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हिमाचल में बेसहारा भटकते मनोरोगियों के लिए इन्साफ की लड़ाई में प्रशासन और पुलिस कर रही हाई कोर्ट के आदेशों की अवमानना

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शिमला- भारत अभी भी नागरिकों को सही मायने में साक्षर बनाने में बहुत पिछड़ा हुआ है! सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है! सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ना और लिखना तो सीख जाते हैं पर सही मायने में साक्षर नागरिक नहीं बना पाते! कान्वेंट और निजी स्कूल बच्चों को करियर ओरिएंटेड ( Career Oriented) ही बना पाते हैँ! पर इन स्कूलों की भरी-भरकम फीस भी आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही हैँ! गैर सरकारी संस्थाओ और कुछ सामाजिक कार्यकर्तों को छोड़ कर आम आदमी का रूझान सामाजिक कार्यों की ओर बहुत कम देखने को मिलता है! एक नागरिक का सही अर्थों में साक्षर होना समाज के लिए वरदान साबित हो सकता है! और शिमला के रहने वाले एक संवेदनशील नागरिक, सुभाष कुमार (43), इसी बात का प्रमाण हैँ!

हाल ही में शिमला की एक गैर सरकारी संस्था ने हिमाचल की सड़कों पर घूमते, बेघर, और बेसहारा मानसिक रोगियों का संवेदनशील मुद्दा उठाया! जिला प्रशाशन और पुलिस पर यह आरोप लगा की ऐसे लोगों के बारें में जानकारी मिलने पर भी कोई कदम नहीं उठाया जाता! प्रशाशन व पुलिस दोनों ही अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते पाए गए ! संस्था ने एक प्रेस वार्ता में यंहा तक कहा की उपायुक्त और पुलिस अधीक्षकों ने संविधान के मानसिक शवस्थ्य अधिनियम, 1987 की जानकारी होने से इंकार कर दिया! ऐसे कई वाक्य हैं जहाँ जिला पुलिस को बेसहारा मनोरोगियों की जानकारी दी गयी है परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है!

इससे सड़कों पर भटकते बेसहारा मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो हो ही रहा है पर इसी के साथ यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है। प्रशानिक अधिकारी और पुलिस चाहे कुछ भी कहे लेकिन सच कुछ और ही है!

ये पहली बार का वाकया नहीं है! साल 2011 में सुभाष ने इसी मुद्दे को लेकर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (CWPIL 18/2011) दायर कर पहली बार मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण का अहम् मुद्दा उठाया! सुभाष के जहन में ये बात पहली बार तब उठी जब उन्होंने एक मानसिक रूप से बीमार और बेसहारा वृद्धा को फटे कपड़ों में नाहन बाजार की सड़क पर घूमते देखा! जब सुभाष ने नजदीकी पुलिस चौकी में इसकी इत्तिला देकर इस वृद्धा की मदद की मांग की तो थाना प्रभारी ने ऐसे किसी भी प्रावधान के बारें में जानकारी होने से इंकार कर दिया व उस वृद्धा को बचाने में असमर्थता व्यक्त की!

सुभाष को इस बात पर विश्वाश नहीं हुआ की भारत के संविधान में कंही इन लाचार और अभागे नागरिकों के लिए कोई प्रावधान नहीं है! सुभाष ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत प्रशाशन से इन लोगों के बचाव पर पुलिस की भूमिका पर जानकारी मांगी! जवाब में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि मानसिक स्वस्थ्य अधिनियम 1987 के अध्याय 4, अनुभाग 23 के तहत कोई भी थाना प्रभारी ऐसे लोगों को अपनी सुरक्षा में लेकर न्यायालय में पेश कर सकता है व उसके बाद न्यायालय आगे की करवाई के आदेश दे सकता है !

जवाब पाते ही सुभाष ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्या न्यायाधीश को एक भावुक परंतु तथ्यों पर आधारित एक पत्र लिखा और कहा,

हम हमेशा लोगों के कल्याण (welfare) की, विकास, नौकरीयों और जीने के लिए बेहतर वातवरण की मांग करते हैं ! सब अपनी मांगों को लेकर एक लंबी कतार में खड़े हैँ ! इन्ही सब लोगों के बीच जो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं कुछ ऐसे भी अभागे हैं जो अपने अधिकारों के लिए खुद नहीं लड़ सकते क्योंकि मानसिक रूप से वे इस काबिल ही नहीं के ये समझ सकें की मौलिक अधिकार क्या चीज़ है या ” वेलफेयर” (welfare) का क्या अर्थ है !

हमे अक्सर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त ऐसे लोग सड़कों पर अमानवीय हालात में, कई बार अर्धनग्न अवस्था में, कूड़े से खाना ढूंढते और फुटपाथ पर सोते मिलते हैं जिनका कोई सहारा नहीं ! मैंने एसी ही एक वृद्धा के संरक्षण हेतु पुलिस के पास पहुंचा लेकिन पुलिस अधिकारी ने ऐसी किसी भी जिम्मेदारी होने की बात से इनकार किये जिसके तहत ऐसे मनोरोगियों को बचाया जा सके!

इस याचिका में सुभाष ने न्यायालय से इन मनोरोगियों के लिए न्याय की मांग उठाई! इसी याचिका (CWPIL 18/2011) का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने 4 जून 2015 को अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अनुछेद 23 के पालन को सख्त निर्देश दिए!

कोर्ट ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को कहा कि अनुछेद 23 के अन्तर्गत हर पुलिस अधीक्षक का दायित्व होगा कि वह अपने ज़िले में बेसहारा, इधर-उधर घूमने वाले मनोरोगियों को अपने संरक्षण में लेकर 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करे। इसके बाद धारा 24 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट मनोरोगी व्यक्ति की चिकित्सा के सन्दर्भ में कानून के अनुसार आदेश जारी कर उपयुक्त कार्यवाही कर सकता है।

उच्च न्यायालय ने याचिका पर दिए गए निर्देशों में यह स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि,

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 (Mental Health Act,1987) क्लॉज़ (clause) 2 (l) के अंतर्गत मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति का मतलब है वह व्यक्ति जिसे किसी भी तरह के मानसिक रोग के कारण उपचार की जरुरत हो ! क्लॉज़ (clause) 2(q) के अंतर्गत मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति के इलाज व देखभाल के लिए मनोरोगी अस्पताल या नर्सिंग होम का प्रावधान है ! इन अस्पतालों का मतलब है कि जो या तो सरकार द्वारा बनाये गए हों और जिनके रखरखाव का जिम्मा भी सरकार का हो या ऐसा अस्पताल जो किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा मानसिक रोगियों के इलाज और देखभाल के लिये बनाया गया हो!

यही मुद्दा साल 2017 में शिमला की एक गैर सरकारी संगठन, उमंग फाउंडेशन, द्वारा भी उठाया गया जिसमे स्नष्टा ने आरोप लगाया कि हिमाचल प्रदेश पुलिस सड़क पर बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के बारे में प्रदेश हाईकोर्ट के इस आदेश को नकारने में भी नहीं हिचकिचा रही !

सुभाष की याचिका पर दिए इस निर्देश के आधार पर संस्था प्रदेश के मुख्य सचिव वीसी फारका के पास पहुंची जिसे देखने के बाद विवश होकर मुख्य सचिव को यह आश्वाशन देना पड़ा कि राज्य सरकार संविधान, कानून और हाईकोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन करवाएगी। उन्होंने कहा की बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के संरक्षण, सुरक्षा, इलाज और पुनर्वास उनकी निजी प्राथमिकता रहेगा।

mentally ill in Himachal Pradesh

सुभाष ने इस बात पर ख़ुशी जाहिर कि है इस संस्था ने इस मुहीम को आगे बढ़ाया है और इन मानसिक रूप से लाचार लोगों के मौलिक अधिकारों कि सुरक्षा के लिए आवाज उठाई है! सुभाष की सभी नागरिकों से भी यही प्राथर्ना है कि जब भी लोग किसी सड़क पर भटकते या फुटपाथ पड़े मनोरोगी को देखें तो नज़दीकी पुलिस थाने में जाकर थाना प्रभारी को इसकी इत्तला देने से न कतरायें क्योंकि पुलिस कानूनी तौर पर ऐसे लोगों का संज्ञान लेने के लिए बाध्य है ! अगर कोई अधिकारी इंकार करे तो उन्हें सिर्फ इस याचिका पर दिए गए उच्च न्यायालय के आदेश कि एक प्रति देने कि जरूरत है ! साथ ही साथ सुभाष का यह भी कहना है कि जादू टोने और भूत प्रेत में फसे सभी लोगों को मनोचिकित्सा की जरूरत है! समय पर इलाज़ न मिलने पर रोगियों की हालात बिगड़ सकती है!  सुभाष का मनना है की वो इस अभियान को और आगे बढ़ाएंगे और ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आते रहेंगे!

उल्लेखनीय है की ऐसे मामलों में इलाज का पूरा खर्च सरकार उठाती है। ठीक होने के बाद मनोरोगी यदि अपने परिवार वालों का पता बताता है तो उसे सरकारी खर्चे पर उसके घर भेजने का भी कानूनी प्रावधान है। यदि ठीक होने के बाद वह किसी कारण से अपने घर नहीं लौट सकता है तो सरकार को उसके पुनर्वास केंद्र में रहने का प्रबंध करना पड़ता है।

संस्था का कहना है कि दुर्भाग्यवश हिमाचल में कुछ अपवादों को छोड़कर बेसहारा मनोरोगियों से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के प्रावधानों का पालन बिल्कुल नहीं किया जा रहा। संस्था ने कई जिला पुलिस अधीक्षकों को ऐसे मनोरोगियों की जानकारी दी, परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है। इससे इन बेसहारा मनोरोगियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है।

संस्था के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि न्यायालय के निर्देशों को देखने के बाद मुख्य सचिव ने आश्वासन दिया है की कानूनी प्रावधानों और न्यायालय के आदेशों का पूरी तरह पालन करने के निर्देश जारी किए जा रहे हैं। इनमें पुलिस विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को संबंधित कानूनों और अदालती फैसलों की जानकारी देना, आम जनता तथा विद्यार्थियों को मनोरोगियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना, पुलिस थाना स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से मनोरोगियों की पहचान करना एवं हर थाने में मनोरोगी से संबंधित मामलों को देखने के लिए एक अधिकारी को दायित्व देना शामिल है।

मानसिक स्वस्थ्य और इससे जुड़ी बिमारियों के बारें में लोगों में जागरूकता न होना बहुत बड़ी चिंता का विषय है! हाल ही में में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमे एक भटके हुए मानसिक रोगी को जिला शिमला में कई जगह लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा और उनके लातों और घूंसों को भी सहन पड़ा! मानसकि रोगों के लक्षण लोगों को डरा सकते हैँ और मानसिक स्वस्थ्य के बारे में जागरूकता न होने के कारण ये रोगी लोगों की गलतफमी का शिकार हो सकते हैँ ! पर असल में एक सभ्य और लोकतान्त्रिक समाज में इस तरह के व्यव्हार से अमानवीय कुछ नहीं हो सकता जिसमे एक मानसिक रूप से लाचार इंसान को अज्ञानता के कारण लोगों का गुस्सा सहन पड़े!

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ऐबीवीपी ने यूजी परीक्षा परिणाम मे हो रही देरी और अनियमिताओं को लेकर किया कुलसचिव का घेराव

ABVP Protest

शिमला-वीरवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद विश्वविद्यालय इकाई ने यूजी (UG ) के परीक्षा परिणाम मे हो रही देरी और अनियमिताओं को लेकर कुलसचिव का घेराव किया व उनके आफिस के बाहर धरना-प्रदर्शन किया!

ABVP protest for ug results

विद्यार्थी परिषद ने निम्न मांगो को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन को कल शाम तक का समय दिया था:

  • यूजी 6th सेमेस्टर का पूरा परीक्षा परिणाम घोषित किया जाए! छात्रों के परीक्षा परिणामों में आ रही डबल स्टार की दिक्कत को शीघ्र ठीक किया जाए!
  • यूजी 2nd और 4th सेमेस्टर का री-आप्पीयर (Re-appear ) परीक्षा परिणाम शीघ्र घोषित किया जाए!
  •  एचपीयू काउंसलिंग में अपीयर छात्रों को अपने रिजल्ट ठीक कराने की तिथि को 20 जुलाई तक किया जाए!
  •  एचपीयू के अलावा दूसरे विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रों को कॉन्फिडेंशियल रिजल्ट दिया जाए ताकि वह छात्र दूसरे विश्वविद्यालय में ऐडमिशन ले सकें!
  •  यूजी 3rd सेमेस्टर गणित के रिजल्ट को फिर से ईवैलुएट किया जाए!

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद विश्वविद्यालय इकाई ने कहा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की नाकामियों के कारण हिमाचल के हजारों छात्र हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने से वंचित रह रहे है! विद्यार्थी परिषद ने कहा है कि अगर इन सभी मांगों को शीघ्र पूरा नहीं किया गया तो विद्यार्थी पर अपना आंदोलन विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ और तेज करेगी!

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हिमाचल परिवहन की खस्ताहाल बसें, कर्मियों की कमी, पूर्व सूचना बिना रूटों का बंद करना लोगों के लिए बन रहा आफत

Poor HRTC Bus Conditions and Services

शिमला- 20 जून को बंजार में और हाल ही की 1 जुलाई को खलिनी के पास झिंझिडी में हुए दो हालिया बस हादसों ने न केवल सरकार की सुरक्षित आवागमन प्रदान करने में असमर्थता को उजागर किया है, बल्कि इन दुर्घटनाओं के पीछे के वास्तविक कारण की पहचान करने के लिए इसका मायोपिक (नाकाफी) दृष्टिकोण भी बताया है। यह कहना है ठियोग विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता राकेश सिंघा का।

सिंघा ने प्रबंध निदेशक, हिमाचल सड़क परिवहन निगम, के माध्यम से एक ज्ञापन सौंप कर 11 जुलाई से पहले आवश्यक मुद्दों के तहत एक बैठक बुलाने के लिए सरकार को नोटिस भेजा है।

इस ज्ञापन में कहा गया है कि पूरे राज्य में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या में हो रही वृद्धि और बस सेवाओं की संख्या में निरंतर में भारी अंतर है। इस अंतर को दूर करने के लिए निर्मित और स्वीकृत सड़कों पर न केवल अतिरिक्त बसें चलाने की आवश्यकता होती है बल्कि आवागमन के वर्तमान सार्वजनिक और निजी मोड को कुशलतापूर्वक और सुरक्षित रूप से चलाने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की भी आवश्यकता होती है।

सिंघा ने कहा कि इस ज्ञापन का मसौदा तैयार करते समय, पूरे राज्य के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अगर शिमला जिले के परिवहन डिपो में से कुछ में कर्मियों की चल रही कमी की जांच की जाती है, तो यह राज्य में मौजूद गंभीर स्थिति के बारे में वैश्विक दृष्टिकोण पेश करेगा।

हिमाचल प्रदेश के शिमला लोकल डिपो में अभी 240 बसें ही चल पा रही है जबकि शिमला लोकल डिपो के तहत 283 स्वीकृत बस रूट हैं, 111 चालक और 98 परिचालक कम हैं और कर्मचारियों की अत्यधिक कमी को देखते हुए 12 मार्गों को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया है। तारादेवी डिपो के तहत ड्राइवरों की कमी 55 है और कंडक्टरों का आंकड़ा 65 पर है।

सिंघा ने ज्ञापन में कहा कि रोहड़ू डिपो में स्थिति समान रूप से दयनीय है, जहां 24 बसें शून्य मान बुक में हैं यानी तय दूरी चल चुकी है और अब और चलने की स्थिति में नही है और इन बसों को एच आर टी सी सड़को पर दौड़ा रहा है जबकि इन बसों को कबाड़खाने में होना चाहिए था। इस डिपो के तहत 16 बसें 9 साल से अधिक पुरानी हैं और अभी भी चल रही हैं और हर कोई जानता है कि राज्य के अंदरूनी हिस्सों में सड़कों की स्थिति क्या है। इसके अलावा ड्राइवरों की कमी का आंकड़ा 49 है और परिचालकों की 46 है।

रामपुर डिपो के तहत जीरो वैल्यू बुक बसों की संख्या 11 है और ड्राइवरों और कंडक्टरों की कमी क्रमशः 60 और 42 है।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक परिवहन की इस तरह की दयनीय स्थिति के साथ राज्य में बस सेवाओं को सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाना संभव नहीं है। HRTC प्रबंधन राज्य में लगातार हो रहे हादसों को रोकने में नाकामयाब हो गया है। बार-बार होने वाली “मजिस्ट्रियल पूछताछ” दुर्घटनाओं की संख्या को कम करने के लिए कोई परिणाम नहीं दे पाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूछताछ केवल लोगो को दिखाने और सरकारी रिकॉर्ड के लिए की जा रही है किसी को कभी भी चूक के लिए दंडित नहीं किया जाता और प्रमुख कमियों को दूर करने के लिए कभी कोई कदम नहीं उठाया जाता है।

उन्होंने आगे कहा है कि एचआरटीसी के हालिया फैसले जिसमे “बसो में क्षमता से अधिक सवारियां न बिठाए जाने का फैसला हुआ” उससे लोगों को अधिक असुविधा हुई है। हर दिन लगभग 3 लाख छात्र इन बसों से सफर करते है लेकिन नवीनतम निर्णय के बाद वे ऐसा करने में असमर्थ हुए हैं। हजारों कर्मचारी अपने कार्यालयों तक पहुंचने में असमर्थ हैं।

उनका ये भी कहना है कि लोगों को पूर्व सूचना दिए बिना हर रोज सौ रूटों को निलंबित किया जा रहा है। यह विशेष रूप से बीमार व्यक्तियों, महिलाओं, बुजुर्गों व किसानों के लिए कठिनाइयों का कारण बना है जो अपने खेत का उत्पादन इस सार्वजनिक परिवहन से बाजार तक पहुंचते हैं। अकेले ठियोग में कई बस मार्गों को अभी निलंबित किया जा रहा है इन मार्गों में शिमला-सांभर, शिमला-अलवा, शिमला-गगनघट्टी, शिमला-माहीपुल वाया तल्ली, शिमला-मुंडो, ठियोग जारई, शिमला-श्यामनगर वाया कोटगढ़ व अन्य मुख्य है।

सिंघा ने कहा है कि ड्राइवरों व कंडक्टरों की नई भर्ती करके स्टाफ में चल रही कमी को पूरा करने के अलावा,
इन समस्याओं का कोई अस्थायी समाधान या “स्टॉप गैप सॉल्यूशन” नहीं हो सकता है, इसके अलावा उन बसों की कबाड़ में भेज दिया जाना चाहिए जो “शून्य बुक वैल्यू” यानी नकारा हो चुकी है और साथ ही नए वाहनों की खरीद की जानी चाहिए, यही इसका स्थाई समाधान होगा।

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डॉ परविंदर कौशल ने संभाला नौणी विवि के कुलपति का कार्यभार

UHF nauni's new VC Dr Parvinder Kaushal

सोलन- डॉ परविंदर कौशल ने आज डॉ वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के कुलपति का कार्यभार संभाला। उनकी नियुक्ति की अधिसूचना हिमाचल प्रदेश राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी कर दी गई है। डॉ॰ परविंदर कौशल,इससे पहलेबिरसा कृषि विश्वविद्यालय,रांची,झारखंड के बतौर कुलपति कार्यरत थे।

हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन के ग्राम कहन्नीमें जन्में डॉ कौशलनौणी विवि के पूर्व छात्र भी रह चुके हैं। उन्होनें अपनी एमएससी वानिकी की पढ़ाई विश्वविद्यालय से हासिल की है जिसके बादफ्रांस के यूनिवर्सिटी ऑफ नैंसी से फॉरेस्ट्री में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

डॉ कौशल पिछले 35 वर्षों से शिक्षण,अनुसंधान और विकास, विस्तार और प्रशासन में सक्रिय रूप से शामिल हैं, जिसके दौरान उन्होंने विभिन्न क्षमताओं में अलग अलग संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अपनी सेवाएँ दी। इनमें से प्रमुख हैं, इंडियन काउंसिल फॉर फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन देहरादून (1979-1981), पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना में असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसर (1981-1992) और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांचीमें वानिकी संकाय में डीन (2005-2009)। नौणी विश्वविद्यालय में वह पर्यावरण, जल और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राष्ट्रीय वनीकरण और पर्यावरण विकास बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक और समन्वयक के रूप डॉ कौशल ने कई वर्षो तक कार्य किया।

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डॉ कौशल ने 100 से अधिक शोध पत्र और तकनीकी रिपोर्ट प्रकाशित करने के अलावा 13 से अधिक पुस्तकों के अध्याय और मैनुअल लिखे हैं। उन्होंने 26 विश्व कांग्रेस और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया है और 63 परियोजनाओं को संभाला है। कई पुरस्कारों से सम्मानित डॉ कौशल को 1989 में राष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार और 2014 में हिमाचल श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें फ्रेंच सरकार द्वारा भी वर्ष 1984 में डॉक्टरल अनुसंधान के लिए फेलोशिप प्रदान की गई थी। इसके अलावा,उन्होंने फ्रांस, इटली, यूनाइटेड किंगडम, मैक्सिको, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, यूगोस्लाविया, बेल्जियम, हॉलैंड, स्पेन, एस्टोनिया, कनाडा, फिनलैंड, तुर्की, मलेशिया और श्रीलंका सहित कई देशों का दौरा किया है।

डॉ परविंदर कौशल ने विभिन्न महत्वपूर्ण समितियों और समूहों के सदस्य के रूप में काम किया है। इनमें प्रमुख हैं क्षेत्रीय डीन समिति दक्षिण एशिया (2009); कृषि विज्ञान में पीजी पाठ्यक्रम की समीक्षा और पुनर्गठन के लिए नेशनल कोर ग्रुप (आईसीएआर) के सदस्य; आईसीएआर की वानिकी में ब्रॉड सब्जेक्ट मैटर एरिया कमेटी (BSMA)के संयोजक (2007); इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नैचुरल रेसिंस अँड गम्स के लिए क्विनक्वीनियल रिव्यू टीम (QRT) के सदस्य(2001-2007);शेर-ए-कशमीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, श्रीनगर की मान्यता के लिए पीयर रिव्यू टीम (आईसीएआर प्रत्यायन बोर्ड) के सदस्य(2008); यूजीसी की कृषि,बागवानी और वानिकी,पर्यावरण,कौशल विकास आदि पर विभिन्नविशेषज्ञ समितियों के सदस्य (2013-2016);आईसीएआर-केंद्रीय कृषि-वानिकी अनुसंधान संस्थान झांसी के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा गठित सदस्य अनुसंधान सलाहकार समितिके सदस्य (2015-17)। डॉ कौशल ने इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फॉरेस्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (IUFRO)के रिसर्च ग्रुप ‘फॉरेस्ट स्टैंड एस्टेब्लिशमेंट ऑपरेशंस एंड टेक्नीक्स’के डिप्टी लीडर(2000-05)के रूप में भी काम किया है। वह वृक्षारोपण प्रतिष्ठान (1990-2000) पर IUFROवर्किंग पार्टी के अध्यक्ष भी रहे।

इस अवसर पर डॉ कौशल ने हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, मुख्यमंत्री श्री जय राम ठाकुर और हिमाचल प्रदेश सरकार के पूरे मंत्रीमण्डल का धन्यवाद किया। उन्होनें कहा कि उनका पूरा प्रयास रहेगा कि नौणी विश्वविद्यालय को नई ऊंचाईयों पर ले जाया जा सके।

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