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चुनौतियों के बावजूद भी बना ए ग्रेड का विश्वविद्यालय, 47 वें स्थापना दिवस पर विशेष

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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का फर्श से अर्श तक का सफर

शिमला,जुलाई,डा0 बलदेव सिंह नेगी- शिमला 22 जुलाई 1970 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डा0 यशवंत सिंह परमार द्वारा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद, प्रदेश विश्वविद्यालय अपने 47 साल पूरे कर चूका है और 48वां स्थापना दिवस 22 जुलाई को मनाया गया । इन वर्षो में विश्वविद्यालय ने कई आयामों को छुआ है और भौगोलिक दृष्टि से इस कठिन प्रदेश के लोगों को उच्च शिक्षा प्रदान करने में अपनी अहम भुमिका अदा की है।

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इसी कारण आज हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी प्रदेश की गणना शिक्षा के क्षेत्र में केरल जैसे अग्रणी राज्यो में की जाती है। इस छोटे से पहाड़ी प्रदेश में जब अंग्रजी हकूमत की ग्रीष्मकालीन पहाड़ी (समरहिल) पर हिमाचल के पहले विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उस समय क्या और कितनी चुनौतियां रही होंगी। उस एतिहासिक पृष्ठभुमि को जानने के लिए और विश्वविद्यालय की उस वक्त और वर्तमान की कार्यप्रणाली के खिट्टे मीठे अनुभवों को जानने के लिए प्रोफैसर मोहिन्दर कुमार शर्मा से डा. बलदेव सिंह नेगी द्वारा की गयी बातचीत के अंश।

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प्रो.मोहिन्दर कुमार शर्मा: संक्षिप्त परिचय

प्रो. मोहिन्दर कुमार शर्मा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट स्कूल के पहले निदेशक रहे है प्रथम पीढ़ी के शिक्षकों में से हैं जिन्हें पंजाब विश्वविद्यालय से यहां अध्यापन कार्य के लिए आमंत्रित किया गया था। प्रो. शर्मा ने ही मैनेजमेंट स्कूल को स्थापित किया और उतर भारत ही नहीं पूरे देश के प्रसिद्ध मैनेजमेंट स्कूल बनाने में अपना योगदान दिया। एमबीए प्रवेश में गुणवता कायम करने के लिए साल 1978 में एमबीए में प्रवेश मैरिट की बजाए प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश करने का श्रेय भी इन्ही को जाता है। अपने कार्यकाल में अकादमिक निष्ठावान होने के साथ-2 एक साहसी शिक्षक की छवि वाले प्रो. शर्मा विश्वविद्यालय की स्वायतता के लिए भी विभिन्न मंचों चाहे अकादमिक परिषद् हो या कार्यकारी परिषद् पर अपने अकादमिक साहस से लड़ते रहे। इसी लिए प्रो. एम.के. के नाम से मशहूर प्रोफैसर मोहिन्दर कुमार की गणना पहली पीढ़ी के निष्ठावान और साहसी शिक्षकों में की जाती है।

डा0 बलदेव सिंह नेगी: सर, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के स्थापना के 47 वर्ष पुरे हो चुके हैं आप अपने शुरुआती दौर में क्या देखते हैं कि किस माहौल में इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: डा0 यशवंत सिंह परमार, जो हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री थे उन्होंने प्रदेश के प्रौफेसर आर. के. सिंह जो उस समय मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति थे उन्हें हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का पहला कुलपति नियुक्त किया था। उस समय प्रदेश विश्वविद्यालय में भौतिक मूलढ़ांचा कुछ नही था।अंग्रेजों के समय कुछ पुराने भवनों जिसमें राजकुमारी अमृतकौर का एक पुराना मकान था जिसे तोड़कर एक ब्लाॅक का निर्माण किया और कुछ लकड़ी के ढारे जैसे बनाया गया। विश्वविद्यालय के पहले कुलपति प्रौ0 आर0 के0 सिंह बहुत दुरदर्षी व्यक्ति थे जो कहते थे किः

“ईंट और मोटर एक संसथान नहीं बनाते हैं। संसथान में विभिन्न पदों पर चलने वाले व्यक्ति संसथान को अच्छा या बुरा बनाते हैं”

नेगीः सर,आप भी वि0वि0 के पहली पीढ़ी के शिक्षकों में हैं, तो जो शुरुआती शिक्षकों की भर्तियां हुई वो किस प्रकार से हुई?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: उस समय देश के कोने-कोने से चुन-2 कर बहुत ही प्रतिष्ठित शिक्षकों को कुलपति ने यहां आमंत्रित किया था और विभिन्न विभागों का अध्यक्ष बनाया गया। मुझे याद है कि प्रोफैसर पी.एल.भटनागर को गणित विभाग का अध्यक्ष बनाया गया था । प्रो.भटनागर जो राजस्थान वि.वि. के कुलपति थे और शायद पद्मश्री आवार्डी थे। प्रो0 ऐ0सी0 जैन को कैमिस्ट्री विभाग का अध्यक्ष बनाया गया । प्रो0 रमेश चन्द जो उस समय अमेरीका के किसी वि.वि. में कार्यरत थे उन्हें बुलाकर फिजिक्स विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। प्रो.शांति स्वरूप को राजनीति शास्त्र विभाग और प्रो. डी.डी. नरूला को अर्थशास्त्र विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। प्रो. राज भण्डारी को मैनेजमेंट का और प्रो. बच्चन को हिन्दी विभागाध्यक्ष बनाया गया था, दोनो को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आमंत्रित किया गया था।

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और हां प्रो. के.पी. पाण्डे को अन्तराष्ट्रीय दुरवर्ती शिक्षा केन्द्र का निदेशक बनाया गया। यह प्रो.आर.के.की दुरदर्षिता ही थी कि उन्होंने यहां आते ही इस केन्द्र को भी खोल दिया जो शुरुआती दौर में पत्राचार के माध्यम से भारतवर्ष के कोने-कोने तक उच्च शिक्षा का विस्तार किया और प्रदेश विश्वविद्यालय को प्रसिद्ध करने के साथ वितिय मजबूती भी दी।

इस प्रकार ये सभी उच्चकोटी के शिक्षक थे। और कई प्रकार के अर्वाड वे अपने योगदान के लिए हासिल कर चुके थे। यहां से जाने के बाद बहुत सारे शिक्षक या तो किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बनकर गए या किसी राष्ट्रीय अकादमिक संस्था के निदेशक।

नेगीः सर,मिसाल के तौर पर कौन-कौन से शिक्षक बाद में कुलपति और निदेशक बने?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: ऐसे बहुत से शिक्षक थे मिसाल के तौर पर प्रो0 बी0 आर0 मेहता जो यहां राजनीति शास्त्र विभाग में थे वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.डी.वी. सिंह जो यहां मैनेजमेंट विभाग में थे वे राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.एस.एन. दुबे जो यहा गणित विभाग में थे वे भी राजस्थान के कोटा या किसी दूसरे विश्वविद्यालय के कुलपति बने। प्रो.डी.डी.नरूला जो यहां अर्थशास्त्र विभाग में थे उन्हें भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद् के निदेशक बने और बाद में प्रो. जावेद आलम जो यहां राजनीति शास्त्रविभाग में थे वे भी इसी परिषद् में निदेशक बने।

नेगीः सर, विश्वविद्यालय के शुरुआती समय की कार्य प्रणाली किस प्रकार की रही?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा:देखिये भले ही उस वक़्त वि0वि0 नया था और ढारों में चल रहा था लेकिन जैसे मैंने पहले भी कहा है कि कुलपति ने देशभर के विश्वविद्यालय से चुन-चुनकर और नामी गिरामी शिक्षकों को आमंत्रित किया गया था तो गुणात्मक रूप से किसी भी पुराने विश्वविद्यालय से हमारा वि.वि. कम नहीं था। अब देखिये जो सेमेस्टर प्रणाली देश के वि0वि0 उच्चतर शिक्षण संस्थानों चाहे वि.वि. हों, प्रौद्योगिकी या मैनेजमेंट संस्थान हो उन्होंने यह सेमेस्टर प्रणाली नब्बे के दशक या बाद में लागू की लेकिन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में इसे शुरू से ही अपनाया गया।

नेगीः सर,उस समय प्रदेश विश्वविद्यालयकी कार्य प्रणाली में सवेत्ता स्वायत्तता को किस प्रकार तवज्जो दी जाती रही?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: प्रो.आर.के. सिंह जो प्रदेश विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थे उन्होंने राजनीतिक दखल को कभी बरदाश्त नहीं किया। उस समय विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद् में विभिन्न संकाय के अधिष्ठाताओं और आचार्यों के अलावा कोई भी सदस्य नहीं होता था। एक बार की बात है कि न्यू ब्याॅज होस्टल के एक कार्यक्रम में छात्रों ने कुलपति को बिना बताए तत्कालीन मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी को बतौर मुख्यातिथि बुलाया इसी मुददे पर प्रो.आर.के. ने इस्तीफा दे दिया।

नेगीः सर,जो स्वायत्तता पर हमला बोले या राजनैतिक दखल कब से बढ़ा और इसके क्या प्रभाव विश्वविद्यालय पर आप देखते हैं?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: प्रो.आर.के. सिंह के बाद प्रो. बी.एस. जोगी को कुलपति बनाया गया जो इससे पहले कृषि विभाग में निदेशक थे। वो लगभग सरकार के साथ ही चलते रहे। प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने प्रो.एल.पी. सिन्हा के समय वि.वि. के अधिनियमों में बदलाव कर वि.वि. की कार्यकारी परिषद् में राजनैतिक लोगों और नौकरशाहों को पनाह दी जिससे जो फैसले शिक्षाविद लेते थे अब वह निर्णय सरकार द्वारा सचिवालय से लिए जाने लगे।

नेगीः सर, आप के जमाने में किस-किस कुलपति के कार्यकाल को अच्छा मानते है?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: देखिये प्रो.आर.के. सिह के बाद दो कुलपतियों का कार्यकाल बहुत अच्छा रहा ऐसा मैं मानता हूँ। उसमे एक थे प्रो. एल.पी. सिन्हा और दूसरे थे प्रो.एच.पी. दिक्षित।

नेगीः सर, उनका कार्यकाल क्यों और किस तरह से अच्छा रहा?

प्रोफैसर एम.के.शर्मा: देखिए प्रो.आर.के. सिंह ने इस विश्वविद्यालय की एक मजबूत नींव रखी और नामी गिरामी शिक्षाविदों को बतौर शिक्षक प्रदेश वि0वि0 लाने में सफल हुए। जहां तक बात है प्रो0 एल0पी0 सिन्हा की है तो उन्होंने स्थानीय लोगों में से शिक्षक भर्ती किये। क्योंकि माटी का पूत (सन आफ द स्वायल) की बात आर0के0 सिंह के समय से ही उठनी शरू हो गई थी। कुलपति के रूप में एच0पी0 दिक्षित काफी उर्जावान व्यक्तिव के थे उन्होने वि0वि0 की वितीय स्वास्थ्य की मजबूती के लिए एन0आर0आई0 के कनसेप्ट को लाया और उन्होने तो वि0वि0 का जो दुरवर्ती शिक्षा केन्द्र था भारत से बाहर खोलने के लिए गंभीर प्रयास किए जिसमें करीब पांच देशो में तो लगभग खुलने की कगार पर थे अगर वो महीना भर और कुलपति रहते।

नेगीः सर, किस कुलपति का कार्यकाल अच्छा नहीं रहा और क्योँ ?

प्रोफैसर एम.के. शर्मा: देखिए वैसे तो कई कुलपति ऐसे रहे जिन्होने वि.वि. के संसाधनो का और अपनी कुर्सी का दुरूप्योग किया। लेकिन उन सब में मेरे आकलन के हिसाब से गणपति चन्द्र गुप्त का कार्यकाल बहुत ख़राब रहा। जिसमें चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से लेकर प्रोफैसर लेवल और छात्रों तक लामबन्द हुए।

नेगीः क्यों और कैसे?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: उसकी सोच और अप्रोच दोनों बहुत कम्यूनल थी। प्रदेश में जब पहली भाजपा सरकार बनी तो उन्हें कुलपति बनाया गया। उसने एक मुस्लिम शिक्षक के खिलाफ झुठे आरोप लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई की गयी। यह कहा गया कि वह हिन्दू छात्रों को गाइड नहीं करता। उनके खिलाफ 45 दिनों तक आंदोलन चला जिसमें छात्रों,कर्मचारियों और शिक्षकों तक ने बढ़चढ़ का हिस्सा लिया और गणपति चन्द्र गुप्त को बर्खास्त किया गया। कुल मिलाकर मैं यह कह सकता हूं कि प्रो.आर.के. सिंह के बाद कोई भी कुलपति उनकी कदकाठी का नहीं आया हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का नही बना।

नेगीः सर, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय पर एक आरोप लगता है कि यह पढ़ाई से ज्यादा राजनीतिक आखाड़ा बन चुका है।

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: इस स्थिति का मुल्यांकन हमे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर होने वाले हमले से जोड़कर देखना होगा। जब वि.वि. की दैनिक कार्यप्रणाली पर राजनैतिक दखल बढ़ेगा तो निश्चित तौर पर विपक्ष में बैठी दूसरी पार्टियां भी सक्रिय होंगी। उदाहरण के तौर पर वि.वि. भर्तियां अकादमिक पात्रता की बजाय राजनैतिक पृष्टभूमि को देखकर होंगी तो वि.वि. परिसर का राजनीतिक अखाड़ा बनना स्वाभाविक है।

नेगीः सर,हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र में जो राजनीति है इसका विश्वविद्यालय की छवि पर पड़ने वाले प्रभाव को आप कैसे देखते हैं?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: मैं छात्र राजनीति को साकारात्मक दृष्टि से देखता रहा हूं। हां,शिक्षकों के छात्र राजनितिक संगठनों में प्रत्यक्ष दखल का धुर विरोधी हूं। जो छात्रों के आपसी झगडे़ होते रहें हैं उसके लिए राज्य और पुलिस तथा वि0वि0 प्रशासन की एकतरफा कार्यवाही को में कारण मानता हूं। समय पर इन झगड़ों में इन तीनों अभिकरणों पर निष्पक्ष हस्तक्षेप हो तो इन्हें काबू करना कोई राॅकेट सांईंस नही।

छात्र राजनीति का प्रभाव ही है आज चाहे किसी भी पार्टी के नेतृत्व की बात करे वो विश्वविद्यालय में किसी न किसी छात्र संगठन के नेता रहें हैं और आज प्रदेश को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं । मुझे याद है कि जब में वि0वि0 के मैनेजमेंट स्कूल का निदेशक था और हमने एमबीए में गुणवता और पारदर्शिता को सुनिष्चित करने के लिए प्रवेश मैरिट आधार की बजाए प्रवेश परीक्षा करने पर ज़ोर दिया था तो उस समय जे.पी. नड्डा और राकेश वर्मा के नेतृत्व में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन ने इस के खिलाफ भूख हड़ताल की थी। आज नड्डा जी भारत सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय संभाले हुए है जो प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। ऐसे ही अनेकों नेता हैं जिन्होनें छात्र जीवन में इस परिसर में पढ़ाई के साथ-2 अपने अन्दर के नेतृत्व को निखारा है।

नेगीः सर, यह जो विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला है विस्तृत परिप्रेक्ष्य में इसका प्रभाव आप कैसे आंकते हैं?

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: विश्वविद्यालयों को स्वातता राज्य विधानसभाओं और देश की संसद द्वारा प्रदान इसलिए की जाती है ताकि इन संस्थानों में जो मानवसंम्पदा तैयार हो वो अपनी भरपूर पूर्ण क्षमता से देश के विकास में अपने-2 क्षेत्र में अपनी भुमिका अदा करे।

अब इस उच्चतर संस्थानों में भी राजनैतिक दखलदांजी जब बढ़ जाती है तो भर्तियों में दखल होने से काबिल शिक्षक को भर्ती नहीं कर सकते, वितीय संसाधनों पर कैंची ये आम बात है और छात्रों की विभिन्न प्रकार के शुल्कों पर संस्थानों की निर्भरता के कारण इन संस्थानों की उपयोगिता कम हो जाती है और सरकारी और निजि में फर्क न के बरावर हो जाता है।

एक शिक्षक जब विश्वविद्यालय में भर्ती होता है कम से कम तीस पीढ़ियों को शिक्षित करता है अब यह आप ही अंदाजा लगा लो तो तीस पीढ़िया एक अच्छे शिक्षक मिलने से लाभान्वित भी हो सकती हैं और बुरे शिक्षक मिलने से नुकसान भी झेल सकती है। होगा जो भी मानवसंम्पदा तो अपने प्रदेश की ही होगी।

सिंह नेगीः सर, हांलाकि आप सेवानिवृत हो चुके हो लेकिन फिर भी आप प्रदेश विश्वविद्यालय को कहां आंकते है।

प्रोफैसर एम0के0 शर्मा: जिस विश्वविद्यालय ने ढारों से अपनी शुरुआत की थी इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में तो शुरुआती जमाने के मुताबिक तो काफी विकास किया हैै लेकिन जो गुणात्मक स्तर में गिरावट है वह पूरे प्रदेश के लिए चिंताजनक है। जो स्वातता पर हमला दैनिक कार्यप्रणाली में राजनैतिक दखल, वितीय संकट और मौजूदा फैकल्टी का शिक्षण कार्यो से ज्यादा प्रशासनिक और राजनैतिक कार्यों में ज्यादा दिलचस्पी लेना इस गिरावट का मुख्य कारण है जिसमें सुधार किया जा सकता है अगर प्रदेश विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को वापिस हासिल करना है तो उसके लिए सरकार वि0वि0 प्रशासन और छात्रों को गम्भीर प्रयास करने होगें।

डा0 बलदेव सिंह नेगी
फैकल्टी, अंतः विषयअध्ययन विभाग
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय , शिमला ।

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सुप्रीम कोर्ट के लताड़ के बाद केंद्र सरकार की टीकाकरण नीति में बदलाव, 18-44 साल तक के लोगों को फ्री मिलेगी वैक्सीन

new vaccine policy

नई दिल्ली –केंद्र सरकार ने यह घोषणा की है कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब केंद्र सरकार द्वारा करवाया जायेगा। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा।

केंद्र सरकार ने ये भी घोषणा की है कि आगामी 21 जून से 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों को मुफ्त टीका प्रदान किया जायेगा।  यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार की निति को लेकर पड़ी फटकार के बाद आया है , और इसके लिए सर्वोच्चा निरयला की प्रशंशा भी की जा रही है।

बीते हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र द्वारा इसी आयु वर्ग के टीकों के लिए राज्यों व निजी अस्पतालों को लोगों से शुल्क वसूलने की अनुमति देने को लेकर सवाल उठाए थे। न्यायालय ने कहा था कि राज्यों और निजी अस्पतालों को 18-44 साल के लोगों से टीके के लिए शुल्क वसूलने की अनुमति देना पहली नजर में ‘मनमाना और अतार्किक’है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने उदारीकृत टीकाकरण नीति और केंद्र, राज्यों और निजी अस्पतालों के लिए अलग-अलग कीमतों को लेकर केंद्र सरकार से कुछ तल्ख सवाल पूछे थे। शीर्ष अदालत देश में कोविड-19 के प्रबंधन पर स्वत: संज्ञान लिए गए एक मामले पर सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि माजूदा पालिसी के कारण नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो तो अदालतें मूकदर्शक बनी हुई नहीं रह सकत।

केंद्र सरकार ने बताया कि 75% टीकाकरण मुफ्त होगा और केंद्र के तहत, 25% का भुगतान केंद्र करेगा। ये टीका निजी अस्पतालों में लगाया जाएगा।राज्य सरकारें इस बात की निगरानी करेंगी कि निजी अस्पतालों द्वारा टीकों की निर्धारित कीमत पर केवल 150 रुपये का सर्विस चार्ज लिया जाए।

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को दीपावली तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। नवंबर महीने तक, 80 करोड़ लोगों को हर महीने निर्धारित मात्रा में मुफ्त अनाज मिलता रहेगा।

केंद्र सरकार ने कहा कि यह भी कहा कि 2014 में देश में टीकाकरण की कवरेज 60 फीसदी थी, लेकिन पिछले पांच-छह वर्षों में इसे बढ़ाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया है।

लेकिन प्रधानमंत्री ने फ़ज़ीहत से बचने के प्रयास में अपनी पहले कि पालिसी के लिए राज्य सरकारों को कसूरवार ठहरा दिय।

“ज्योंहि कोरोना के मामले घटने लगे, राज्यों के लिए विकल्प की कमी को लेकर सवाल उठने लगे और कुछ लोगों ने सवाल किया कि केन्द्र सरकार सब कुछ क्यों तय कर रही है। लॉकडाउन में लचीलापन और सभी पर एक ही तरह की बात लागू नहीं होती के तर्क को आगे बढ़ाया गया। 16 जनवरी से अप्रैल के अंत तक भारत का टीकाकरण कार्यक्रम ज्यादातर केन्द्र सरकार के अधीन चलाया गया। सभी के लिए नि:शुल्क टीकाकरण का काम आगे बढ़ रहा था और लोग अपनी बारी आने पर टीकाकरण कराने में अनुशासन दिखा रहे थे। इन सबके बीच टीकाकरण के विकेंद्रीकरण की मांग उठाई गई और कुछ आयु वर्ग के लोगों को प्राथमिकता देने के निर्णय की बात उठाई गई। कई तरह के दबाव डाले गए और मीडिया के कुछ हिस्से ने इसे अभियान के रूप में चलाया,” प्रधान मंत्री ने अपने बचाव में तर्क दिय।

 

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राज्य सरकार के पास वैक्सीन की कमी तो निजी अस्पतालों के पास कहाँ से आ रही सप्लाई?

discrimination in vaccination

शिमला- सरकार द्वारा 18 से 44 वर्ष के लिये लागू की गयी वैक्सीनेशन की नीति निंदा का विषय बन गयी है और इसे पूर्णतः भेदभावपूर्ण व असंवैधानिक करार दिया जा रहा हैI हाल ही में सरकार द्वारा युवा वर्ग के लिए जो ऑनलाइन बुकिंग के आधार पर थोड़ी बहुत वैक्सीनशन की जा रही थी वह भी सरकार के अनुसार अब वैक्सीन उपलब्ध न होने के कारण बन्द कर दी गई है। वैक्सीनेशन के लिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है, खासकर प्रदेश के दूर दराज़ इलाको में रहने वाले लोगों के लिए जो इंटरनेट की सेवा से वंचित हैंI

सुप्रीम कोर्ट ने अभी सरकार कि इस निति से असंतुष्टि जताई है।

याद रहे कि अभी सरकार 50:25:25 के अनुपात में वैक्सीन कि सप्लाई कर रही हैI इसका मतलब है कि कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार के पास रहेगा जबकि 25 – 25 प्रतिशत राज्यों और निजी हॉस्पिटलों को मुहया करवाया जायेगा

शिमला के पूर्व मेयर एवं कम्युनिस्ट पार्टी के नेता, संजय चौहान, ने सरकार द्वारा देश व प्रदेश में लागू की जा रही वैक्सीनशन नीति को लचर व भेदभावपूर्ण बताते हुए कड़ी भर्त्सना की है और सरकार से मांग की है कि इस कोविड-19 महामारी में समय पर रोकथाम हेतु 18 वर्ष की आयु से ऊपर सभी का समयबद्ध तरीके से नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्र पर मुफ़्त वैक्सीनशन कर अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करे।

चौहान ने कहा कि देश व प्रदेश में महंगी दरों पर निजी अस्पतालों व अन्य संस्थानों को युवा वर्ग की वैक्सीनशन की इजाज़त देकर आरम्भ किया गया है। यह बिल्कुल भेदभावपूर्ण व असंवैधानिक है क्योंकि भारत के संविधान की धारा 21 सभी को जीवन व धारा 14 सभी को बराबरी का अधिकार प्रदान किया गया है। इसलिए देश मे सभी युवा, वृद्ध, बच्चों, गरीब, अमीर व हर वर्ग के लोगों के जीवन की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। चौहान ने कहा कि सरकार की वैक्सीनशन को लेकर लागू नीति व कार्यप्रणाली यहां भी संदेह में आती है क्योंकि प्रदेश सरकार के अनुसार उनको वैक्सीन नहीं मिल रही है इसलिए 18 से 44 आयु वर्ग की वैक्सीनशन नहीं की जा रही है

चौहान ने पुछा है कि इन निजी अस्पतालों व संस्थानों के पास वैक्सीन कहाँ से आ रही है। चौहान ने आरोप लगया है कि सरकार का यह निर्णय स्पष्ट रूप से इन निजी अस्पतालों व संस्थानों को लाभ पहुंचाने का है और इससे कोविड-19 से पैदा हुए संकट से जूझ रहे गरीब व दूरदराज के लोग वैक्सीन से वंचित रह रहे है।

केन्द्र सरकार का कहना है कि देश में वैक्सीन की कमी नहीं होने दी जाएगी जबकि दूसरी ओर आज अधिकांश राज्य सरकारें वैक्सीन की कमी बता रही है और कह रही है कि वो जितनी वैक्सीन की मांग कर रही है उन्हें केन्द्र सरकार उतनी वैक्सीन उपलब्ध नहीं करवा रही है। जिससे सरकार को आज 18 से 44 आयु वर्ग को वैक्सीन लगाना सम्भव नहीं हो रहा है।

चौहान ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को समय और मांग अनुसार वैक्सीन उपलब्ध न करवाना भी हमारे देश के संवैधानिक संघीय ढांचे पर चोट है। इसलिए सरकार की वक्सीनेशन नीति मनमानी व तर्कहीन है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान अपने एक आदेश में केन्द्र सरकार को लताड़ लगाई है। चौहान ने मांग की है कि इसमे सरकार तुरन्त बदलाव करे और वक्सीनेशन को मुफ़्त सार्वभौमिक कर सभी को सरकार उपलब्ध करवाए।

चौहान ने कहा कि कोविड-19 महामारी से देश व प्रदेश में लाखों लोग प्रभावित है और कई मौते हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन मौतों के लिए जिम्मेदार मुख्यतः सरकार की कोविड-19 से निपटने के लिए की गई लचर नीति व आधी अधूरी तैयारी रही है।

उनका कहना है कि सरकार द्वारा उचित रूप में टेस्टिंग न करना व देश में ऑक्सिजन व अन्य मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं की कमी तथा देश मे समय रहते वक्सीनेशन न करने के कारण अधिकांश मौते हुई है। आज दुनिया में इस कोविड-19 महामारी पर काबू पाने हेतु वैक्सीनशन ही एकमात्र चारा है।

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भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री नरेंद्र बरागटा का निधन, पार्टी के नेताओं नें दी श्रद्धांजलि

narinder bragta

शिमला- शिमला जिले के जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र के विधायक एवं पूर्व मंत्री नरेंद्र बरागटा का आज सुबह निधन हो गया। नरेंद्र बरागटा के बेटे चेतन ने ट्वीट कर ये जानकारी दी। बरागटा पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती थे। बरागटा प्रदेश सरकार में मुख्य सचेतक भी थे।

बरागटा कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद पोस्ट कोविड अफेक्ट से जूझ रहे थे। वो 20-25 दिनों से पीजीआई में भर्ती थे। उनकी दूसरी बीमारी डायग्नोज नहीं हो पा रही थी और उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी।  निधन के बाद उनका शव चंडीगढ़ स्थित हिमाचल भवन लाया गया। उनका अंतिम संस्कार रविवार को पैतृक गांव तहटोली में होगा। आज उनकी पार्थिव देह कोटखाई में अंतिम दर्शन के लिए रखी जाएगी।

नरेंद्र बरागटा का जन्म 15 सितंबर 1952 को घर गांव टहटोली तहसील कोटखाई जिला शिमला में हुआ था। उनके दो पुत्र चेतन बरागटा व ध्रुव बरागटा हैं।

बरागटा 1969 में डीएवी स्कूल शिमला में छात्र संसद के महासचिव बने  तथा 1971 में एसडीबी कॉलेज शिमला के केंद्रीय छात्र संघ के उपाध्यक्ष चुने गए।

नरेंद्र बरागटा 1978 से लेकर 1982 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे । 1983 से लेकर 1988 तक जिला शिमला भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री रहे।

1993 से लेकर 1998 तक भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे।

नरेन्द्र बरागटा वर्ष 1998 में शिमला विधानसभा क्षेत्र से हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए और प्रदेश में भाजपा नेतृत्व की सरकार में बागवानी राज्य मंत्री बने।वर्ष 2007 में वह पुनः जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा के लिए चुने गए और भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए।

नरेन्द्र बरागटा वर्ष 2017 में फिर विधानसभा के लिए चुने गए और मुख्य सचेतक बनाए गए। वर्तमान में वह जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र से विधायक व सरकार में मुख्य सचेतक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे ।

मुखयमंत्री जयराम ठाकुर,जगत प्रकाश नड्डा,सुरेश कश्यप,अनुराग ठाकुर ने नरेंद्र बरागटा को श्रद्धांजलि दी।और दुःख व्यक्त किया।

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 प्रदेश में हुई बारिश,ओलावृश्टि,और तूफान से कई फलदार फसलों, घरों को भारी नुकसान, पर किसानों, बागवानों को नहीं मिला कोई मुआवजा

शिमला- प्रदेश में हुई भरी बारिश,ओलावृश्टि,और तूफान से कई फसलों को काफी नुकसान हुआ है। इससे फलदार फसलों जैसे सेब,पलम,आड़ू,खुमानी अदि...

mansoon june 2021 mansoon june 2021
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हिमाचल पहुंचा मानसून, प्रदेश में 19 जून तक खराब रहेगा मौसम, ऑरेंज अलर्ट जारी

शिमला-इस साल सामान्य से 13 दिन पहले दक्षिण पश्चिम मानसून ने हिमाचल में प्रवेश कर लिया है। शनिवार रात से...

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18 से 44 आयु वर्ग के लोगों के लिए अब होंगे पांच टीकाकरण सत्र, पंजीकरण के समय में भी परिवर्तन

शिमला- हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि 18 से 44 आयु वर्ग के लिए राज्य सरकार द्वारा खरीदी गई...

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पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन की अफवाह फैलाने पर पुलिस ने शरारती तत्वों को दी चेतवानी

शिमला-विधायक विक्रमादित्य सिंह ने सोशल मीडिया में उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के स्वास्थ्य के बारे में निराधार अफवाहों...

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हिप्र मंत्रिमण्डल के निर्णय: हिमाचल मे धारा 144 और कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट की अनिवार्यता हटी, बसें चलाने को मंजूरी

शिमला – आज हिमाचल प्रदेश सर्कार की मंत्रिमंडल की बैठक में   कई अहम निर्णय लिए गए।  दुकानें खोलने का समय...

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