मोमबतियां नहीं इंसानियत का जागना जरुरी है

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Awindra-Pandey

“मैं ओर मेरी दोस्त सड़क पर पडे रहे गाडि़यां आती रही हमें तड़फता देखती रही पर किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया”

सामने आया दिल्ली गैंग रेप घटना का पुरा सच जी टी वी पर देश के सामने आ कर अविन्द्ररा पाड़े ने बताया पुरा सच क्या कुछ सहा उन दोनों 16 दिस्बर की रात सबके सामने आया वह चेहरा जिसने अपनी दोस्त को उन दंरिदों से बचाने की पुरी कोशिश की अविन्द्ररा पाड़े ने रखा सबके सामने इन्सानियत का सच कि किस तरह वो और उनकी दोस्त उस बस में बैठे तो उस बस में जो लोग सवार थे उन्होंने इस तरह जाहिर किया कि वो सवारिया है और हम दोनों से किराया भी लिया , उसके बाद उन्होनें मेरी दोस्त को छेड़ना शुरु कर दिया हमारे साथ हाथा- पाई की गई। मैं और मेरी दोस्त चिल्लाती रही, मेरी दोस्त ने 100 नंबर डायल करने की कोशिश की पर फोन छीन लिया गया मेरे सिर पर रोड और शरीर पर रोड से मारा ओर मेरी दोस्त को खींच कर ले गए और ढाई घन्टें तक बस हमें लेकर सड़क पर घुमती रही और उसके बाद हमें मारने के लिए चलती हुई बस से फलाइ ओवर पर फैंक दिया और कुचलने की कोशिश की और हमारा सारा सामान भी ले लिया गया। मैं और मेरी दोस्त सड़क के किनारे पड़े रहे पर कोई हमारी मदद के लिए आगे नहीं आया गाडियां आती रही लोग थोड़ा रुक के देखते पर कोई मदद के लिए आगे नहीं आया ।

आरोपीयों ने हमें मरा समझ कर फलाइ ओवर पर फैंक दिया फिर कोई आया और उसने फोन करके किसी को बुलाया पुलिस की 3 पी सी आर वेन आए पर हमें उठाने और होस्पीटल ले जाने के बजाए किस एरिया के थाने का केस है इसे ले पुलिस वाले आपस में बहस करते रहे। हम दोनों बिना कपड़ो के पड़े थे पर किसी ने हमें जल्दी से होस्पीटल ले जाने की कोशिश नहीं की मैंने अपनी दोस्त को खुद उठा कर पी सी आर वेन मे रखा । मुझे खुद को सिर पर चोट आई थी और मेरी हालत इतनी खराब थी की मैं अपना हाथ भी नहीं उठा सकता था और पुलिस हमें सरकारी होस्पिटल में लेकर गई किसी ने बदन ढकने के लिए एक चादर तक नहीं दी। मैं होस्पिटल पहुच कर सटेचर पर पड़ा रहा किसी को रिश्तेदार को फोन लगाने को कहा जब वो होस्पिटल पहुचें तब मेरा इलाज शुरु किया गया । जब मैं तीन दिन बाद अपनी दोस्त से मिला तो वो खुश थी और लिख रही थी उनमें जीने की चाह थी । सरकार ने उसे सिंगापुर इलाज के लिए तब भेजा जब उसका शरीर उसका साथ छोड़ने वाला था और उस समय उसे विदेश इलाज के लिए भेजना बेकार निकला ।

सब कुछ चल रहा है पर सही से नहीं है । आम पब्लिक पुलिस के झंझट में नहीं पड़ना चाहती वो डरते है कि पुलिस के पास जायेगें तो पता नहीं क्या होगा। जिस किसी के साथ भी इस तरह की घटना होती है उसे वो समाज से छुपाते है क्योंकि लोग एक बार तो साहनुभूति दिखाते है पर पीठ पीछे कुछ जरुर बोलते है और इसी डर से ऐसे केस छुपाए जाते है । मैं चाहता हुं की इंसान कि सोच में बदलाव होना जरुरी है , मोमबती जला कर इसांफ नहीं होगा , इंसान को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। कानून बदलने से कुछ नहीं होगा जरुरी ये है कि ऐसी घटनाए दोबारा न हो लड़ाई अभी बाकि है और मेरी दोस्त ने अपनी कुबार्नी दे कर जनता में इंसाफ के लिए एक जज्बा जगाया है जिसे थमने नहीं देना है उसे अंजाम तक ले कर जाना है।

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