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चुनौतियों के बावजूद भी बना ए ग्रेड का विश्वविद्यालय, 47 वें स्थापना दिवस पर विशेष

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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का फर्श से अर्श तक का सफर

शिमला,जुलाई,डा0 बलदेव सिंह नेगी- शिमला 22 जुलाई 1970 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डा0 यशवंत सिंह परमार द्वारा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद, प्रदेश विश्वविद्यालय अपने 47 साल पूरे कर चूका है और 48वां स्थापना दिवस 22 जुलाई को मनाया गया । इन वर्षो में विश्वविद्यालय ने कई आयामों को छुआ है और भौगोलिक दृष्टि से इस कठिन प्रदेश के लोगों को उच्च शिक्षा प्रदान करने में अपनी अहम भुमिका अदा की है।

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इसी कारण आज हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी प्रदेश की गणना शिक्षा के क्षेत्र में केरल जैसे अग्रणी राज्यो में की जाती है। इस छोटे से पहाड़ी प्रदेश में जब अंग्रजी हकूमत की ग्रीष्मकालीन पहाड़ी (समरहिल) पर हिमाचल के पहले विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उस समय क्या और कितनी चुनौतियां रही होंगी। उस एतिहासिक पृष्ठभुमि को जानने के लिए और विश्वविद्यालय की उस वक्त और वर्तमान की कार्यप्रणाली के खिट्टे मीठे अनुभवों को जानने के लिए प्रोफैसर मोहिन्दर कुमार शर्मा से डा. बलदेव सिंह नेगी द्वारा की गयी बातचीत के अंश।

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प्रो.मोहिन्दर कुमार शर्मा: संक्षिप्त परिचय

प्रो. मोहिन्दर कुमार शर्मा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट स्कूल के पहले निदेशक रहे है प्रथम पीढ़ी के शिक्षकों में से हैं जिन्हें पंजाब विश्वविद्यालय से यहां अध्यापन कार्य के लिए आमंत्रित किया गया था। प्रो. शर्मा ने ही मैनेजमेंट स्कूल को स्थापित किया और उतर भारत ही नहीं पूरे देश के प्रसिद्ध मैनेजमेंट स्कूल बनाने में अपना योगदान दिया। एमबीए प्रवेश में गुणवता कायम करने के लिए साल 1978 में एमबीए में प्रवेश मैरिट की बजाए प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश करने का श्रेय भी इन्ही को जाता है। अपने कार्यकाल में अकादमिक निष्ठावान होने के साथ-2 एक साहसी शिक्षक की छवि वाले प्रो. शर्मा विश्वविद्यालय की स्वायतता के लिए भी विभिन्न मंचों चाहे अकादमिक परिषद् हो या कार्यकारी परिषद् पर अपने अकादमिक साहस से लड़ते रहे। इसी लिए प्रो. एम.के. के नाम से मशहूर प्रोफैसर मोहिन्दर कुमार की गणना पहली पीढ़ी के निष्ठावान और साहसी शिक्षकों में की जाती है।

डा0 बलदेव सिंह नेगी: सर, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के स्थापना के 47 वर्ष पुरे हो चुके हैं आप अपने शुरुआती दौर में क्या देखते हैं कि किस माहौल में इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: डा0 यशवंत सिंह परमार, जो हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री थे उन्होंने प्रदेश के प्रौफेसर आर. के. सिंह जो उस समय मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति थे उन्हें हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का पहला कुलपति नियुक्त किया था। उस समय प्रदेश विश्वविद्यालय में भौतिक मूलढ़ांचा कुछ नही था।अंग्रेजों के समय कुछ पुराने भवनों जिसमें राजकुमारी अमृतकौर का एक पुराना मकान था जिसे तोड़कर एक ब्लाॅक का निर्माण किया और कुछ लकड़ी के ढारे जैसे बनाया गया। विश्वविद्यालय के पहले कुलपति प्रौ0 आर0 के0 सिंह बहुत दुरदर्षी व्यक्ति थे जो कहते थे किः

“ईंट और मोटर एक संसथान नहीं बनाते हैं। संसथान में विभिन्न पदों पर चलने वाले व्यक्ति संसथान को अच्छा या बुरा बनाते हैं”

नेगीः सर,आप भी वि0वि0 के पहली पीढ़ी के शिक्षकों में हैं, तो जो शुरुआती शिक्षकों की भर्तियां हुई वो किस प्रकार से हुई?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: उस समय देश के कोने-कोने से चुन-2 कर बहुत ही प्रतिष्ठित शिक्षकों को कुलपति ने यहां आमंत्रित किया था और विभिन्न विभागों का अध्यक्ष बनाया गया। मुझे याद है कि प्रोफैसर पी.एल.भटनागर को गणित विभाग का अध्यक्ष बनाया गया था । प्रो.भटनागर जो राजस्थान वि.वि. के कुलपति थे और शायद पद्मश्री आवार्डी थे। प्रो0 ऐ0सी0 जैन को कैमिस्ट्री विभाग का अध्यक्ष बनाया गया । प्रो0 रमेश चन्द जो उस समय अमेरीका के किसी वि.वि. में कार्यरत थे उन्हें बुलाकर फिजिक्स विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। प्रो.शांति स्वरूप को राजनीति शास्त्र विभाग और प्रो. डी.डी. नरूला को अर्थशास्त्र विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। प्रो. राज भण्डारी को मैनेजमेंट का और प्रो. बच्चन को हिन्दी विभागाध्यक्ष बनाया गया था, दोनो को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आमंत्रित किया गया था।

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और हां प्रो. के.पी. पाण्डे को अन्तराष्ट्रीय दुरवर्ती शिक्षा केन्द्र का निदेशक बनाया गया। यह प्रो.आर.के.की दुरदर्षिता ही थी कि उन्होंने यहां आते ही इस केन्द्र को भी खोल दिया जो शुरुआती दौर में पत्राचार के माध्यम से भारतवर्ष के कोने-कोने तक उच्च शिक्षा का विस्तार किया और प्रदेश विश्वविद्यालय को प्रसिद्ध करने के साथ वितिय मजबूती भी दी।

इस प्रकार ये सभी उच्चकोटी के शिक्षक थे। और कई प्रकार के अर्वाड वे अपने योगदान के लिए हासिल कर चुके थे। यहां से जाने के बाद बहुत सारे शिक्षक या तो किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बनकर गए या किसी राष्ट्रीय अकादमिक संस्था के निदेशक।

नेगीः सर,मिसाल के तौर पर कौन-कौन से शिक्षक बाद में कुलपति और निदेशक बने?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: ऐसे बहुत से शिक्षक थे मिसाल के तौर पर प्रो0 बी0 आर0 मेहता जो यहां राजनीति शास्त्र विभाग में थे वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.डी.वी. सिंह जो यहां मैनेजमेंट विभाग में थे वे राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.एस.एन. दुबे जो यहा गणित विभाग में थे वे भी राजस्थान के कोटा या किसी दूसरे विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.डी.डी.नरूला जो यहां अर्थशास्त्र विभाग में थे उन्हें भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद् के निदेशक बने और बाद में प्रो. जावेद आलम जो यहां राजनीति शास्त्रविभाग में थे वे भी इसी परिषद् में निदेशक बने।

नेगीः सर, विश्वविद्यालय के शुरुआती समय की कार्य प्रणाली किस प्रकार की रही?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा:देखिये भले ही उस वक़्त वि0वि0 नया था और ढारों में चल रहा था लेकिन जैसे मैंने पहले भी कहा है कि कुलपति ने देशभर के विश्वविद्यालय से चुन-चुनकर और नामी गिरामी शिक्षकों को आमंत्रित किया गया था तो गुणात्मक रूप से किसी भी पुराने विश्वविद्यालय से हमारा वि.वि. कम नहीं था। अब देखिये जो सेमेस्टर प्रणाली देश के वि0वि0 उच्चतर शिक्षण संस्थानों चाहे वि.वि. हों, प्रौद्योगिकी या मैनेजमेंट संस्थान हो उन्होंने यह सेमेस्टर प्रणाली नब्बे के दशक या बाद में लागू की लेकिन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में इसे शुरू से ही अपनाया गया।

नेगीः सर,उस समय प्रदेश विश्वविद्यालयकी कार्य प्रणाली में सवेत्ता स्वायत्तता को किस प्रकार तवज्जो दी जाती रही?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: प्रो.आर.के. सिंह जो प्रदेश विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थे उन्होंने राजनीतिक दखल को कभी बरदाश्त नहीं किया। उस समय विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद् में विभिन्न संकाय के अधिष्ठाताओं और आचार्यों के अलावा कोई भी सदस्य नहीं होता था। एक बार की बात है कि न्यू ब्याॅज होस्टल के एक कार्यक्रम में छात्रों ने कुलपति को बिना बताए तत्कालीन मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी को बतौर मुख्यातिथि बुलाया इसी मुददे पर प्रो.आर.के. ने इस्तीफा दे दिया।

नेगीः सर,जो स्वायत्तता पर हमला बोले या राजनैतिक दखल कब से बढ़ा और इसके क्या प्रभाव विश्वविद्यालय पर आप देखते हैं?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: प्रो.आर.के. सिंह के बाद प्रो. बी.एस. जोगी को कुलपति बनाया गया जो इससे पहले कृषि विभाग में निदेशक थे। वो लगभग सरकार के साथ ही चलते रहे। प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने प्रो.एल.पी. सिन्हा के समय वि.वि. के अधिनियमों में बदलाव कर वि.वि. की कार्यकारी परिषद् में राजनैतिक लोगों और नौकरशाहों को पनाह दी जिससे जो फैसले शिक्षाविद लेते थे अब वह निर्णय सरकार द्वारा सचिवालय से लिए जाने लगे।

नेगीः सर, आप के जमाने में किस-किस कुलपति के कार्यकाल को अच्छा मानते है?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: देखिये प्रो.आर.के. सिह के बाद दो कुलपतियों का कार्यकाल बहुत अच्छा रहा ऐसा मैं मानता हूँ। उसमे एक थे प्रो. एल.पी. सिन्हा और दूसरे थे प्रो.एच.पी. दिक्षित।

नेगीः सर, उनका कार्यकाल क्यों और किस तरह से अच्छा रहा?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: देखिए प्रो.आर.के. सिंह ने इस विश्वविद्यालय की एक मजबूत नींव रखी और नामी गिरामी शिक्षाविदों को बतौर शिक्षक प्रदेश वि0वि0 लाने में सफल हुए। जहां तक बात है प्रो0 एल0पी0 सिन्हा की है तो उन्होंने स्थानीय लोगों में से शिक्षक भर्ती किये। क्योंकि माटी का पूत (सन आफ द स्वायल) की बात आर0के0 सिंह के समय से ही उठनी शरू हो गई थी। कुलपति के रूप में एच0पी0 दिक्षित काफी उर्जावान व्यक्तिव के थे उन्होने वि0वि0 की वितीय स्वास्थ्य की मजबूती के लिए एन0आर0आई0 के कनसेप्ट को लाया और उन्होने तो वि0वि0 का जो दुरवर्ती शिक्षा केन्द्र था भारत से बाहर खोलने के लिए गंभीर प्रयास किए जिसमें करीब पांच देशो में तो लगभग खुलने की कगार पर थे अगर वो महीना भर और कुलपति रहते।

नेगीः सर, किस कुलपति का कार्यकाल अच्छा नहीं रहा और क्योँ ?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: देखिए वैसे तो कई कुलपति ऐसे रहे जिन्होने वि.वि. के संसाधनो का और अपनी कुर्सी का दुरूप्योग किया। लेकिन उन सब में मेरे आकलन के हिसाब से गणपति चन्द्र गुप्त का कार्यकाल बहुत ख़राब रहा। जिसमें चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से लेकर प्रोफैसर लेवल और छात्रों तक लामबन्द हुए।

नेगीः क्यों और कैसे?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: उसकी सोच और अप्रोच दोनों बहुत कम्यूनल थी। प्रदेश में जब पहली भाजपा सरकार बनी तो उन्हें कुलपति बनाया गया। उसने एक मुस्लिम शिक्षक के खिलाफ झुठे आरोप लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई की गयी। यह कहा गया कि वह हिन्दू छात्रों को गाइड नहीं करता। उनके खिलाफ 45 दिनों तक आंदोलन चला जिसमें छात्रों,कर्मचारियों और शिक्षकों तक ने बढ़चढ़ का हिस्सा लिया और गणपति चन्द्र गुप्त को बर्खास्त किया गया। कुल मिलाकर मैं यह कह सकता हूं कि प्रो.आर.के. सिंह के बाद कोई भी कुलपति उनकी कदकाठी का नहीं आया हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का नही बना।

नेगीः सर, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय पर एक आरोप लगता है कि यह पढ़ाई से ज्यादा राजनीतिक आखाड़ा बन चुका है।

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: इस स्थिति का मुल्यांकन हमे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर होने वाले हमले से जोड़कर देखना होगा। जब वि.वि. की दैनिक कार्यप्रणाली पर राजनैतिक दखल बढ़ेगा तो निश्चित तौर पर विपक्ष में बैठी दूसरी पार्टियां भी सक्रिय होंगी। उदाहरण के तौर पर वि.वि. भर्तियां अकादमिक पात्रता की बजाय राजनैतिक पृष्टभूमि को देखकर होंगी तो वि.वि. परिसर का राजनीतिक अखाड़ा बनना स्वाभाविक है।

नेगीः सर,हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र में जो राजनीति है इसका विश्वविद्यालय की छवि पर पड़ने वाले प्रभाव को आप कैसे देखते हैं?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: मैं छात्र राजनीति को साकारात्मक दृष्टि से देखता रहा हूं। हां,शिक्षकों के छात्र राजनितिक संगठनों में प्रत्यक्ष दखल का धुर विरोधी हूं। जो छात्रों के आपसी झगडे़ होते रहें हैं उसके लिए राज्य और पुलिस तथा वि0वि0 प्रशासन की एकतरफा कार्यवाही को में कारण मानता हूं। समय पर इन झगड़ों में इन तीनों अभिकरणों पर निष्पक्ष हस्तक्षेप हो तो इन्हें काबू करना कोई राॅकेट सांईंस नही।

छात्र राजनीति का प्रभाव ही है आज चाहे किसी भी पार्टी के नेतृत्व की बात करे वो विश्वविद्यालय में किसी न किसी छात्र संगठन के नेता रहें हैं और आज प्रदेश को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं । मुझे याद है कि जब में वि0वि0 के मैनेजमेंट स्कूल का निदेशक था और हमने एमबीए में गुणवता और पारदर्शिता को सुनिष्चित करने के लिए प्रवेश मैरिट आधार की बजाए प्रवेश परीक्षा करने पर ज़ोर दिया था तो उस समय जे.पी. नड्डा और राकेश वर्मा के नेतृत्व में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन ने इस के खिलाफ भूख हड़ताल की थी। आज नड्डा जी भारत सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय संभाले हुए है जो प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। ऐसे ही अनेकों नेता हैं जिन्होनें छात्र जीवन में इस परिसर में पढ़ाई के साथ-2 अपने अन्दर के नेतृत्व को निखारा है।

नेगीः सर, यह जो विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला है विस्तृत परिप्रेक्ष्य में इसका प्रभाव आप कैसे आंकते हैं?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: विश्वविद्यालयों को स्वातता राज्य विधानसभाओं और देश की संसद द्वारा प्रदान इसलिए की जाती है ताकि इन संस्थानों में जो मानवसंम्पदा तैयार हो वो अपनी भरपूर पूर्ण क्षमता से देश के विकास में अपने-2 क्षेत्र में अपनी भुमिका अदा करे।

अब इस उच्चतर संस्थानों में भी राजनैतिक दखलदांजी जब बढ़ जाती है तो भर्तियों में दखल होने से काबिल शिक्षक को भर्ती नहीं कर सकते, वितीय संसाधनों पर कैंची ये आम बात है और छात्रों की विभिन्न प्रकार के शुल्कों पर संस्थानों की निर्भरता के कारण इन संस्थानों की उपयोगिता कम हो जाती है और सरकारी और निजि में फर्क न के बरावर हो जाता है।

एक शिक्षक जब विश्वविद्यालय में भर्ती होता है कम से कम तीस पीढ़ियों को शिक्षित करता है अब यह आप ही अंदाजा लगा लो तो तीस पीढ़िया एक अच्छे शिक्षक मिलने से लाभान्वित भी हो सकती हैं और बुरे शिक्षक मिलने से नुकसान भी झेल सकती है। होगा जो भी मानवसंम्पदा तो अपने प्रदेश की ही होगी।

सिंह नेगीः सर, हांलाकि आप सेवानिवृत हो चुके हो लेकिन फिर भी आप प्रदेश विश्वविद्यालय को कहां आंकते है।

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: जिस विश्वविद्यालय ने ढारों से अपनी शुरुआत की थी इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में तो शुरुआती जमाने के मुताबिक तो काफी विकास किया हैै लेकिन जो गुणात्मक स्तर में गिरावट है वह पूरे प्रदेश के लिए चिंताजनक है। जो स्वातता पर हमला दैनिक कार्यप्रणाली में राजनैतिक दखल, वितीय संकट और मौजूदा फैकल्टी का शिक्षण कार्यो से ज्यादा प्रशासनिक और राजनैतिक कार्यों में ज्यादा दिलचस्पी लेना इस गिरावट का मुख्य कारण है जिसमें सुधार किया जा सकता है अगर प्रदेश विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को वापिस हासिल करना है तो उसके लिए सरकार वि0वि0 प्रशासन और छात्रों को गम्भीर प्रयास करने होगें।

डा0 बलदेव सिंह नेगी
फैकल्टी, अंतः विषयअध्ययन विभाग
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय , शिमला ।

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तारा हॉल स्कूल में निष्पक्ष पीटीए के गठन, परन्तु ऑकलैंड स्कूल पर अनैतिक हथकंडे अपनाने का आरोप

PTA constituted at Tarahall shimla and auckland school

शिमला-छात्र अभिभावक मंच ने ऑकलैंड व तारा हॉल स्कूलों में पीटीए के गठन को मंच के आंदोलन की जीत करार दिया है। मंच ने तारा हॉल स्कूल में निष्पक्ष पीटीए के गठन पर स्कूल प्रबंधन व अभिभावकों को बधाई दी है परन्तु ऑकलैंड स्कूल में पीटीए के गठन पर सवाल खड़े किए हैं व इसे लोकतंत्र पर काला धब्बा बताया है।

मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा व सह संयोजक बिंदु जोशी ने कहा है कि ऑकलैंड स्कूल प्रबंधन ने पीटीए के गठन के दौरान कई अनैतिक हथकंडे अपनाए। पीटीए के गठन से पहले स्कूल प्रबंधन ने कई अभिभावकों को टेलीफोन करके अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए अनचाहा दबाव बनाया व उन्हें प्रबंधन के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश की। मंच ने कहा कि इस बात की पोल बॉयज स्कूल की कक्षा दो के चुनाव के दौरान खुल गयी जब एक उम्मीदवार ने अभिभावकों को चुनाव प्रक्रिया के दौरान साफ तौर पर बोला कि उन्हें स्कूल प्रबंधन ने खड़ा किया है इसलिए अभिभावक उन्हें वोट दें। इस पर विवाद हो गया व अभिभावकों ने उस उम्मीदवार के खिलाफ खुली बगावत करके दूसरे उम्मीदवार को भारी मतों से जिता दिया।

मंच ने कहा कि ऐसा ही एक उदाहरण कक्षा छः में आया जहां पर चुनाव रोस्टर को जानबूझ कर बदलकर महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया। इस पर कक्षा छः की दोनों सेक्शनों के सभी अभिभावक खड़े हो गए व उन्होंने इसे फिक्सिंग करार दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि कक्षा छः से छात्र अभिभावक मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ही प्रतिनिधि होंगे। पूरी कक्षा ने बिना किसी चुनाव के ही विजेंद्र मेहरा को निर्विरोध चुन लिया जिसे बाद में अभिभावकों के दबाव में स्कूल प्रबंधन को मानना पड़ा।

मंच ने आरोप लगाया कि यह चुनाव पूरी तरह धांधलियों से भरपूर रहा। चुनाव के बाद चुनी गई कार्यकारी कमेटी के चुनाव में स्कूल प्रबंधन के लगभग दस लोग घुस आए व उन्होंने चुनाव को जबरन पांच मिनट में ही निपटा दिया जिसमें उन्होंने पहले से ही प्रबंधन द्वारा फिक्स उनके कुछ चहेतों को अपनी योजना के तहत मुख्य जिम्मेवारी सौंप दी। मंच ने कहा कहा कि इस कमेटी के चुनाव में इन लोगों का जबरन घुसना व कमेटी सदस्यों पर अनचाहा दबाव बनाना व उन्हें प्रभावित करना गैर संवैधानिक है। कार्यकारी कमेटी के चुनाव का नामांकन भी नहीं करवाया गया व इसे केवल एक औपचारिकता बनाकर रख दिया गया। बगैर किसी नामांकन व चुनाव के ही यह कमेटी गठित कर दी गयी।

अभिभावक मंच ने कहा कि ऑकलैंड स्कूल का पीटीए का चुनावी रोस्टर गैर संवैधानिक था। चुनाव की प्रक्रिया नर्सरी से शुरू न करवाकर जान बूझकर प्लस टू से शुरू करवाई गई। किसी भी रोस्टर में सामान्य श्रेणी से शुरुआत होकर आरक्षित श्रेणी तक जाती है परन्तु यहां पर जान बूझ कर इस रोस्टर को बदल दिया गया ताकि प्रबंधन के चहेते चुनाव में जीतें।

मंच ने निदेशक उच्चतर शिक्षा से मांग की है कि भविष्य में निजी स्कूलों में होने वाले पीटीए के गठन को और ज़्यादा पारदर्शी बनाया जाए ताकि शिक्षा के अधिकार कानून 2009,हिमाचल प्रदेश निजी शिक्षण संस्थान अधिनियम 1997 व नियम 2003 तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2014 की गाइडलाइनज़ का पूर्णतः पालन हो व ऑकलैंड स्कूल की तर्ज़ पर पीटीए गठन में धांधली न हो।

अभिभावक मंच ने कहा कि 153 साल पुराने ऑकलैंड स्कूल में आज पहली मर्तबा पीटीए का गठन हुआ। यह छात्र अभिभावक मंच की पहली जीत है व इस जैसे सभी निजी स्कूलों के गाल पर करारा तमाचा है। निजी स्कूलों की तानाशाही के दी दिन अब लद रहे हैं। मंच ने कहा है कि संघर्ष जारी है और अगला पड़ाव निजी स्कूलों में भारी फीसों व अन्य विषयों को संचालित करने के लिए विधेयक लाने का है जिसका प्रारूप उच्चतर शिक्षा निदेशक ने बना दिया है। सम्भवतः इस विधानसभा सत्र में यह विधेयक पेश हो जाएगा।

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सीवरेज सेस बढ़ा कर प्रतिमाह सौ रुपये करने से छोटे उपभोक्तों पर पड़ रहा अतिरिक्त व नाजायज आर्थिक बोझ

Shimla sewerage cess hike

शिमला-जिला कांग्रेस कमेटी शिमला शहरी ने पेयजल कंपनी द्वारा पानी बिल के साथ प्रतिमाह न्यूनतम सौ रुपये सीवरेज सेस वसूलने पर कड़ी आपत्ति जताई है ।

जिलाध्यक्ष अरुण शर्मा ने कहा की अभी तक जो सेस शुल्क 30 फीसदी लिया जाता था उसे बढ़ा कर प्रतिमाह सौ रुपये करने से छोटे उपभोक्तों पर अतिरिक्त व नाजायज आर्थिक बोझ पड़ रहा है , छोटे उपभोक्ता जो की पानी की कम खपत करते थे उस पर भी फ्लेट सौ रुपये शुल्क लगा देना तर्कसंगत नही है । निगम को इस बाबत पुनर्विचार करना चाहिए ये फ़ैसला पूरी तरह से जनविरोधी है इसे तुरंत वापस लेना चाहिए ।

जिलाध्यक्ष अरुण शर्मा ने कहा की पेयजय कंपनी द्वारा महीने के महीने पानी के बिल नही दिये जाते ऐसे मे यदि किसी उपभोक्ता को छ :माह या आठ माह बाद बिल दिया जा रहा है तो उसपर हर माह के हिसाब से सौ रुपए शुल्क जोड़ा जा रहा है, हर उपभोक्ता को हर माह सौ रुपये जोड़ने के इस गणित से पेयजल कंपनी खासा मुनफा कमा रही है और आम आदमी पर गैरजरूरी आर्थिक बोझ डाला जा रहा है जिस पर जिला कांग्रेस कमेटी कड़ी आपत्ति जताती है ।

अरुण शर्मा ने कहा कि निगम द्वारा आए दिन ही जन विरोधी व तुगलकी फैसले लिए जा रहें है, मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध करवा पाने मे नाकाम रहा निगम केवल आम आदमी की जेब से पैसे निकलवाने की फिराक मे रहता है , हर दूसरे माह किसी ने किसी तरह से कोई नया शुल्क लगाया जा रहा है , और कुछ नही मिला तो कूड़े का शुल्क बढ़ा दिया जाता है इस से जनता मे आक्रोश है ।

अरुण शर्मा ने कहा कि जिला कांग्रेस कमेटी ये मांग करती है की प्रतिमाह न्यूनतम सौ रुपए के इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए जिस से छोटे उपभोक्ताओ पर आर्थिक बोझ न पड़े अन्यथा महापौर व पेयजल कंपनी के खिलाफ जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा मोर्चा खोला जाएगा , निगम जनता पर तुगल्की फरमान लगाना बंद करें और शहर की जनता को मूलभूत सुविधाए प्रदान करने के प्रयास करे ।

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विश्वविद्यालय कैंपस में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर, प्रशासन के सामने पुख्ता सबूत पेश करने के बावजूद अधिकारियों को सरंक्षण

Corruption at its peak at hpu campus

शिमला-एस एफ आई हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने विश्वविद्यालय प्रशासन,कुलपति व प्रदेश सरकार का लगातार छात्रों की समस्यायों को नज़रंदाज़ करने व लगातार छात्र विरोधी फरमान जारी करने के विरोध में समरहिल चौक पर मुंह पर काली पटिया बांधकर विरोध प्रदर्शन किया।

सुबह से ही एस एफ आई के छात्र हाथो में विभिन्न मांगो को प्रदर्शित करते पोस्टर पकड़कर खड़े रहे।कैंपस सचिव जीवन ठाकुर ने बताया कि आज विश्वविद्यालय अपना स्थापना दिवस समारोह मना रहा है,ओर दूसरी ओर छात्र मांगो को लेकर आंदोलनरत है। छात्रों ने प्रदर्शन का अनूठा रूप दिखाया,क्योंकि कुलपति ने कैंपस में तानाशाह एजेंडा लागू कर धरने प्रदर्शन पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा रखा है। एस एफ आई ने कहा कि छात्र मुख्यत कैंपस में छात्र संघ चुनाव की बहाली की मांग कर रहे है क्योंकि लगातार कैंपस में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है।

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एस एफ आई ने कहा कि कैंपस में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है । पी एच डी के अंदर अवैध रूप से फर्जी प्रवेश हो रहा है ।एस एफ आई ने प्रशासन के सामने पुख्ता सबूत पेश भी किए लेकिन प्रशासन अपने चहेते अधिकारियों को सरंक्षण दे रहा है । स्थापना दिवस के अवसर पर आज एस एफ आई ने मुख्यमंत्री को भी मांग पत्र सौंपकर छात्र मांगो को उठाया।एस एफ आई ने मांगपत्र के माध्यम से एस सी ए चुनाव को जल्द बहाल करने की मांग की। इसके साथ साथ एस एफ आई के छात्रों से हो रहे सौतेले व्यवहार को भी प्रमुखता से उठाया ।

एस एफ आई ने आरोप लगाया कि क्योंकि कुलपति विशेष विचारधारा को सरंक्षण दे रहे है।जिसका जीता जागता प्रमाण पिछले कल ए बी वी पी के छात्रों का निष्काषन बहाली करना है।हालांकि एस एफ आई निष्काषन बहाली के विरोध में नहीं है,लेकिन विचारधारा को निष्काषन बहाली का पैमाना बनाना आखिर कहां तक जायज है?एस एफ आई के सात छात्र पिछले पांच सालों से निष्कासित है ।एस एफ आई ने मांग की है कि इन छात्रों का निष्काषन भी जल्द से जल्द बहाल किया जाए।

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एस एफ आई ने कहा कि कैंपस में विभिन्न विभागों के प्राध्यापक संघ संबंधित छात्र संगठन के पदाधिकारियों में शामिल है।कैंपस में बिना किसी डर के प्राध्यापक छात्र राजनीति में सरेआम हिस्सा ले रहे है। एस एफ आई मांग की है कि ऐसे प्राध्यापको पर कड़ी कार्रवाई की जाए।कैंपस को धांधलियों का गढ़ बनाने वाले अधिकारियों पर भी एस एफ आई ने करवाई की मांग की है क्योंकि इन लोगो की वजह से शैक्षणिक स्तर में भारी गिरावट आई है ,तथा विश्विद्यालय की छवि भी धूमिल हो रही है।विश्वविद्यालय में छात्रावासो का आभाव है। प्रशासन सभी छात्रों को हॉस्टल सुविधा देने में नाकाम है।

एस एफ आई नए हॉस्टलों के निर्माण की मांग की है तथा वर्तमान में गर्ल्स होस्टल में बन्द हुई इंटर हॉस्टल आउटिंग ,तथा ब्वॉयज हॉस्टल के छात्रों को रात के समय लाइब्रेरी ना देने वाले निर्णय को जल्द वापिस लेने की मांग की है।कैंपस अध्यक्ष विक्रम ठाकुर ने कहा कि लंबे समय से इन्हीं मांगो को प्रमुखता से प्रशासन के समक्ष उठाया था।लेकिन फिर भी अभी तक प्रशासन ने कोई भी सकारात्मक पहल नहीं की।बल्कि आवाज़ उठाने वाले छात्रों को प्रताड़ित करने में ही ध्यान दिया। एस एफ आई ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री से उम्मीद करते है कि इन मांगो पर जल्द से जल्द छात्र हितेषी पहल को अंजाम दिया जाएगा । छात्रों ने चेतावनी कि यदि ऐसा नहीं होता तो एस एफ आई हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के अंदर आंदोलन को खड़ा करेगी

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