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अनुराग ठाकुर को केंद्रीय मंत्री बनने पर भी नहीं है अपनी जिम्मेदारियों का एहसास, जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान जमकर उड़ी कोरोना प्रोटोकॉल की धज्जियाँ

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शिमला- केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश में पांच दिन की जन आशीर्वाद यात्रा पर आए थे। इस दौरान चंड़ीगढ़, सोलन, शिमला, बिलासपुर, मंडी, हमीरपुर तथा काँगड़ा तक 630 किलोमीटर का सफर तय किया। इस जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कोरोना नियमो की जमकर धज्जियां उड़ी। इनके कार्यक्रमों में उपस्थित जनता के साथ-2 नेताओं ने भी कोरोना नियमो का पालन नहीं किया। खुद केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ कई अन्य मंत्री और विधायक भी बिना मास्क और समाजिक दूरी का पालन न करते हुए दिखे।

धर्मशाला में प्रेसवार्ता के दौरान जब एक पत्रकार ने कोरोना प्रोटोकॉल को लेकर सवाल किये तो केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर कोई भी जवाब नहीं दे पाए ,केवल धन्यवाद कहा। इस दौरान वहां भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप और मंत्री सरवीण चौधरी भी मौजूद थी। सुरेश कश्यप ऐसा सवाल पूछने पर हंसने लगे और मुस्कुराते हुए अनुराग की तरफ देखने लगे। इनमे से किसी भी नेता ने मास्क नहीं लगाया था। जब पेट्रोल और डीजल की बढ़ती हुई कीमतों को लेकर केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर से सवाल किया गया तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

सवाल यह उठता है की कोरोना के नियम क्या आम लोगों के लिए ही बने है। प्रदेश सरकार ने कोरोना नियमो का उलंघन करने वालों पर चालान काटने की प्रकिया शुरू की है। क्या चालान ऐसी जगह नहीं काटे जाते जहां ये नेता लोग इतनी सारी भीड़ इकठा करते है? क्या इनके भीड़ इकठा करने पर कोरोना नहीं फैलता? आखिर पत्रकार के कोरोना प्रोटोकॉल पर सवाल करने पर अनुराग ठाकुर की बोलती क्यों बंद हो गई? बात सिर्फ नियमो की नहीं है बात यह है की नियम बनाये क्यों गए। ये नियम सभी सुरक्षा के लिए बनें  हैं।  यह गर्व की बात है कि अनुराग ठाकुर को केंद्रीय मंत्री का दर्जा मिला है। लेकिन यह शर्म की बात है की उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं है। ऐसी जन आशीर्वाद यात्रा करके वह क्या साबित करना चाहते थे?  क्या आने वाले उप चुनाव के लिए यह सब किया जा रहा है ?

वैज्ञानिकों ने कोरोना की तीसरी लहर की चेतावनी दी है।  ऐसे में भी राजनितिक दल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। कोरोना के कारण प्रदेश में हजारों तथा देश में लाखों लोगों की मृत्यु हो चुकी है।  इस महामारी में कई बच्चे अनाथ हो गए है तथा कई लोगो का रोजगार चला गया है। ऐसी स्थिति में ये भीड़ इकट्ठी करना क्या जरूरी है? इस संकट के समय में अगर कोई व्यक्ति किसी को कॉल भी करता है तो कॉल के माध्यम से भी कोरोना के नियमो का सख्ती से पालन करने के लिए प्रेरित किया जाता है तो दूसरी तरफ राजनैतिक दल कोरोना को बढ़ावा देने के लिए राजनितिक रैलियां आयोजित कर रहे है। ये गैरज़िम्मेदराना हरकतें केवल भाजपा तक सिमित नहीं हैं , बल्कि अन्य राजनितिक दल भी करोना के नियमो का पालन नहीं कर रहे है। अगर किसी नेता या मंत्री को कोरोना हो जाये तो वह बड़े से बड़े अस्पताल में अपना ईलाज करवाता है।   पर आम आदमी को कोरोना हो जाये तो उनको अस्पताल में जाकर लाइन में लगना पड़ता है और बीएड तक नसीब नहीं होते ।

बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर में भी मौत का तांडव देखने को मिला था जिसमे लाखों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था, अस्पताल में कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल पा रहे थे,शमशान घाटों के बाहर लाशों की इतनी लंबी कतारें लगी थी कि लाशों को जलाने के लिए कई दिनों का इंतजार करना पड़ता था। लाशों को जलाने के लिए लकड़ियां की भी कमी पड़ रही थी,  लाशो को श्मशान घाट तक पहुँचाने के लिए एम्बुलेंस भी नहीं मिल रही थी और लाशों को कन्धों पर उठाकर शमशानघाट तक ले जाना पद रहा था। हमारे माननीय मंत्री और नेताओं के लिए ये सब कोई माईने नहीं रखता। मायने रखती है तो सिर्फ एक चीज़ – राजनितिक स्वार्थ। इसके लिए चाहे लोगों की जान ही दांव पर क्यों न लगनी पद जाये।

बता दें कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने एक बयान में कहा था कि पर्यटकों के आगमन से राज्य के विभिन्न हिस्सों में कोरोना का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। उन्होंने विवाह समारोह, दावतें आदि को कोरोना फैलने का कारण माना था। अब सवाल ये उठता है कि ऐसे राजनितिक कार्यक्रमों के आयोजन से क्या कोरोना नहीं फैलता? इतनी भारी भरकम भीड़ इकठी करके सरकार क्या साबित करना चाहती है? ये बात सिर्फ भाजपा की ही नहीं, प्रदेश के अन्य राजनितिक दल भी पीछे नहीं है।

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हिमाचल में पिछले साल की तुलना में तेजी घटा हिम आच्छादित क्षेत्र, सर्वाधिक कमी सतलुज बेसिन में

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शिमला– हाल ही में जलवायु परिवर्तन केंद्र हिमाचल और अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (इसरो) अहमदाबाद की रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश में लगातार हिम आच्छादित क्षेत्र कम होता जा रहा है। यह पूरे हिमाचल और उतर भारत के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि हिमाचल और खासकर हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी पर ही उतर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर टिकी हुई है। अगर ऐसा ही हाल रहा तो यह देश की जल सुरक्षा का सवाल भी बन जाएगा।

हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्र सर्दियों के मौसम में बर्फ के रूप में ही वर्षा होती है। प्रदेश का एक तिहाई भौगोलिक हिस्सा सर्दियों के मौसम में बर्फ की मोटी चादर से ढका रहता है। हिमाचल से बहने वाली चिनाब, ब्यास, पार्वती, बास्पा, स्पिती, रावी, सतलुज जैसी नदियां और सहायक नदियां सर्दियों में पड़ने वाली बर्फ पर निर्भर है। यही बर्फ पिघल कर उतर भारत के व्यापक कृषि मैदानों को सींचती है। यही नहीं ये नदियां हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखाएं हैं।

अक्तुबर से मई तक की शरद् ऋतु का मूल्यांकन उपरोक्त विभागों द्वारा किया गया है। यह आकलन उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों और डाटा का इस्तेमाल कर किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय के लिए बर्फ एक जरूरी संसाधन है। बर्फबारी का अध्ययन जल विज्ञान और जलवायु विज्ञान के लिए बेहद आवश्यक है। चिनाब, ब्यास, रावी और सतलुज बेसिन में हुई बर्फबारी का अध्ययन करते हुए पाया गया है कि पिछले साल यानी 2018-19 की तुलना में इस साल यानी अक्तुबर 2020-मई 2021 के दौरान बर्फबारी में काफी कमी आई है।

चिनाब बेसिन में पिछले साल की तुलना में औसतन 8.92 प्रतिशत की कमी, ब्यास बेसिन में 18.54 प्रतिशत, रावी बेसिन में 23.16 प्रतिशत, सतलुज बेसिन में 23.49 प्रतिशत की कमी आई है। ये कमी बहुत ही गंभीर स्थिति को दर्शाती हैं। 2019-20 में चिनाब बेसिन का बर्फ आच्छादित क्षेत्र 7154.11 वर्ग किलोमीटर था जो कि 2020-21 में 6515.91 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इसी प्रकार ब्यास बेसिन 2457.68 से 2002.03 वर्ग किलोमीटर, रावी बेसिन 2108.13 वर्ग किलोमटीर से 1619.82 वर्ग किलोमीटर और सतलुज 11823.1 वर्ग किलोमीटर से 9045 वर्ग किलोमीटर रह गया। कुल मिलाकर पूरे हिमाचल में 23542 वर्ग किलोमीटर से घट कर 19183 वर्ग किलोमीटर इलाका बर्फ आच्छादित रह गया।

उपरोक्त अध्ययन दर्शाता है कि बर्फ आच्छादित एरिया में सर्वाधिक कमी सतलुज बेसिन में हुई है। जहां पर सीधे तौर पर 2778 वर्ग किलोमीटर का इलाका कम हुआ है। पूरे हिमाचल में 4359 वर्ग किलोमीटर का इलाका कम हुआ है इस में से आधे से अधिक अकेले सतलुज बेसिन बर्फीय इलाका कम होना पर्यावरणवादियों के लिए चिंता का विषय है। सतलुज नदी यहां की सबसे लंबी नदी है जिसमें बास्पा और स्पिति नदी बेसिन भी आते हैं। अगर पूरे सतलुज बेसिन का आकार देखा जाए तो, तिब्बत के हिस्से को भी मिलाकर 22665 वर्ग किलोमीटर बैठता है।

इस पर पर्यावरण अध्ययन समूह हिमधरा के प्रकाश भंडारी चिंतित स्वर में कहते हैं, इसका कोई एक कारण नहीं है, कई कारणों ने मिलकर इस स्थिति का निर्माण किया है और इसका बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए। असल बात यह है कि अगर ग्लेशियर यूं ही पिघलते रहे तो यह उतर भारत की जल सुरक्षा के लिए खतरा बन जाएंगे। ये ग्लोबल वार्मिंग ही है जिससे वैश्विक स्तर पर जलवायु में बदलाव हो रहे हैं। इसके प्रभावों को घटाने या बढ़ाने में स्थानीय मौसम की भी भूमिका होती है । अगर  हम उच्च हिमालय क्षेत्रों में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं, पर्यटन और अन्य विकास की बड़ी गतिविधियों को नियंत्रित कर सके तो हो सकता है ग्लेशियरों के खत्म होने की दर को कम किया सकता। यह इस लिए भी जरूरी है कि जिस इलाके में यह सब हो रहा है वह भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण इलाका है।

यह चिंता इस बात से भी बढ़ जाती है कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट, ‘2021 स्टेट ऑफ क्लाइमेट सर्विसेज़’ के दावे के अनुसार, 20 वर्षों (2002-2021) के दौरान स्थलीय जल संग्रहण में 1 सेमी. प्रति वर्ष की दर से गिरावट दर्ज की गई है। इन क्षेत्रों में भारत भी शामिल है, जहां संग्रहण में कम-से-कम 3 सेमी प्रति वर्ष की दर से गिरावट दर्ज की गई है। कुछ क्षेत्रों में यह गिरावट 4 सेमी. प्रति वर्ष से भी अधिक रही है। डब्ल्यूएमओ के विश्लेषण के अनुसार, भारत ‘स्थलीय जल संग्रह में गिरावट का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट’ है। भारत के उत्तरी भाग में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।  मानव विकास के लिए जल एक प्रमुख आधार है। लेकिन पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का केवल 0.5 प्रतिशत ही उपयोग योग्य है और मीठे जल के रूप में उपलब्ध है।

आमतौर पर कहा जा सकता है कि विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसा हो रहा है। लेकिन अगर हम विशेष रूप से हिमाचल के आसपास की गतिविधियों पर नजर दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि विकास के नाम पर बनाए गए बड़े बांध, सिमेंट उद्योग, सड़कें व अन्य बड़ी परियोजनाएं इसके लिए साफ तौर पर जिम्मेवार है। ये स्थानीय मौसम को सीधे रूप से प्रभावित करती हैं। इस को समझने के लिए सतलुज नदी सही उदाहरण है। सतलुज बेसिन का बर्फ आच्छादित इलाका सर्वाधिक कम हुआ है और पर्यावरण समूहों की अध्ययन रिपोर्टों पाया गया है कि इसी नदी पर सर्वाधिक बांध भी हैं। पूरी सतलुज नदी को बांधों में तब्दील कर दिया गया है। सबसे नीचे भाखड़ा बांध जिसका आकार 168 वर्ग किलोमीटर और भंडारण क्षमता 9.340 घन कि.मी. है। इसके बाद कोल डैम जो सुन्नी तक 42 किलोमीटर तक फैला हुआ है, जिसकी कुल भंडारण क्षमता 90 मिलियन क्यूबिक मीटर है। नाथपा झाखड़ी परियोजना जो कि 27.394 कि.मी. लंबी है। हिडनकोस्ट ऑफ हाईड्रो पावर नामक रिपोर्ट का दावा है कि हिमाचल की कुल जल विद्युत क्षमता 27,436 मेगावाट है और अकेली सतलुज नदी की क्षमता 13,322 मेगावाट है। इसी कारण सतलुज नदी पर ही ज्यादातर जल विद्युत परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं। अब तक हिमाचल में 27 जल विद्युत परियोजनाएं स्थापित हैं और 8 निर्माणाधीन हैं। किन्नौर पूरे देश में जल विद्युत उर्जा का गढ़ बना हुआ है जहां पर 1500 मेगावाट और 1000 मेगावाट के दो बड़ी परियोजनाओं सहित 10 रनिंग ऑफ द् रिवर परियोजनाएं जारी हैं और 30 स्थापित की जानी हैं। ये एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। यह भी सोचने का विषय है की अगर हिम आवरण क्षेत्र ही नहीं बचेगा तो इन परियोजनों का क्या होगा?

जब बांध बनाते हैं तो भारी मात्रा में पानी जमा होता है। बांध के अंदर बहुत सारे गांव, पेड़ों आदि का मलबा भी समा जाता है। पानी जब ठहरा हुआ होता है तो वह सूर्य से गर्मी प्राप्त कर आस-पास के इलाके में जलवास्पीकरण से धुंध का निर्माण करता और साथ में मिथेन गैस उत्पन्न करता है। मंडी जिला के तत्तापानी में कोल बांध से बनी झील का अनुभव बताता है कि इलाके में भारी मात्रा में धुंध रहने लगी है जो कि पहले नहीं होती थी। 30 और 40 के दशक शिकारी देवी और कमरुनाग को चोटियों पर लगभग 6 महीने तक बर्फ रहती थी जो अब मात्र 2 महीने मुश्किल से रुक पाती । शिकारी देवी और कमरुनाग की वायु मार्ग दूरी तत्तापानी झील से मात्र 26 से 30 किलोमीटर है। वहीं दाड़लाघाट, सुंदरनगर की सिमेंट फैक्टरियों से भी इनकी दूरी अधिक नहीं है। इलाके के बुजुर्गों का कहना है कि धुंध से इलाके में गर्मी बढ़ गई है। धुंध से बनने वाले बादलों से मौसम गर्म होने के चलते बर्फ जल्दी पिघलने लगी है। बुजुर्ग कहते हैं फैक्टरियों और बांधों ने उनके इलाके को बर्बाद कर दिया है। इन बांधों का असर फसलों पर भी पड़ा है।

अगर इसी तरह से बड़े बांध, जल विद्युत परियोजनाएं और कारखानों का विस्तार हिमाचल में होता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब यहां पर भी मैदानों की तरह धरती तपने लगेगी और इस से मौसम परिवर्तन से यहां की कृषि-बागवानी भी बरबाद हो जाएगी। ध्यान देने की बात है जो जल विद्युत परियोजनाएं “ग्रीन एनर्जी” के रूप पेश की जा रही हैं, जबकि यही परियोजनाएं उच्च हिमालय क्षेत्रों में मौसम परिवर्तन के लिए बड़े कारणों में से एक हैं।

 

लेखक: गगनदीप सिंहहिमधारा से (Environment Research and Action Collective)

 

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हि.प्र. मंत्रिमण्डल के निर्णय: 27 तारीख से खुलेंगे स्कूल, शिक्षा विभाग में भरे जायेंगे 8000 पद

hp cabinet decision september 24, 2021

शिमला– प्रदेश मंत्रीमंडल की बैठक शुक्रवार 24 सितम्बर को आयोजित हुई जिसमे स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रदेश में वर्तमान कोविड-19 स्थिति पर प्रस्तुतियां दी र्गइं। बैठक में नौवीं से बारहवीं कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए इस माह की 27 तारीख से स्कूल खोलने का निर्णय लिया गया है। दसवीं और बाहरवीं कक्षाओं के विद्यार्थी सप्ताह में सोमवार, मंगलवार और बुधवार जबकि नौवीं और ग्यारहवीं कक्षाओं के विद्यार्थी वीरवार, शुक्रवार और शनिवार को विद्यालयों में उपस्थित होंगे। आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं और परीक्षाएं जारी रहेंगी।

मंत्रिमण्डल ने पार्ट-टाइम मल्टी टास्क वर्कर्ज पाॅलिसी 2020 के प्रावधानों के अनुसार उच्चत्तर और प्रारम्भिक शिक्षा विभागों के तहत शैक्षणिक संस्थानों में बहुद्देशीय कार्यकर्ताओं के 8000 पदों को सृजित कर भरने का निर्णय लिया है। इस नीति के अनुसार एक शैक्षणिक वर्ष में 10 महीनों के लिए 5625 रुपये प्रतिमाह मानदेय इन बहुद्देशीय कार्यकताओं को प्रदान किया जाएगा।

मंत्रिमण्डल ने राज्य में जेबीटी और सी एण्ड वी अध्यापकों के अन्तर जिला स्थानान्तरण के लिए स्थानान्तरण नीति में संशोधन करने का निर्णय लिया गया, जिसके अन्तर्गत दूसरे जिले में स्थानान्तरण के लिए निर्धारित वर्तमान कार्यकाल को 13 वर्ष से घटाकर पांच वर्ष किया गया है, जिसमें अनुबन्ध अवधि भी शामिल है और वर्तमान तीन प्रतिशत कोटे को बढ़ाकर पांच प्रतिशत करने का निर्णय लिया गया है।

बैठक में प्रदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में आउटसोर्स पर रखे गए आईटी अध्यापकों के मानदेय में एक अप्रैल, 2021 से 500 रुपये प्रतिमाह बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।

मंत्रिमण्डल ने कुल्लू जिला की मनाली तहसील की ग्राम पंचायत नसोगी के गांव छियाल में नया आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केन्द्र खोलने को स्वीकृति प्रदान की है।

बैठक में वन प्रशिक्षण संस्थान एवं रेंजर महाविद्यालय सुन्दरनगर का नाम परिवर्तित कर हिमाचल प्रदेश वन अकादमी रखने को स्वीकृति प्रदान की है ।

राज्य में बड़ी/मेगा/एंकर इकाइयों को राज्य में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए प्रदेश मंत्रिमण्डल ने हिमाचल प्रदेश औद्योगिक निवेश नीति एवं नियम 2019 के अन्तर्गत प्रदेश में कस्टमाइजड पैकेज ऑफ इन्सेंटिवज फाॅर मेगा इन्डस्ट्रीयल प्रोजैक्टस के लिए प्रस्ताव का प्रारूप तैयार करने को स्वीकृति प्रदान की गई।

बैठक में राजस्व विभाग में नायब तहसीलदार के 20 पदों को नियमित आधार पर सीधी भर्ती के माध्यम से भरने को स्वीकृति प्रदान की है।

बैठक में क्षतिग्रस्त क्रैश बैरियरों को बदलने/रख-रखाव की नीति को भी स्वीकृति प्रदान की गई।

बैठक में हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना का नाम परिवर्तित कर मुख्यमंत्री गृहिणी सुविधा योजना करने का निर्णय लिया है।

बैठक में हिमाचल हेल्थकेयर योजना-हिमकेयर का नाम परिवर्तित कर मुख्यमंत्री हिमाचल हेल्थकेयर योजना-हिमकेयर रखने का भी निर्णय लिया गया है।

मंत्रिमण्डल ने कांगड़ा जिला के बैजनाथ में आवश्यक पदों के सृजन और भरने के साथ जल शक्ति विभाग का नया खण्ड खोलने का निर्णय लिया।

बैठक में कुल्लू जिला के मनाली क्षेत्र में राजकीय उच्च विद्यालय पलचान, जाणा और शिरड को वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला और राजकीय माध्यमिक विद्यालय हलान-1 को राजकीय उच्च विद्यालय में स्तरोन्नत करने व विभिन्न श्रेणियों के 22 पदों के सृजन के साथ भरने को स्वीकृति प्रदान की है।

बैठक में जिला मण्डी के सराज विधानसभा क्षेत्र में शिलीलारजी और दमसेड में नए प्राथमिक विद्यालय खोलने का निर्णय लिया गया।

बैठक में जिला मण्डी में राजकीय माध्यमिक पाठशाला शालागड़ को राजकीय उच्च विद्यालय और राजकीय उच्च विद्यालय धरोट धार को राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला में स्तरोन्नत करने का भी निर्णय लिया गया है।

मंत्रिमण्डल ने हिमाचल प्रदेश कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर के सुचारू संचालन के लिए विभिन्न श्रेणियों के 10 पदों के सृजन के साथ इन्हें भरने को स्वीकृति प्रदान की गई।

मंत्रिमण्डल ने बिलासपुर जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र स्वारघाट को आवश्यक पदों के सृजन के साथ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में स्तरोन्नत करने का निर्णय लिया है।

बैठक में जिला कुल्लू के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र अरसू को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र निथर को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में स्तरोन्नत करने का निर्णय लिया गया।

बैठक में कुल्लू जिले के जगातखाना, घाटू, बागीपुल और उरतू में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोलने और इन स्वास्थ्य संस्थानों के प्रबन्धन के लिए आवश्यक पदों के सृजन के साथ भरने का निर्णय लिया गया।

बैठक में जिला कुल्लू के बंजार क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र गडसा को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में स्तरोन्नत करने के साथ इस स्वास्थ्य संस्थान के लिए आवश्यक पदों के सृजन का निर्णय लिया गया है।

 

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सरबजीत सिंह बॉबी की संस्था पर आईजीएमसी प्रशासन ने लगाया बिजली,पानी चोरी और अराजकता फ़ैलाने का आरोप

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शिमला– शिमला के आईजीएमसी (IGMC) हॉस्पिटल में ऑलमाइटी ब्लेसिंग्स (Almighty Blesings) संस्था द्वारा चलाए जाने वाले लंगर को लेकर हुए विवाद ने तूल पकड़ ली है। जिस तरीके से पुलिस बल का प्रयोग कर लंगर बंद करवाया गया उसने लगभग सभी लोगों को हैरानी में डाल दिया है। आम लोगों के साथ-2 कांग्रेस भी इस का कड़ा विरोध कर रही है। सवाल उठ रहे हैं कि सात साल से जरूरतमंद लोगों की सेवा करके संस्था ने कौन सा अपराध कर दिया जो पुलिस बल का प्रयोग कर अस्पताल प्रशाशन ने लंगर बंद करवा दिया। प्रशासन पर आरोप लगया जा रहा है कि किसी अपने चहते को ये जगह मुहैया करवाने के लिए ये सब किया गया है।

पर आईजीएमसी के एम एस डॉक्टर जनक राज ने संस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने संस्था द्वारा लंगर के आयोजन के लिए इस्तेमाल हो रहे अस्पताल के बिजली और पानी को चोरी करार दिया है और संस्था को आ रहे धन के स्त्रोतों पर भी सवाल खड़े किये हैं। उनका मानना है की ये सब कार्य भले इंसान की करनी नहीं लग रहे। उन्होंने ने ये भी आरोप लगाए कि संस्था सेवा के नाम पर अराजकता फैला रही है।

जनक ने मीडिया से सोमवार को आयोजित प्रेस वार्ता में कहा है कि यह मुद्दा वर्तमान समय का नहीं है। 2014 में सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे की ना कोई जगह दी जाए ना ही कोई अन्य गतिविधि की इजाज़त दी है केवल बनी बनायी चाय और खिचड़ी को बाँटने की इजाज़त दी गयी थी। वर्ष 2016 में इस संस्था ने चाय बिस्किट बाँटने का कार्य शुरू किया था। उसके बाद इन्होने कैंसर अस्पताल के अंदर खाना बनाने का कार्य शुरू किया। वहाँ पर एक आग की घटना हुई थी और उस वक्त संस्था के संस्थापक ने लंगर बंद करने की घोषणा की थी। उसके बाद 16 दिसम्बर 2016 को डेंटल कॉलेज के प्रिंसिपल ने पत्र के माध्यम से सूचित किया था कि यह जो निर्माण कार्य  हो रहा है यह गैर क़ानूनी है और इसका ढांचा कच्चा है यहां पर किसी भी तरह का नुकसान होता है तो उसके लिए संस्था स्वयं जिम्मेवार होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2016 में सरकार ने अस्पताल प्रशासन को इस संस्था को पहले से बने खाने को बाँटने के लिए जगह देने पर सोच विचार करने के लिए कहा था। लेकिन ऐसा कोई भी निर्णय अस्पताल द्वारा नहीं लिया गया था। उन्होंने यह भी कहा की अस्पताल के पास बहुत सारी एनजीओ (NGO) के आवेदन आते रहते है की हमे भी दान पुण्य करने के लिए जगह दी जाये। उन्होंने यह भी कहा कि भावनाओं से व्यवस्था नहीं चलती है व्यावस्था को चलने के लिए कानून और नियमो के अनुरूप कार्य करना होता है। सेवा के नाम पर अराजकता को नहीं पनपने दिया जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि अस्पताल में आने वाले मरीज और उनके साथ आये लोगो को मिल रही मदद के खिलाफ अस्पताल प्रशासन बिलकुल भी नहीं है। अस्पताल केवल नियमानुसार अपनी सम्पति को लेने के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने कहा कि अवैध कब्जा,पानी की चोरी, बिजली की चोरी, ये एक नेक नियत के इंसान के कार्य नहीं हो सकते। 22 जनवरी 2021 को इस संथा ने स्वयं घोषणा की थी कि 31 मार्च 2021 तक यह लंगर बंद कर देंगें।

उन्होंने यह भी कहा की यह संस्था जो भी कार्य कर रही है, संस्था या व्यक्ति विशेष अपनी आमदनी से नहीं कर रहे हैं। इसको लोगो के सहयोग के द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने कहा की लोगों के द्वारा दी गयी सहायता राशि का प्रयोग कहाँ हुआ और कैसे हुआ ये जानने का अधिकार उनको है। और किसी भी संस्था को प्राप्त होने वाली वित्तीय सहायता के बारें में जानकारी इंडियन सोसाटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत देनी पड़ती है। एमएस ने कहा कि इतने बड़े सेवाकार्य को चलाने के लिए काफी धन की आवश्यकता होती है। पैसा कहाँ से आ रहा है,कौन पैसा दे रहा है। इस संस्था ने प्रतिदिन तीन हजार लोगों को खाना खिलाने का दावा किया है और निशुल्क एम्बुलेंस की भी सुविधा दी है। जब यह संस्था आईजीएमसी के नाम पर काम कर रही है तो अस्पताल प्रशासन को जानने का यह अधिकार है। 21 जुलाई 2021 को उच्च न्यायलय ने संज्ञान  लिया है कि प्रदेश भर के अवैध कब्जों पर हलफनामा दायर हो।

उन्होंने सरकार से मांग की है की इस सारे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय मजिस्ट्रेट जाँच करवाई जाये। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास प्रतिदिन भिन्न-2 संस्थाओं से जगह को आवंटित करने के आवेदन आते रहते है कि अगर उनको जगह दी है तो हमें भी जगह दी जाये। एमएस  ने यह भी कहा कि अस्पताल प्रशासन से संस्था के संस्थापक खुली वार्तालाप करें। ये जाँच करने का अधिकार अस्पताल प्रशासन को है कि इतना सारा ताम झाम जो किया जा रहा है उसका फंडिग सोर्स क्या है। कहीं कोई असमाजिक तत्व इसमें सहयोग तो नहीं कर रहे, कहीं किसी गलत धारणा से कोई कार्य तो नहीं हो रहा। जनता के सामने सारा लेखा जोखा रखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अस्पताल प्रशासन फ्री में मिल रहे लंगर के खिलाफ बिलकुल भी नहीं है।

क्या है युथ कांग्रेस का कहना

हिमाचल प्रदेश युथ कांग्रेस ने आज प्रेस वार्ता में प्रदेश सरकार को जिम्मेवार ठहराते हुए कहा है कि ऐसी क्या वजह रही होगी की आईजीएमसी प्रशासन ऑलमाइटी संस्था का सारा सामान उठाकर सड़कों पर बिखेर देती है। इन्होने सरकार पर आरोप लगाया की सरकार अपने लोगों को व्यवस्थित करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है। हाल ही मे आईजीएमसी प्रशाशन ने एक मीटिंग आयोजित की और उस मीटिंग में यह प्रस्ताव पारित किया है कि इस लंगर को किसी और को दिया जायेगा। उन्होंने यह भी कहा कि बात यह नहीं है कि यह लंगर किसी और को दिया जायेगा, वह भी सेवा करेगा,यह भी सेवा कर रहे है। इस लिए प्रशाशन इस लंगर को जल्द से जल्द खाली करने की मुहीम कर रहा है।  उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि यह सरकार हर संस्थान को बर्बाद करने में तुली है और हर संस्थान का भगवाकरण किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा की युवा कांग्रेस सर्वजीत सिंह बॉबी का पूर्ण रूप से समर्थन करेगी।

क्या है कांग्रेस यंग ब्रिगेड का कहना

कांग्रेस यंग ब्रिगेड ने भी आईजीएमसी के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन किया और अस्पताल प्रशासन मुर्दाबाद, प्रदेश सरकार मुर्दाबाद के नारे लगाए। अध्यक्ष वीरेंद्र बांसटू ने कहा कि पिछले सात साल से गरीब जनता का पेट भर रहे सर्वजीत सिंह बॉबी के लंगर को अवैध बताना गलत है। उन्होंने कहा कि लंगर पर राजनीति नही होनी चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई लोगों ने यहां पर लंगर सेवा दी है। लेकिन 7 साल बाद अब जाकर आईजीएमसी प्रशासन को होश आई है। उन्होंने कहा कि अगर लंगर को बहाल नही किया जाता है तो आगामी समय मे प्रदेश की जनता इसके खिलाफ आंदोलन करेगी। बता दें कि लंगर चलाने वाले सर्वजीत सिंह बॉबी मौजूदा समय में बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं।

क्या है लोगो का कहना

इसी बीच आम लोग भी संस्था के समर्थन में आये हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि किस तरह उन्हें इस संस्था ने बुरे समय में मदद की थी।

ऐसे ही एक व्यक्ति ने कहा कि: “पिछले लोकडाउन में लोग अस्पताल में फंसे थे। मुझे पता है कि तब यहां कैसी स्थिति थी। उस समय खाने पीने की कोई सुविधा नहीं थी। पैसा होते हुई भी कहीं खाना नहीं मिल रहा था। तब सर्वजीत सिंह बॉबी ने ही उनकी मदद की थी और साथ ही साथ में मरीजों को भी खाना पैक करके दिया था। आज सरकार गरीबों के साथ अन्याय कर रही है। जो इन्होने बिजली पानी लिया वो वह घर तो नहीं ले गए लोगो की सेवा के लिए उपयोग किया है। सरदार ने इसको कोई होटल नहीं बनाया यह सब गरीब लोगों की सेवा के लिए कर रहे हैं।  

उन्होंने सरकार को इस विषय में गहराई से सोचने का निवेदन किया है।

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