बच्ची के दाखिले के लिए 3 महीने से मां-बाप दे रहे हैं स्कूल के सामने धरना

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दाखिला न मिलने नाराज़ स्कूल प्रशासन के खिलाफ धरना देते बच्ची के मां-बाप। फोटो- मोहम्मद अनस
दाखिला न मिलने नाराज़ स्कूल प्रशासन के खिलाफ धरना देते बच्ची के मां-बाप। फोटो- मोहम्मद अनस

एक मां-बाप अपनी बच्ची के ‘शिक्षा के अधिकार’ के लिए पिछले तीन महीने से उस स्कूल के सामने अनोखा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं जिसने उनकी चार साल की बेटी को एडमिशन देने से इंकार कर दिया।

1866 में इलाहाबाद में ईश्वर के प्यार, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्ष ज्ञान, सच के प्रति तड़प जैसे मूल्यों को महिलाओं के भीतर शिक्षा के माध्यम से बढ़ाने के लिए सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल की स्थापना की गई। आईसीएसई बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त यह स्कूल लड़कियों को नर्सरी से इंटर तक की शिक्षा प्रदान करता है।

स्कूल के नर्सरी डिवीजन को सेंट मेरी नर्सरी स्कूल के नाम से जाना जाता है। अप्रैल महीने में यहां L.K.G क्लास में एडमिशन के लिए फार्म निकाले गए जिसके बाद 300 बच्चों का दाखिला हुआ। इंट्रेंस के लिए लिखित परीक्षा नहीं हुई लेकिन स्कूल ने अपने बनाए नियमों के अंतर्गत लगभग पांच हज़ार इंट्रेंस फार्म्स में से 300 के लगभग बच्चियों को एडमिशन के लिए सेलेक्ट किया।

करेली निवासी रईस अहमद की बच्ची का दाखिला नहीं हो सका जिसे लेकर उन्होंने प्रधानाध्यापिका सिस्टर श्वेता सीजे से मुलाकात की और एडमिशन की दरख्वास्त लगाई। इन सबका उन पर कोई असर नहीं हुआ तो रईस अहमद ने आरटीआई के माध्यम से एडमिशन प्रोसेस की पारदर्शिता पर सवाल किए जिसका जवाब उन्हें इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि संस्थान आरटीआई के दायरे में नहीं आता।

जब कहीं से कोई राह नज़र नहीं आई तो रईस अहमद अपनी पत्नी और बेटी के साथ रोज़ाना स्कूल आने लगे और स्कूल के गेट पर बैठकर अपनी बेटी को पढ़ाने लगे। पिछले तीन महीने से उनका यह अनोखा विरोध प्रदर्शन चल रहा है लेकिन स्कूल पर किसी तरह का असर नहीं हो रहा है। रईस ने iamin से बात करते हुए कहा, “पहली लिस्ट आने के बाद मैं प्रिंसिपल से मिला उसके बाद मैं संतुष्ट होकर चला गया था लेकिन कुछ दिनों बाद एक और लिस्ट जारी की गई जिसमें कई बच्चों का एडमिशन लिया गया। पहली लिस्ट में मेरी बेटी का नाम नहीं आया तो मैंने सोचा कुछ अपने में कमी रही होगी। प्रिंसिपल ने भी कहा कि पूरी सीट फुल हो चुकी हैं। लेकिन उसके बाद भी कई बच्चों का एडमिशन हुआ लेकिन मेरी बेटी का नहीं हुआ। यदि मैं पैसा दे देता तो यहां आराम से एडमिशन हो जाता।”

स्कूल गेट पर अपनी बच्ची को रोज़ाना दस किलोमीटर दूर से लेकर आने वाले और गेट पर बैठकर पढ़ाने वाले इस कपल के अनोखे विरोध प्रदर्शन के बारे में हमने स्कूल का पक्ष जानने के लिए फोन किया। दफ्तर के लैंडलाइन पर फोन उठाने वाले व्यक्ति ने पहले तो पूरे मामले से सहमति दर्ज करवाई लेकिन प्रिंसिपल से बात करवाने से मना कर दिया। दोबारा फोन करने पर उसने इस तरह के किसी मामले का अपने स्कूल का होने से इंकार किया।

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