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शिक्षा

मजबूरी में फीस न दे पाने वाले बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं से बहार कर रहे निजी स्कूल, स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट के लिए भी हो रही 15 से 25 हजार रुपये तक की वसूली

Hp private school fee

शिमला– प्रदेश में निजी स्कूलों की फीस वृद्धि को लेकर अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। अभिभावकों की मानें तो निजी स्कूलों ने बड़ी चतुराई से वर्ष 2021 में कुल फीस के 80% से ज़्यादा हिस्से को टयूशन फीस में बदल कर लूट को जारी रखा है। छात्र अभिभावक मंच का आरोप है कि जो अभिभावक कोरोना काल में रोज़गार छिनने पर फीस नहीं दे पा रहे हैं उनके बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं से बाहर किया जा रहा है या तो उन्हें स्कूल से ही बाहर किया जा रहा है। सैंकड़ों अभिभावक निजी स्कूलों की फीस जमा न कर पाने पर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती कर रहे हैं परन्तु निजी स्कूल माइग्रेशन,ट्रांसफर अथवा स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट देने की एवज़ में 15,000 से 25,000 रुपये तक वसूल रहे हैं। मंच का कहना है कि जिन बच्चों ने स्कूल की एक भी ऑनलाइन कक्षा तक नहीं लगाई उनसे भी स्कूल छोड़ने पर 25,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

छात्र अभिभावक मंच के राज्य संयोजक विजेंद्र मेहरा,जिला कांगड़ा अध्यक्ष विशाल मेहरा,मंडी अध्यक्ष सुरेश सरवाल,शिमला अध्यक्ष विवेक कश्यप,उपाध्यक्ष भुवनेश्वर सिंह,बद्दी अध्यक्ष जयंत पाटिल,पालमपुर अध्यक्ष आशीष भारद्वाज,नालागढ़ अध्यक्ष अशोक कुमार,कुल्लू अध्यक्ष पृथ्वी चंद व मनाली अध्यक्ष अतुल राजपूत ने कहा है कि प्रदेश सरकार की नाकामी व उसकी निजी स्कूलों से मिलीभगत के कारण निजी स्कूल लगातार मनमानी कर रहे हैं। कोरोना काल में भी निजी स्कूल टयूशन फीस के अलावा एनुअल चार्जेज़,कम्प्यूटर फीस,स्मार्ट क्लारूम,मिसलेनियस,केयरज़,स्पोर्ट्स,मेंटेनेंस,इंफ्रास्ट्रक्चर,बिल्डिंग फंड व अन्य सभी प्रकार के फंड व चार्जेज़ वसूल रहे हैं।

मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ने प्रदेश सरकार पर निजी स्कूलों से मिलीभगत का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि कानून का प्रारूप तैयार करने में ही इस सरकार ने तीन वर्ष का समय लगा दिया। जबकि महीनों पहले अभिभावकों ने दर्जनों सुझाव दिए हैं तब भी जान बूझकर यह सरकार कानून बनाने में आनाकानी कर रही है। इस मानसून सत्र में कानून हर हाल में बनना चाहिए था परन्तु सरकार की संवेदनहीनता के कारण कानून नहीं बन रहा है। सरकार की नाकामी के कारण ही बिना एक दिन भी स्कूल गए बच्चों की फीस में 15% से 50% तक की फीस बढ़ोतरी की गई है। स्कूल न चलने से स्कूलों का बिजली,पानी,स्पोर्ट्स,कम्प्यूटर,स्मार्ट क्लास रूम,मेंटेनेंस,सफाई आदि का खर्चा लगभग शून्य हो गया है तो फिर ये निजी स्कूल किस बात की पन्द्रह से पचास प्रतिशत फीस बढ़ोतरी कर रहे हैं और इस बढ़ोतरी पर सरकार क्यों मौन है।

उन्होंने कहा है कि फीस वसूली के मामले पर वर्ष 2014 के मानव संसाधन विकास मंत्रालय व पांच दिसम्बर 2019 के शिक्षा विभाग के दिशानिर्देशों का निजी स्कूल खुला उल्लंघन कर रहे हैं व इसको तय करने में अभिभावकों की आम सभा की भूमिका को दरकिनार कर रहे हैं। निजी स्कूल अभी भी एनुअल चार्जेज़ की वसूली करके एडमिशन फीस को पिछले दरवाजे से वसूल रहे हैं व हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के वर्ष 2016 के निर्णय की अवहेलना कर रहे हैं जिसमें उच्च न्यायालय ने सभी तरह के चार्जेज़ की वसूली पर रोक लगाई थी।

उन्होंने प्रदेश सरकार से एक बार पुनः मांग की है कि वह निजी स्कूलों में फीस,पाठयक्रम व प्रवेश प्रक्रिया को संचालित करने के लिए तुरन्त कानून बनाए व रेगुलेटरी कमीशन का गठन करे।

इसके साथ ही छात्र अभिभावक मंच ने निजी स्कूलों की भारी फीस व मनमानी लूट पर रोक लगाने के लिए आगामी केबिनेट बैठक में ही कानून व रेगुलेटरी कमीशन के प्रारूप को अंतिम रूप देने की मांग की है। मंच ने प्रदेश सरकार को चेताया है कि अगर प्रदेश सरकार ने तुरन्त यह कानून व रेगुलेटरी कमीशन स्थापित न किया तो अभिभावक मंच एक बार पुनः आंदोलन का बिगुल बजा देगा व मंच के बैनर तले अभिभावक सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करेंगे।

Photo by rupixen.com on Unsplash

कैम्पस वॉच

एच.पी.यू के करोड़ो के इ.आर.पी सिस्टम की सुरक्षा की खुली पोल, रिजल्ट घोषित हुआ नहीं फिर भी छात्र कर रहे डाउनलोड

HP University ERP System hacking 1

शिमला– हिमाचल प्रदेश विश्विद्यालय की एक और बड़ी लापरवाही का कारनामा सामने आया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के इकाई अध्यक्ष विशाल सकलानी ने कहा है कि विश्वविद्यालय की ई.आर.पी. प्रणाली में गड़बड़ियों का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। प्रशाशन टेस्टिंग के नाम पर छात्रों का गलत परिणाम घोषित करता आया है, लेकिन इस बार तो बिना टेस्टिंग के ही छात्र टोरेंट सॉफ्टवेयर से वह रिजल्ट डाउनलोड कर रहे हैं जो अभी घोषित ही नहीं हुए। जिसकी वजह से एक बार फिर पूरे प्रदेश के छात्रों को मानसिक तनाव जैसी स्थिति में डाल दिया है।

उन्होंने कहा है कि जिस तरह से परिणाम घोषित हुए बिना किसी अन्य सॉफ्टवेयर से लिंक बदल कर डाउनलोड हो रहे हैं वह परिणामों की गोपनीयता पर सवाल खड़ा करता है और ई.आर.पी (ERP) को एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ा करता है।

जब यह जानकारी सामने आई कि मात्र एक टोरंट अपल्लिकएशन से बी.ए (BA),बी.एस.सी(B.Sc),बी.कॉम (B.Com) के छात्रों के परिणाम डाउनलोड हो रहे है। टोरंट आम तौर पर मनोरंजक वीडियो देखने और फिल्मे डाउनलोड करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एप्लिकेशन है। उन्होंने कहा है कि प्रशाशन ने जैसे तैसे ए ग्रेड ले लिया हो लेकिन अभी भी मामूली समस्याओं का निपटारा नहीं हो पा रहा है।

ये भी पढ़ें:एचपीयू के छः करोड़ ईआरपी घोटाले में जांच की मांग, निजी कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का आरोप

ए ग्रेड यूनिवर्सिटी में डी ग्रेड ई.आर.पी कब तक?

विशाल ने यह भी कहा है कि अगर ऐसे ही टेस्टिंग के नाम पर विश्वविद्यालय गलत परिणाम घोषित करने लगे और मात्र एक टोरंट एप्लिकेशन में आसानी से परिणाम मिलने लगे तो ऐसे में विश्वविद्यालय की ई.आर.पी प्रणाली की गुणवत्ता और गोपनीयता का स्तर गिरता नजर आता है। प्रसाशन ने ई.आर.पी. के लिए करोड़ों का बजट निकाल कर वाहवाहियां लूटी लेकिन वास्तव में परिणाम सबके सामने हैं।

उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद लंबे समय से प्रशाशन को ई.आर.पी. की खामियों को लेकर सचेत करने का काम कर रही है। विद्यार्थी परिषद के बार-2  ई.आर.पी. की खामियों को दूर करने की मांग उठाने के बावजूद खामियों का स्तर बढ़ा है।

उन्होंने कहा कि इस बार तो लापरवाही की सारी हदें प्रशासन ने पार कर दी हैं , जब बिना घोषणा के परिणाम एक सॉफ्टवेयर से छात्र डाउनलोड कर रहे हैं। ऐसे में ऑनलाइन प्रणाली में गोपनीयता को लेकर ढील बरती गई है। यह समस्त छात्र समुदाय के साथ धोखा है और उन्होंने मांग की है कि कम्पनी के ऊपर भी कार्यवाही की जाए व उनका उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए ताकि ऐसी लापरवाही भविष्य में न हो।

उन्होंने मांग की है कि विश्वविद्यालय की ऑनलाइन प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए और जो भी खामियां इस ऑनलाइन प्रणाली में हैं उन्हें दूर करे ताकि छात्रों को समस्याओं का सामना न करना पड़े। ऑनलाइन सिस्टम का लक्ष्य छात्रों को सहूलियत प्रदान करना है लेकिन इसकी खामियों के कारण छात्र अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

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विश्वविद्यालय में हॉस्टल से जबरन शिफ्ट करने पर फूटा छात्रों का गुस्सा, कहा कुलपति कमेटियों की आड़ में कर रहे प्रताड़ित

HPU Hostel Student Protest

शिमला-आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के वाई एस पी हॉस्टल के छात्रों ने प्रैस विज्ञप्ति जारी की। छात्रों ने कहा कि पिछले 29 जुलाई को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों को जबरन दूसरे हॉस्टल शिफ्ट करने का फरमान जारी किया गया था।

छात्रों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के कुलपति कमेटियों की आड़ में छात्रों को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है। वाई एस पी हॉस्टल के छात्रों ने आज से पहले भी एडवाइजरी कम मॉनिटरिंग कमेटी के सभी सदस्यों को इस बारे में अवगत कराया था। लेकिन प्रशासन फिर भी छात्रों को कोई राहत देने की कवायद नहीं कर रहा था।आज वाई एस पी हॉस्टल के तमाम छात्रों ने कमेटी के अध्यक्ष डी एस अरविंद कालिया के ऑफिस के बाहर घेरा डाला।

छात्रों ने बताया कि सभी कमेटी के सदस्य भी भी मौजूद थे।छात्रों के आक्रोश को दबाने के लिए प्रशासन ने पुलिकर्मियों और क्यू आर टी को बुलाया गया लेकिन छात्र फिर भी वही डटे रहे।छात्रों का कहना है कि उन्हें भी मीटिंग में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था लेकिन उनका पक्ष नहीं सुना गया।कॉफ्रेंस हॉल में हुई वार्ता पूरी तरह से विफल रही और इस वार्ता में कोई भी निर्णय नहीं लिया गया।उल्टे कमेटी के अध्यक्ष अरविंद कालिया ने छात्रों को ये कहकर धमकाया कि नियमों को रातो रात बदल दिया जाएगा।
HPU Hostel Student Protest 2

छात्रों ने कहा कि हॉस्टल शिफ्टिंग तानशाही का नमूना है जिसे बर्दाश्त नही किया जाएगा। प्रशासन पहले ही होस्टल को जबरन खाली करने की अधिसूचना जारी कर चुका है।गौरतलब है कि प्रशासन ये तुक दे रहा है कि नए छात्रों को एक हॉस्टल में रखा जाएगा।लेकिन वाई एस पी हॉस्टल की क्षमता 160 छात्रों की है, दूसरी तरफ नए छात्रों को हॉस्टल इस संख्या से ज्यादा अलॉट होगे। ऐसे में प्रशासन का तर्क बेबुनियाद है तथा किसी छुपी हुई साजिश के तहत ये फरमान जारी किया गया है।

छात्रों ने आरोप लगाया है कि यदि कमेटी के अध्यक्ष अरविंद कालिया निर्णय लेने के लिए कुलपति का इंतजार कर रहे है तो किस बात के लिए कमेटी के अध्यक्ष बने है। छात्रों ने कहा कि प्रशासन विश्वविद्यालय की छवि को खुद ही बदनाम करने पर तुला है।नए छात्रों को संशय है कि कहीं सीनियर छात्र सच में ही नए छात्रों को तंग करते होगे।लेकिन आज तक विश्वविद्यालय के इतिहास में रैगिंग का कोई भी मामला दर्ज नहीं है।छात्रों ने चेतावनी दी है कि वे किसी भी सूरत में हॉस्टल खाली नहीं करेगे चाहे उन्हे किसी भी हद तक जाना पड़े।

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हिमाचल के निजी स्कूलों के सामने घुटने टेक रही सरकार, न इंस्पेक्शन पूरी, न ही करवा पायी पीटीए का गठन

Inspection report of himachal Pradesh's Private Schools

शिमला-लगभग दो महीने के विरोध प्रदर्शन के बावजूद निजी स्कूलों की हर साल भारी-भरकम फीस वृद्धि और अतिरिक्त मनमानी वसूली के सताए अभिभावकों को प्रदेश सर्कार से कोई रहत मिलती नज़र नहीं आ रही।

शिक्षा विभाग कितनी कठोर कार्रवाई करने में सक्षम है यह इसी से पता चलता है कि विभाग निजी स्कूलों में पीटीए का गठन तक नहीं करवा पाया। छात्र-अभिभावक मंच की माने तो भारी फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर विभाग से कार्रवाई की अपेक्षा करना केवल दिल को तसल्ली देने का कार्य है।

मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ने कहा है कि शिक्षा विभाग इंस्पेक्शन रिपोर्ट पर कार्रवाई की आड़ में केवल जनता का आई वॉश कर रहा है। शिक्षा विभाग के अधिकारी निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए न्यूनतम कार्य तक नहीं कर पाए हैं।

सिर्फ 47% स्कूलों का ही कर पाया इंस्पेक्शन कार्य, रिपोर्ट भी सार्वजानिक नहीं

उन्होंने कहा कि 1472 स्कूलों में से केवल 638 स्कूलों की रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय में पहुंची है। इसका मतलब है कि केवल 43 प्रतिशत स्कूलों में ही इंस्पेक्शन का कार्य सम्पन्न हुआ है। केवल 43 प्रतिशत स्कूलों की रिपोर्ट आने से स्पष्ट है कि न तो शिक्षा विभाग ने 57 प्रतिशत स्कूलों की इंस्पेक्शन की है और न ही इन स्कूलों ने शिक्षा विभाग में अपना रिकॉर्ड जमा करवाने की जहमत उठाई है। इस तरह आधे से ज़्यादा स्कूल इंस्पेक्शन व रिकॉर्ड इकट्ठा करने के दायरे से बाहर रह गए हैं। उन्होंने उच्चतर शिक्षा निदेशक से इस बाबत प्रश्न किया है कि आखिर क्यों 57 प्रतिशत स्कूलों की इंस्पेक्शन रिपोर्ट शिक्षा विभाग के पास नहीं पहुंची है। वह यह भी बताएं कि इन निजी स्कूलों में इंस्पेक्शन न करने वाले अधिकारियों व अपना रिकॉर्ड जमा न करने वाले निजी स्कूलों,इन दोनों पक्षों पर शिक्षा विभाग ने क्या कार्रवाई अमल में लायी है।
उन्होंने गम्भीर चिंता व्यक्त की है कि क्या शिक्षा विभाग द्वारा गठित 72 इंस्पेक्शन टीमें 18 दिन में इंस्पेक्शन का कार्य पूर्ण नहीं कर सकती थीं।

जब निजी स्कूलों की इंस्पेक्शन इस वर्ष हुई तो बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित करने का क्या तुक

छात्र अभिभावक मंच ने शिक्षा विभाग के उस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है जिसमें उसने कहा है कि इस वर्ष बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित किया जाएगा। मंच ने उच्चतर शिक्षा निदेशक को चेताया है कि वह अभिभावकों के सब्र का इम्तिहान न लें व बढ़ी हुई फीसों को इसी साल समायोजित करें।

उन्होंने कहा कि जब निजी स्कूलों की इंस्पेक्शन इस वर्ष हुई व निजी स्कूलों ने मनमानी इस वर्ष की है तो फिर बढ़ी हुई फीसों को अगले वर्ष समायोजित करने का क्या तुक व तर्क है। इस से साफ नजर आ रहा है कि शिक्षा निदेशक डिले टैक्टिकस का इस्तेमाल करके मामले को अगले वर्ष तक खींचना चाहते हैं ताकि अभिभावकों का गुस्सा शांत हो जाए व आगामी वर्ष तक अभिभावक बढ़ी हुई फीस की बात भूल जाएंगे।

उच्चतर शिक्षा निदेशक को भली-भांति मालूम है कि निजी स्कूल मार्च,जून व सितंबर में तीन इंस्टॉलमेंट्स में फीस लेते हैं। अभी तक सभी निजी स्कूलों ने फीस की केवल मार्च की एक इन्सटॉलमेंट ली है तथा जून व सितंबर की दो फीस इंस्टॉलमेंट्स बाकी हैं। यह बढ़ी हुई फीस जून व सितंबर की इन दो इंस्टॉलमेंट्स में आसानी से समायोजित की जा सकती थी परन्तु ऐसा न करके शिक्षा निदेशक अगले वर्ष फीस समायोजित करने की बात कह रहे हैं जिस से साफ है कि वह निजी स्कूलों के चंगुल में हैं। उन्होंने इस बात पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है कि शिक्षा निदेशक सब कुछ जानते हुए भी छात्रों व अभिभावकों को ठगने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षा निदेशक को साफ कर दिया है कि वह बढ़ी हुई फीसों को इसी वर्ष की फीस की दो इंस्टॉलमेंट्स में समायोजित करवाएं अन्यथा आंदोलन का अगला पड़ाव अनिश्चितकालीन के लिए उच्चतर शिक्षा निदेशालय ही होगा।

स्कूल सत्र के दो महीने बीतने के बावजूद भी नहीं करवा पाया पीटीए के गठन

शिक्षा का अधिकार कानून 2009,मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2014 की गाइडलाइनज़ व 27 अप्रैल 2016 का हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय स्पष्ट कहते हैं कि हर निजी स्कूल में पीटीए का गठन आवश्यक रूप से होना चाहिए। इसके अनुसार पीटीए का गठन सत्र शुरू होने के एक महीने के भीतर हर हाल में होना चाहिए। निर्णयानुसार हर निजी स्कूल में पीटीए के गठन के लिए सरकारी स्कूल के अधिकारी की पीटीए चुनाव अधिकारी के रूप में डयूटी लगनी चाहिए थी। इसी सरकारी अधिकारी की देख-रेख में पीटीए का गठन होना चाहिए जिसमें लोकतांत्रिक तरीके से 75 प्रतिशत संख्या अभिभावकों की होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि स्कूल सत्र के दो महीने बीतने के बावजूद भी पीटीए के गठन के लिए न तो सरकारी अधिकारियों के नामों का ऐलान शिक्षा विभाग ने किया है और न ही किसी भी स्कूल में तय नियमों के अनुसार पीटीए का गठन हुआ है। जिन निजी स्कूलों ने पीटीए की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाए बिना ही डम्मी पीटीए का गठन किया है उन पर भी शिक्षा विभाग ने शिक्षा का अधिकार कानून,एमएचआरडी गाइडलाइनज़ व हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना पर कोई कार्रवाई नहीं कि है। शिक्षा विभाग केवल खानापूर्ति करना चाहता है।

अन्य राज्यों की तर्ज़ पर क्यों नहीं कर रहा त्वरित करवाई

मंच का मानना है कि अगर शिक्षा विभाग वास्तव में ही निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने के लिए गम्भीर होता तो इस वक्त अन्य राज्यों की तर्ज़ पर एक्शन मोड में आ चुका होता व अवहेलना करने वाले स्कूलों पर ठोस कार्रवाई हो चुकी होती।

विभाग ने बार-बार नोटिसों की अवहेलना करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई तक नहीं की है। अगर विभाग गम्भीर होता तो कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में निजी स्कूलों पर जिलाधीश के कार्रवाई मॉडल को फॉलो करता व अवहेलना करने व भारी फीसें बढ़ाने वाले स्कूलों पर भारी फाइन लगाता ताकि भविष्य में कोई भी स्कूल मनमानी करने की हिम्मत तक नहीं कर पाता। इसी 19 अप्रैल को नोएडा के जिलाधीश ने 14 निजी स्कूलों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी व भारी फीसें वसूलने वाले दो स्कूलों को पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया था। इनमें से एपीजे स्कूल को 4 लाख रुपये व केम्ब्रिज स्कूल को एक लाख रुपये जुर्माना लगाया था। जिलाधिकारी ने सभी 14 स्कूलों को बढ़ी फीस वापिस लेने के लिए केवल एक दिन का समय दिया था व ऐसा न करने वाले स्कूलों पर कॉड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर एक्ट 1973 की धारा 107 के तहत मुकद्दमे दर्ज किए थे। हिमाचल प्रदेश के बड़े-बड़े निजी स्कूल लगातार मनमानी कर रहे हैं परन्तु शिक्षा विभाग इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा है।

कार्रवाई करने के बजाए दी जा रही छूट पर छूट

विभाग की ओर से केवल मुख जुबानी कार्रवाई चल रही है व हकीकत में कोई एक्शन नहीं हो रहा है। जहां नोएडा के जिलाधिकारी ने निजी स्कूलों पर छापेमारी के 24 घण्टे के भीतर उनकी मनमानी को रोकने के लिए कार्रवाई अमल में ला दी वही दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश का शिक्षा विभाग पिछले दो महीनों से नोटिस पर नोटिस देने के बावजूद भी फीसें कम न करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई करने के बजाए छूट पर छूट देता जा रहा है। इसी से स्पष्ट है कि शिक्षा विभाग दबाव में कार्य कर रहा है।

हिमाचल प्रदेश का शिक्षा विभाग पिछले दो महीनों से नोटिस पर नोटिस देने के बावजूद भी फीसें कम न करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई करने के बजाए छूट पर छूट देता जा रहा है। इसी से स्पष्ट है कि शिक्षा विभाग दबाव में कार्य कर रहा है।

अब मंच आरटीआई के ज़रिए स्वयं निजी स्कूलों की लूट जनता के सामने लाएगा मंच

मंच ने निर्णय लिया है कि शिक्षा विभाग द्वारा इंस्पेक्शन रिपोर्टें सार्वजनिक न करने के कारण अब मंच सूचना के अधिकार(आरटीआई) के ज़रिए स्वयं ही इन निजी स्कूलों की लूट जनता के सामने लाएगा।

सूचना के अधिकार के तहत निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी सहित अन्य सभी तरह की जानकारी इकट्ठा की जाएगी। जो भी स्कूल तथ्यों को छिपाने की कोशिश करेगा अथवा गलत जानकारी देगा उस स्कूल पर न्यायिक कार्रवाई के बारे में भी मंच काम करेगा। निजी स्कूलों द्वारा गलत जानकारी देने पर उन पर कानूनी कार्रवाई अमल में लाने से कोई भी गुरेज़ नहीं किया जाएगा। उन्होंने शिमला के उपायुक्त से मांग की है कि वह इन निजी स्कूलों पर शिकंजा कसें। उन्होंने उपायुक्त से पूछा है कि वह निजी स्कूलों की मनमानी पर खामोश क्यों हैं। उन्होंने मांग की है कि निजी स्कूलों पर नियमों की अवहेलना करने व मनमानी करने पर कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 के तहत धारा 107 के तहत कार्रवाई अमल में लायी जाए।

इंस्पेक्शन टीमों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें अन्यथा होगा आंदोलन

छात्र अभिभावक मंच ने 23 अप्रैल को उच्चतर शिक्षा निदेशक तथा संयुक्त शिक्षा निदेशकों व उप निदेशकों के मध्य हुई बैठक की कार्यवाही की अधिसूचना जारी करने की मांग की है। मंच ने शिक्षा अधिकारियों से पूछा है कि वे निजी स्कूलों पर कार्रवाई का अपना एक्शन प्लान बताएं। मंच ने एक बार पुनः उच्चतर शिक्षा निदेशक को चेताया है कि वह इंस्पेक्शन टीमों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें अन्यथा आंदोलन होगा।

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