आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा बरकरार

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Devinderpal-Singh-Bhullar

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“उच्चतम न्यायालय ने खालिस्तान लिबरेशन फोर्स ;केएलएफ के आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की याचिका को को खारिज कर दिया”

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली बम विस्फोट के दोषी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की अर्जी शुक्रवार को ठुकरा दी।

1993 में युवक कांग्रेस कार्यालय पर हुए बम हमले में नौ लोग मारे गए थे। भुल्लर को इस मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। भुल्लर ने राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका पर विचार करने में हुई देरी के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय से फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की गुजारिश की थी।

इस बम हमले में तत्कालीन युवा कांग्रेस अध्यक्ष मनिंदरजीत सिंह बिट्टा को निशाना बनाया गया था।
उनके काफ़िले पर हुए हमले में बिट्टा तो गंभीर चोटों के साथ बच गए थे मगर उनके नौ सुरक्षाकर्मी मारे गए थे और 25 अन्य घायल हुए थे।

भुल्लर को इस जुर्म के लिए मौत की सज़ा सुनाई गईए और जांच के दौरान पाया गया कि खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स के कट्टर समर्थक थे।

शीर्ष अदालत ने भुल्लर के परिवार की याचिका पर पिछले साल 19 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। परिवार ने भुल्लर की ओर से दाखिल याचिका में कहा था कि उसकी दया याचिका पर फैसला करने में काफी देरी हुई और वह मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है इसिलए उसे सुनाई गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील किया जाए।

याचिका में दलील दी गई थी कि मौत की सजा दिए जाने के इंतजार में कैदी को लंबे समय तक जेल में रखना क्रूरता के समान है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है।
अगस्त, 2001 में निचली अदालत ने भुल्लर को मौत की सजा सुनाई थीए जिस पर 2002 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुहर लगा दी थी। इसके खिलाफ उसकी अपील को शीर्ष अदालत ने 26 मार्च , 2002 को खारिज कर दिया था।

भुल्लर ने एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। उसे भी 17 दिसंबर , 2002 को खारिज कर दिया गया था। भुल्लर ने तब सुधारात्मक याचिका दाखिल की और शीर्ष अदालत ने उसे भी 12 मार्च , 2003 को खारिज कर दिया था।

इस बीच भुल्लर ने 14 जनवरी , 2003 को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की थी। राष्ट्रपति ने आठ साल से अधिक समय के अंतराल के बाद 25 मई , 2011 को उसकी दया याचिका को खारिज कर दिया था।

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