत्या, बलात्कार व मारपीट कर खुले घूमते हैं परंतु न जाने किन कारणों से पुलिस इन गंभीर मामलों में भी कार्यवाही नहीं करती है। कई मामलों में तो FIR दर्ज भी नहीं की जाती हैं जिससे अपराधियों के हौंसले बुलंद होते है और आम जनता को डर के साए में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के गठन के समय भी कानून व्यवस्था एक बड़ी समस्या थी और इसी मुद्दे को लेकर जनता ने सरकार को प्रदेश में सत्तासीन किया था और सरकार ने कानून व्यवस्था दरुस्त करने का वायदा किया था। परन्तु एक वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद कानून व्यवस्था दरुस्त करना तो दूर की बात बन गई है बल्कि यह बद से बदतर होती जा रही है और सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही हैं। जिससे कानून व्यवस्था पर सरकार की विफलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

सी.पी.एम. ने मांग की है कि मांग करती हैं कि दुष्कर्म के लिए दोषियों को तुरंत पकड़ कर कड़ी कानूनी प्रक्रिया अमल में लाई जाए तथा लापरवाही करने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध भी तुरन्त कार्यवाही की जाए। पार्टी ने यह भी मांग कि है कि पीड़ित छात्रा को कम से कम सरकार 10 लाख की राशी दे। कानून व्यवस्था को दरुस्त करने के लिए मुख्यमंत्री तुरंत ठोस कदम उठाये। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार तुरन्त दोषियों को पकड़ कर कानूनी कार्यवाही नहीं करती व कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त नहीं करती तो सी।पी।एम। जनता को लामबन्द कर आंदोलन करेगी।

वंही दूसरी और कांग्रेस ने प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर चिंता ब्यक्त करते हुए कहा है कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा की पूरी पोल खुल गई हैं।पुलिस प्रशासन गहरी नींद में है।दिन दहाड़े चोरियां ओर डकैती तो आम बात हो गई है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने कहा है कि इस से बड़ी पुलिस की लाचारी ओर क्या हो सकती है कि पीड़ित महिला ने पुलिस से सुरक्षा मांगी जो उसे नही दी गई।

राठौर ने इसे सरकार की कमजोरी बताते हुए कहा की भाजपा सरकार महिलाओं की सुरक्षा की बड़ी बड़ी बातें तो करती है पर सुरक्षा में जुटी पुलिस ने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी है।

राठौर ने दोषी पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की मांग करते हुए आरोपियों को तुरंत सलाखों के पीछे करने को कहा है।

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शिमला में दबंगों द्वारा दलित परिवार से मारपीट, न पुलिस ने एफआईआर दर्ज़ की, न डॉक्टर ने दिया उचित उपचार: दलित शोषण मुक्ति मंच

शिमला-हिमाचल प्रदेश दलित शोषण मुक्ति मंच शिमला के ढली थाना के अन्तर्गत आने वाले परिवार के साथ पड़ोस में रहने वाले दबंगों द्वारा जातिगत उत्पीड़न और मारपीट के मामले की कडी निन्दा शिमला है।

मंच ने आरोप लगाया है कि जब पीडित परिवार एफआईआर दर्ज करवाने के लिए ढली थाने में पहुंचा तो थाना प्रभारी ने भी एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की,जिस वजह से पीडित परिवार को ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवानी पड़ी। मंच ने कहा कि ढली थाना ने 18 घंटे तक एफआईआर तक दर्ज नहीं की गयी और पुलिस आरोपियों को पुलिस वैन में घुमाती रही।

उसके बाद पीडित परिवार जब उपचार के लिए आई.जी.एम.सी. पहुंचा तो उन्हें उचित उपचार नहीं मिला, पीडित लड़की कई घंटों तक स्ट्रेचर पर पड़ी खून से लतपथ दर्द से कहलाती रही। दलित शोषण मुक्ति मंच पुलिस और डॉक्टर के इस तरह की गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए कडी आलोचना की है और सरकार से मांग की है कि दोषी पुलिस कर्मियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐ।



दलित शोषण मुक्ति मंच के शहरी संयोजक विवेक कश्यप व सह संयोजक राकेश कुमार ने कहा कि जब से प्रदेश में बीजेपी की सरकार सत्ता में आई है तब से दलितों पर अत्याचार बड़े है वो चाहे सिरमौर में केदार सिंह जिदान की हत्या हो,नेरवा में रजत की हत्या हो,कुल्लू घाटी के थाटीबीड़ की घटना हो या सोलन के लुहारघाट में एक दलित शिक्षक के साथ मारपीट का मामला हो,सरकार इन सब मामलों में न्याय दिलाने में विफल रही।

उन्होंने कहा कि इससे सरकार का दलित विरोधी रवैया सामने आया है। ढली मारपीट व छेडछाड मामले में ऐट्रोसिटी एक्ट लगने के बाद भी पुलिस अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं कर पाई है।

‌दलित शोषण मुक्ति मंच ( हि।प्र) सरकार से मांंग की है कि अपने काम में कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐऔर मारपीट और छेड़छाड़ के आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार किया जाऐ। मंच ने चेतवानी दी है कि अगर सरकार दोषियों को तुरंत गिरफ्तार नहीं करती है तो दलित शोषण मुक्ति मंच शहर की जनता को लामबंद कर के एक उग्र आंदोलन करेगी।

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समय रहते पुलिस ने की होती मदद तो नहीं होता दुराचार, दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर भी दर्ज़ हो एफआईआर: गुड़िया न्याय मंच

शिमला-गुड़िया न्याय मंच ने शिमला शहर के बीचोंबीच बलात्कार के मामले में पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की है व दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। मंच ने चेताया है कि अगर बलात्कार के दोषियों व जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई तो मंच जनता को लामबंद करके आंदोलन करेगा।

मंच के सह संयोजक विजेंद्र मेहरा ने पुलिस की नाक के नीचे एक और लड़की के बलात्कार पर कड़ा रोष ज़ाहिर किया है। उन्होंने कहा है कि इस बेहद संवेदनशील मामले में बलात्कार के दोषियों के साथ ही जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर तुरन्त एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। अगर पुलिस प्रशासन ने थोड़ी भी संवेदनशीलता दिखाई होती तो मानवता को शर्मशार करने वाला यह घिनौना कार्य नहीं होता।

मंच ने यह सवाल उठाया है कि जब यह लड़की पुलिस के पास मदद मांगने गई तो फिर उसे मदद क्यों नहीं मिली। मंच के सह संयोजक ने कहा कि अगर पुलिस ने इस लड़की की समय रहते मदद की होती तो इस लड़की से दुराचार नहीं होता और न ही दरिंदे अपने मंसूबों में कामयाब हो पाते। उन्होंने इस बलात्कार के लिए पूरी तरह पुलिस जिम्मेवार ठहराया है।

उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम से गुड़िया प्रकरण की तरह एक बार फिर से स्पष्ट हो गया है कि हिमाचल प्रदेश के थाने किसी भी तरह से आम जनता के लिए सुरक्षित नहीं हैं और न ही इन थानों में जाने पर जनता को सुरक्षा,न्याय व मदद मिलती है। यह घटनाक्रम एक बार पुनः गुड़िया प्रकरण की तरह पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की पोल खोलता है व उस पर काला धब्बा है।

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हिमाचल के निजी स्कूलों के सामने घुटने टेक रही सरकार, न इंस्पेक्शन पूरी, न ही करवा पायी पीटीए का गठन

शिमला-लगभग दो महीने के विरोध प्रदर्शन के बावजूद निजी स्कूलों की हर साल भारी-भरकम फीस वृद्धि और अतिरिक्त मनमानी वसूली के सताए अभिभावकों को प्रदेश सर्कार से कोई रहत मिलती नज़र नहीं आ रही।

शिक्षा विभाग कितनी कठोर कार्रवाई करने में सक्षम है यह इसी से पता चलता है कि विभाग निजी स्कूलों में पीटीए का गठन तक नहीं करवा पाया। छात्र-अभिभावक मंच की माने तो भारी फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर विभाग से कार्रवाई की अपेक्षा करना केवल दिल को तसल्ली देने का कार्य है।

मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ने कहा है कि शिक्षा विभाग इंस्पेक्शन रिपोर्ट पर कार्रवाई की आड़ में केवल जनता का आई वॉश कर रहा है। शिक्षा विभाग के अधिकारी निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए न्यूनतम कार्य तक नहीं कर पाए हैं।

सिर्फ 47% स्कूलों का ही कर पाया इंस्पेक्शन कार्य, रिपोर्ट भी सार्वजानिक नहीं

उन्होंने कहा कि 1472 स्कूलों में से केवल 638 स्कूलों की रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय में पहुंची है। इसका मतलब है कि केवल 43 प्रतिशत स्कूलों में ही इंस्पेक्शन का कार्य सम्पन्न हुआ है। केवल 43 प्रतिशत स्कूलों की रिपोर्ट आने से स्पष्ट है कि न तो शिक्षा विभाग ने 57 प्रतिशत स्कूलों की इंस्पेक्शन की है और न ही इन स्कूलों ने शिक्षा विभाग में अपना रिकॉर्ड जमा करवाने की जहमत उठाई है। इस तरह आधे से ज़्यादा स्कूल इंस्पेक्शन व रिकॉर्ड इकट्ठा करने के दायरे से बाहर रह गए हैं। उन्होंने उच्चतर शिक्षा निदेशक से इस बाबत प्रश्न किया है कि आखिर क्यों 57 प्रतिशत स्कूलों की इंस्पेक्शन रिपोर्ट शिक्षा विभाग के पास नहीं पहुंची है। वह यह भी बताएं कि इन निजी स्कूलों में इंस्पेक्शन न करने वाले अधिकारियों व अपना रिकॉर्ड जमा न करने वाले निजी स्कूलों,इन दोनों पक्षों पर शिक्षा विभाग ने क्या कार्रवाई अमल में लायी है।
उन्होंने गम्भीर चिंता व्यक्त की है कि क्या शिक्षा विभाग द्वारा गठित 72 इंस्पेक्शन टीमें 18 दिन में इंस्पेक्शन का कार्य पूर्ण नहीं कर सकती थीं।

जब निजी स्कूलों की इंस्पेक्शन इस वर्ष हुई तो बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित करने का क्या तुक

छात्र अभिभावक मंच ने शिक्षा विभाग के उस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है जिसमें उसने कहा है कि इस वर्ष बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित किया जाएगा। मंच ने उच्चतर शिक्षा निदेशक को चेताया है कि वह अभिभावकों के सब्र का इम्तिहान न लें व बढ़ी हुई फीसों को इसी साल समायोजित करें।

उन्होंने कहा कि जब निजी स्कूलों की इंस्पेक्शन इस वर्ष हुई व निजी स्कूलों ने मनमानी इस वर्ष की है तो फिर बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित करने का क्या तुक व तर्क है। इस से साफ नजर आ रहा है कि शिक्षा निदेशक डिले टैक्टिकस का इस्तेमाल करके मामले को अगले वर्ष तक खींचना चाहते हैं ताकि अभिभावकों का गुस्सा शांत हो जाए व आगामी वर्ष तक अभिभावक बढ़ी हुई फीस की बात भूल जाएंगे।

उच्चतर शिक्षा निदेशक को भली-भांति मालूम है कि निजी स्कूल मार्च,जून व सितंबर में तीन इंस्टॉलमेंट्स में फीस लेते हैं। अभी तक सभी निजी स्कूलों ने फीस की केवल मार्च की एक इन्सटॉलमेंट ली है तथा जून व सितंबर की दो फीस इंस्टॉलमेंट्स बाकी हैं। यह बढ़ी हुई फीस जून व सितंबर की इन दो इंस्टॉलमेंट्स में आसानी से समायोजित की जा सकती थी परन्तु ऐसा न करके शिक्षा निदेशक अगले वर्ष फीस समायोजित करने की बात कह रहे हैं जिस से साफ है कि वह निजी स्कूलों के चंगुल में हैं। उन्होंने इस बात पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है कि शिक्षा निदेशक सब कुछ जानते हुए भी छात्रों व अभिभावकों को ठगने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षा निदेशक को साफ कर दिया है कि वह बढ़ी हुई फीसों को इसी वर्ष की फीस की दो इंस्टॉलमेंट्स में समायोजित करवाएं अन्यथा आंदोलन का अगला पड़ाव अनिश्चितकालीन के लिए उच्चतर शिक्षा निदेशालय ही होगा।

स्कूल सत्र के दो महीने बीतने के बावजूद भी नहीं करवा पाया पीटीए के गठन

शिक्षा का अधिकार कानून 2009,मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2014 की गाइडलाइनज़ व 27 अप्रैल 2016 का हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय स्पष्ट कहते हैं कि हर निजी स्कूल में पीटीए का गठन आवश्यक रूप से होना चाहिए। इसके अनुसार पीटीए का गठन सत्र शुरू होने के एक महीने के भीतर हर हाल में होना चाहिए। निर्णयानुसार हर निजी स्कूल में पीटीए के गठन के लिए सरकारी स्कूल के अधिकारी की पीटीए चुनाव अधिकारी के रूप में डयूटी लगनी चाहिए थी। इसी सरकारी अधिकारी की देख-रेख में पीटीए का गठन होना चाहिए जिसमें लोकतांत्रिक तरीके से 75 प्रतिशत संख्या अभिभावकों की होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि स्कूल सत्र के दो महीने बीतने के बावजूद भी पीटीए के गठन के लिए न तो सरकारी अधिकारियों के नामों का ऐलान शिक्षा विभाग ने किया है और न ही किसी भी स्कूल में तय नियमों के अनुसार पीटीए का गठन हुआ है। जिन निजी स्कूलों ने पीटीए की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाए बिना ही डम्मी पीटीए का गठन किया है उन पर भी शिक्षा विभाग ने शिक्षा का अधिकार कानून,एमएचआरडी गाइडलाइनज़ व हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना पर कोई कार्रवाई नहीं कि है। शिक्षा विभाग केवल खानापूर्ति करना चाहता है।

अन्य राज्यों की तर्ज़ पर क्यों नहीं कर रहा त्वरित करवाई

मंच का मानना है कि अगर शिक्षा विभाग वास्तव में ही निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने के लिए गम्भीर होता तो इस वक्त अन्य राज्यों की तर्ज़ पर एक्शन मोड में आ चुका होता व अवहेलना करने वाले स्कूलों पर ठोस कार्रवाई हो चुकी होती।

विभाग ने बार-बार नोटिसों की अवहेलना करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई तक नहीं की है। अगर विभाग गम्भीर होता तो कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में निजी स्कूलों पर जिलाधीश के कार्रवाई मॉडल को फॉलो करता व अवहेलना करने व भारी फीसें बढ़ाने वाले स्कूलों पर भारी फाइन लगाता ताकि भविष्य में कोई भी स्कूल मनमानी करने की हिम्मत तक नहीं कर पाता। इसी 19 अप्रैल को नोएडा के जिलाधीश ने 14 निजी स्कूलों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी व भारी फीसें वसूलने वाले दो स्कूलों को पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया था। इनमें से एपीजे स्कूल को 4 लाख रुपये व केम्ब्रिज स्कूल को एक लाख रुपये जुर्माना लगाया था। जिलाधिकारी ने सभी 14 स्कूलों को बढ़ी फीस वापिस लेने के लिए केवल एक दिन का समय दिया था व ऐसा न करने वाले स्कूलों पर कॉड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर एक्ट 1973 की धारा 107 के तहत मुकद्दमे दर्ज किए थे। हिमाचल प्रदेश के बड़े-बड़े निजी स्कूल लगातार मनमानी कर रहे हैं परन्तु शिक्षा विभाग इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा है।

कार्रवाई करने के बजाए दी जा रही छूट पर छूट

विभाग की ओर से केवल मुख जुबानी कार्रवाई चल रही है व हकीकत में कोई एक्शन नहीं हो रहा है। जहां नोएडा के जिलाधिकारी ने निजी स्कूलों पर छापेमारी के 24 घण्टे के भीतर उनकी मनमानी को रोकने के लिए कार्रवाई अमल में ला दी वही दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश का शिक्षा विभाग पिछले दो महीनों से नोटिस पर नोटिस देने के बावजूद भी फीसें कम न करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई करने के बजाए छूट पर छूट देता जा रहा है। इसी से स्पष्ट है कि शिक्षा विभाग दबाव में कार्य कर रहा है।

हिमाचल प्रदेश का शिक्षा विभाग पिछले दो महीनों से नोटिस पर नोटिस देने के बावजूद भी फीसें कम न करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई करने के बजाए छूट पर छूट देता जा रहा है। इसी से स्पष्ट है कि शिक्षा विभाग दबाव में कार्य कर रहा है।

अब मंच आरटीआई के ज़रिए स्वयं निजी स्कूलों की लूट जनता के सामने लाएगा मंच

मंच ने निर्णय लिया है कि शिक्षा विभाग द्वारा इंस्पेक्शन रिपोर्टें सार्वजनिक न करने के कारण अब मंच सूचना के अधिकार(आरटीआई) के ज़रिए स्वयं ही इन निजी स्कूलों की लूट जनता के सामने लाएगा।

सूचना के अधिकार के तहत निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी सहित अन्य सभी तरह की जानकारी इकट्ठा की जाएगी। जो भी स्कूल तथ्यों को छिपाने की कोशिश करेगा अथवा गलत जानकारी देगा उस स्कूल पर न्यायिक कार्रवाई के बारे में भी मंच काम करेगा। निजी स्कूलों द्वारा गलत जानकारी देने पर उन पर कानूनी कार्रवाई अमल में लाने से कोई भी गुरेज़ नहीं किया जाएगा। उन्होंने शिमला के उपायुक्त से मांग की है कि वह इन निजी स्कूलों पर शिकंजा कसें। उन्होंने उपायुक्त से पूछा है कि वह निजी स्कूलों की मनमानी पर खामोश क्यों हैं। उन्होंने मांग की है कि निजी स्कूलों पर नियमों की अवहेलना करने व मनमानी करने पर कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 के तहत धारा 107 के तहत कार्रवाई अमल में लायी जाए।

इंस्पेक्शन टीमों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें अन्यथा होगा आंदोलन

छात्र अभिभावक मंच ने 23 अप्रैल को उच्चतर शिक्षा निदेशक तथा संयुक्त शिक्षा निदेशकों व उप निदेशकों के मध्य हुई बैठक की कार्यवाही की अधिसूचना जारी करने की मांग की है। मंच ने शिक्षा अधिकारियों से पूछा है कि वे निजी स्कूलों पर कार्रवाई का अपना एक्शन प्लान बताएं। मंच ने एक बार पुनः उच्चतर शिक्षा निदेशक को चेताया है कि वह इंस्पेक्शन टीमों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें अन्यथा आंदोलन होगा।

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