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हिमाचल में बेसहारा भटकते मनोरोगियों के लिए इन्साफ की लड़ाई में प्रशासन और पुलिस कर रही हाई कोर्ट के आदेशों की अवमानना

शिमला- भारत अभी भी नागरिकों को सही मायने में साक्षर बनाने में बहुत पिछड़ा हुआ है! सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है! सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ना और लिखना तो सीख जाते हैं पर सही मायने में साक्षर नागरिक नहीं बना पाते! कान्वेंट और निजी स्कूल बच्चों को करियर ओरिएंटेड ( Career Oriented) ही बना पाते हैँ! पर इन स्कूलों की भरी-भरकम फीस भी आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही हैँ! गैर सरकारी संस्थाओ और कुछ सामाजिक कार्यकर्तों को छोड़ कर आम आदमी का रूझान सामाजिक कार्यों की ओर बहुत कम देखने को मिलता है! एक नागरिक का सही अर्थों में साक्षर होना समाज के लिए वरदान साबित हो सकता है! और शिमला के रहने वाले एक संवेदनशील नागरिक, सुभाष कुमार (43), इसी बात का प्रमाण हैँ!

हाल ही में शिमला की एक गैर सरकारी संस्था ने हिमाचल की सड़कों पर घूमते, बेघर, और बेसहारा मानसिक रोगियों का संवेदनशील मुद्दा उठाया! जिला प्रशाशन और पुलिस पर यह आरोप लगा की ऐसे लोगों के बारें में जानकारी मिलने पर भी कोई कदम नहीं उठाया जाता! प्रशाशन व पुलिस दोनों ही अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते पाए गए ! संस्था ने एक प्रेस वार्ता में यंहा तक कहा की उपायुक्त और पुलिस अधीक्षकों ने संविधान के मानसिक शवस्थ्य अधिनियम, 1987 की जानकारी होने से इंकार कर दिया! ऐसे कई वाक्य हैं जहाँ जिला पुलिस को बेसहारा मनोरोगियों की जानकारी दी गयी है परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है!

इससे सड़कों पर भटकते बेसहारा मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो हो ही रहा है पर इसी के साथ यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है। प्रशानिक अधिकारी और पुलिस चाहे कुछ भी कहे लेकिन सच कुछ और ही है!

ये पहली बार का वाकया नहीं है! साल 2011 में सुभाष ने इसी मुद्दे को लेकर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (CWPIL 18/2011) दायर कर पहली बार मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण का अहम् मुद्दा उठाया! सुभाष के जहन में ये बात पहली बार तब उठी जब उन्होंने एक मानसिक रूप से बीमार और बेसहारा वृद्धा को फटे कपड़ों में नाहन बाजार की सड़क पर घूमते देखा! जब सुभाष ने नजदीकी पुलिस चौकी में इसकी इत्तिला देकर इस वृद्धा की मदद की मांग की तो थाना प्रभारी ने ऐसे किसी भी प्रावधान के बारें में जानकारी होने से इंकार कर दिया व उस वृद्धा को बचाने में असमर्थता व्यक्त की!

सुभाष को इस बात पर विश्वाश नहीं हुआ की भारत के संविधान में कंही इन लाचार और अभागे नागरिकों के लिए कोई प्रावधान नहीं है! सुभाष ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत प्रशाशन से इन लोगों के बचाव पर पुलिस की भूमिका पर जानकारी मांगी! जवाब में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि मानसिक स्वस्थ्य अधिनियम 1987 के अध्याय 4, अनुभाग 23 के तहत कोई भी थाना प्रभारी ऐसे लोगों को अपनी सुरक्षा में लेकर न्यायालय में पेश कर सकता है व उसके बाद न्यायालय आगे की करवाई के आदेश दे सकता है !

जवाब पाते ही सुभाष ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्या न्यायाधीश को एक भावुक परंतु तथ्यों पर आधारित एक पत्र लिखा और कहा,

हम हमेशा लोगों के कल्याण (welfare) की, विकास, नौकरीयों और जीने के लिए बेहतर वातवरण की मांग करते हैं ! सब अपनी मांगों को लेकर एक लंबी कतार में खड़े हैँ ! इन्ही सब लोगों के बीच जो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं कुछ ऐसे भी अभागे हैं जो अपने अधिकारों के लिए खुद नहीं लड़ सकते क्योंकि मानसिक रूप से वे इस काबिल ही नहीं के ये समझ सकें की मौलिक अधिकार क्या चीज़ है या ” वेलफेयर” (welfare) का क्या अर्थ है !

हमे अक्सर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त ऐसे लोग सड़कों पर अमानवीय हालात में, कई बार अर्धनग्न अवस्था में, कूड़े से खाना ढूंढते और फुटपाथ पर सोते मिलते हैं जिनका कोई सहारा नहीं ! मैंने एसी ही एक वृद्धा के संरक्षण हेतु पुलिस के पास पहुंचा लेकिन पुलिस अधिकारी ने ऐसी किसी भी जिम्मेदारी होने की बात से इनकार किये जिसके तहत ऐसे मनोरोगियों को बचाया जा सके!

इस याचिका में सुभाष ने न्यायालय से इन मनोरोगियों के लिए न्याय की मांग उठाई! इसी याचिका (CWPIL 18/2011) का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने 4 जून 2015 को अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अनुछेद 23 के पालन को सख्त निर्देश दिए!

कोर्ट ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को कहा कि अनुछेद 23 के अन्तर्गत हर पुलिस अधीक्षक का दायित्व होगा कि वह अपने ज़िले में बेसहारा, इधर-उधर घूमने वाले मनोरोगियों को अपने संरक्षण में लेकर 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करे। इसके बाद धारा 24 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट मनोरोगी व्यक्ति की चिकित्सा के सन्दर्भ में कानून के अनुसार आदेश जारी कर उपयुक्त कार्यवाही कर सकता है।

उच्च न्यायालय ने याचिका पर दिए गए निर्देशों में यह स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि,

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 (Mental Health Act,1987) क्लॉज़ (clause) 2 (l) के अंतर्गत मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति का मतलब है वह व्यक्ति जिसे किसी भी तरह के मानसिक रोग के कारण उपचार की जरुरत हो ! क्लॉज़ (clause) 2(q) के अंतर्गत मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति के इलाज व देखभाल के लिए मनोरोगी अस्पताल या नर्सिंग होम का प्रावधान है ! इन अस्पतालों का मतलब है कि जो या तो सरकार द्वारा बनाये गए हों और जिनके रखरखाव का जिम्मा भी सरकार का हो या ऐसा अस्पताल जो किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा मानसिक रोगियों के इलाज और देखभाल के लिये बनाया गया हो!

यही मुद्दा साल 2017 में शिमला की एक गैर सरकारी संगठन, उमंग फाउंडेशन, द्वारा भी उठाया गया जिसमे स्नष्टा ने आरोप लगाया कि हिमाचल प्रदेश पुलिस सड़क पर बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के बारे में प्रदेश हाईकोर्ट के इस आदेश को नकारने में भी नहीं हिचकिचा रही !

सुभाष की याचिका पर दिए इस निर्देश के आधार पर संस्था प्रदेश के मुख्य सचिव वीसी फारका के पास पहुंची जिसे देखने के बाद विवश होकर मुख्य सचिव को यह आश्वाशन देना पड़ा कि राज्य सरकार संविधान, कानून और हाईकोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन करवाएगी। उन्होंने कहा की बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के संरक्षण, सुरक्षा, इलाज और पुनर्वास उनकी निजी प्राथमिकता रहेगा।

mentally ill in Himachal Pradesh

सुभाष ने इस बात पर ख़ुशी जाहिर कि है इस संस्था ने इस मुहीम को आगे बढ़ाया है और इन मानसिक रूप से लाचार लोगों के मौलिक अधिकारों कि सुरक्षा के लिए आवाज उठाई है! सुभाष की सभी नागरिकों से भी यही प्राथर्ना है कि जब भी लोग किसी सड़क पर भटकते या फुटपाथ पड़े मनोरोगी को देखें तो नज़दीकी पुलिस थाने में जाकर थाना प्रभारी को इसकी इत्तला देने से न कतरायें क्योंकि पुलिस कानूनी तौर पर ऐसे लोगों का संज्ञान लेने के लिए बाध्य है ! अगर कोई अधिकारी इंकार करे तो उन्हें सिर्फ इस याचिका पर दिए गए उच्च न्यायालय के आदेश कि एक प्रति देने कि जरूरत है ! साथ ही साथ सुभाष का यह भी कहना है कि जादू टोने और भूत प्रेत में फसे सभी लोगों को मनोचिकित्सा की जरूरत है! समय पर इलाज़ न मिलने पर रोगियों की हालात बिगड़ सकती है!  सुभाष का मनना है की वो इस अभियान को और आगे बढ़ाएंगे और ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आते रहेंगे!

उल्लेखनीय है की ऐसे मामलों में इलाज का पूरा खर्च सरकार उठाती है। ठीक होने के बाद मनोरोगी यदि अपने परिवार वालों का पता बताता है तो उसे सरकारी खर्चे पर उसके घर भेजने का भी कानूनी प्रावधान है। यदि ठीक होने के बाद वह किसी कारण से अपने घर नहीं लौट सकता है तो सरकार को उसके पुनर्वास केंद्र में रहने का प्रबंध करना पड़ता है।

संस्था का कहना है कि दुर्भाग्यवश हिमाचल में कुछ अपवादों को छोड़कर बेसहारा मनोरोगियों से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के प्रावधानों का पालन बिल्कुल नहीं किया जा रहा। संस्था ने कई जिला पुलिस अधीक्षकों को ऐसे मनोरोगियों की जानकारी दी, परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है। इससे इन बेसहारा मनोरोगियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है।

संस्था के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि न्यायालय के निर्देशों को देखने के बाद मुख्य सचिव ने आश्वासन दिया है की कानूनी प्रावधानों और न्यायालय के आदेशों का पूरी तरह पालन करने के निर्देश जारी किए जा रहे हैं। इनमें पुलिस विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को संबंधित कानूनों और अदालती फैसलों की जानकारी देना, आम जनता तथा विद्यार्थियों को मनोरोगियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना, पुलिस थाना स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से मनोरोगियों की पहचान करना एवं हर थाने में मनोरोगी से संबंधित मामलों को देखने के लिए एक अधिकारी को दायित्व देना शामिल है।

मानसिक स्वस्थ्य और इससे जुड़ी बिमारियों के बारें में लोगों में जागरूकता न होना बहुत बड़ी चिंता का विषय है! हाल ही में में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमे एक भटके हुए मानसिक रोगी को जिला शिमला में कई जगह लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा और उनके लातों और घूंसों को भी सहन पड़ा! मानसकि रोगों के लक्षण लोगों को डरा सकते हैँ और मानसिक स्वस्थ्य के बारे में जागरूकता न होने के कारण ये रोगी लोगों की गलतफमी का शिकार हो सकते हैँ ! पर असल में एक सभ्य और लोकतान्त्रिक समाज में इस तरह के व्यव्हार से अमानवीय कुछ नहीं हो सकता जिसमे एक मानसिक रूप से लाचार इंसान को अज्ञानता के कारण लोगों का गुस्सा सहन पड़े!

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शिमला में दबंगों द्वारा दलित परिवार से मारपीट, न पुलिस ने एफआईआर दर्ज़ की, न डॉक्टर ने दिया उचित उपचार: दलित शोषण मुक्ति मंच

शिमला-हिमाचल प्रदेश दलित शोषण मुक्ति मंच शिमला के ढली थाना के अन्तर्गत आने वाले परिवार के साथ पड़ोस में रहने वाले दबंगों द्वारा जातिगत उत्पीड़न और मारपीट के मामले की कडी निन्दा शिमला है।

मंच ने आरोप लगाया है कि जब पीडित परिवार एफआईआर दर्ज करवाने के लिए ढली थाने में पहुंचा तो थाना प्रभारी ने भी एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की,जिस वजह से पीडित परिवार को ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवानी पड़ी। मंच ने कहा कि ढली थाना ने 18 घंटे तक एफआईआर तक दर्ज नहीं की गयी और पुलिस आरोपियों को पुलिस वैन में घुमाती रही।

उसके बाद पीडित परिवार जब उपचार के लिए आई.जी.एम.सी. पहुंचा तो उन्हें उचित उपचार नहीं मिला, पीडित लड़की कई घंटों तक स्ट्रेचर पर पड़ी खून से लतपथ दर्द से कहलाती रही। दलित शोषण मुक्ति मंच पुलिस और डॉक्टर के इस तरह की गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए कडी आलोचना की है और सरकार से मांग की है कि दोषी पुलिस कर्मियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐ।



दलित शोषण मुक्ति मंच के शहरी संयोजक विवेक कश्यप व सह संयोजक राकेश कुमार ने कहा कि जब से प्रदेश में बीजेपी की सरकार सत्ता में आई है तब से दलितों पर अत्याचार बड़े है वो चाहे सिरमौर में केदार सिंह जिदान की हत्या हो,नेरवा में रजत की हत्या हो,कुल्लू घाटी के थाटीबीड़ की घटना हो या सोलन के लुहारघाट में एक दलित शिक्षक के साथ मारपीट का मामला हो,सरकार इन सब मामलों में न्याय दिलाने में विफल रही।

उन्होंने कहा कि इससे सरकार का दलित विरोधी रवैया सामने आया है। ढली मारपीट व छेडछाड मामले में ऐट्रोसिटी एक्ट लगने के बाद भी पुलिस अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं कर पाई है।

‌दलित शोषण मुक्ति मंच ( हि।प्र) सरकार से मांंग की है कि अपने काम में कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐऔर मारपीट और छेड़छाड़ के आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार किया जाऐ। मंच ने चेतवानी दी है कि अगर सरकार दोषियों को तुरंत गिरफ्तार नहीं करती है तो दलित शोषण मुक्ति मंच शहर की जनता को लामबंद कर के एक उग्र आंदोलन करेगी।

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समय रहते पुलिस ने की होती मदद तो नहीं होता दुराचार, दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर भी दर्ज़ हो एफआईआर: गुड़िया न्याय मंच

शिमला-गुड़िया न्याय मंच ने शिमला शहर के बीचोंबीच बलात्कार के मामले में पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की है व दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। मंच ने चेताया है कि अगर बलात्कार के दोषियों व जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई तो मंच जनता को लामबंद करके आंदोलन करेगा।

मंच के सह संयोजक विजेंद्र मेहरा ने पुलिस की नाक के नीचे एक और लड़की के बलात्कार पर कड़ा रोष ज़ाहिर किया है। उन्होंने कहा है कि इस बेहद संवेदनशील मामले में बलात्कार के दोषियों के साथ ही जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर तुरन्त एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। अगर पुलिस प्रशासन ने थोड़ी भी संवेदनशीलता दिखाई होती तो मानवता को शर्मशार करने वाला यह घिनौना कार्य नहीं होता।

मंच ने यह सवाल उठाया है कि जब यह लड़की पुलिस के पास मदद मांगने गई तो फिर उसे मदद क्यों नहीं मिली। मंच के सह संयोजक ने कहा कि अगर पुलिस ने इस लड़की की समय रहते मदद की होती तो इस लड़की से दुराचार नहीं होता और न ही दरिंदे अपने मंसूबों में कामयाब हो पाते। उन्होंने इस बलात्कार के लिए पूरी तरह पुलिस जिम्मेवार ठहराया है।

उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम से गुड़िया प्रकरण की तरह एक बार फिर से स्पष्ट हो गया है कि हिमाचल प्रदेश के थाने किसी भी तरह से आम जनता के लिए सुरक्षित नहीं हैं और न ही इन थानों में जाने पर जनता को सुरक्षा,न्याय व मदद मिलती है। यह घटनाक्रम एक बार पुनः गुड़िया प्रकरण की तरह पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की पोल खोलता है व उस पर काला धब्बा है।

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देवभूमि हिमाचल व शिमला जैसे शांत व सुरक्षित शहर में ऐसी दुष्कर्म की घटना होना कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह: चौहान

शिमला– शिमला शहर मैं रविवार को एक 19 वर्षीया युवती के अपहरण व् चलती कर में दुष्कर्म की घटना को लेकर माहौल गरमा गया है।

जनता का गुस्सा भांप मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंगलवार को एडीएम शिमला प्रभा राजीव को मजिस्ट्रियल जांच सौंप दी है और 24 घंटे में रिपोर्ट तलब की है। साथ ही दुष्कर्म की छानबीन के लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शिमला प्रवीर ठाकुर के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया गया है। एसआईटी में सात सदस्य भी होंगे। ये एएसपी शिमला अभिषेक यादव, डीएसपी योगेश जोशी, इंस्पेक्टर राजकुमार, सब इंस्पेक्टर डिंपल, एसएचओ महिला थाना न्यू शिमला दयावती, एएसआई पुलिस चौकी संजौली रंजना और एएसआई राजीव कुमार होंगे।

विपक्षी पार्टी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए शहर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी ने शिमला में युवती से हुए दुष्कर्म की शर्मसार करने वाली घटना को लेकर गम्भीर चिंता व्यक्त करती है। पार्टी ने कहा कि देवभूमि हिमाचल व शिमला जैसे शांत व सुरक्षित शहर में इस प्रकार की घटना का घटित होना कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है।

राज्य सचिवमण्डल के सदस्य संजय चौहान ने कहा कि पिछले कुछ समय से प्रदेश में इस प्रकार के अपराधियों घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। हत्या व महिलाओं के प्रति अपराध जिसमें विशेष रूप से बलात्कार के मामलों में बहुत वृद्धि दर्ज की गई हैं। प्रदेश सरकार इस प्रकार के संगीन अपराधों को रोकने में पूरी तरह से विफल रही है।

चौहान ने ये भी कहा कि वर्ष 2017 में ‘गुडिया’ की निर्मम हत्या की घटना ने प्रदेश में कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्तिथि को स्पष्ट रूप से दर्शाया था और तत्कालीन सरकार को इसका परिणाम भी भुगतना पड़ा था। परन्तु ये अत्यंत खेदजनक है कि अन्वेषण एजेंसियां आजतक इसका संतोषजनक परिणाम नहीं निकाल पाई है। जिससे आज प्रदेश में कानून व्यवस्था पर आम जनता असमंजस की स्थिति में है। जिस प्रकार से इस अत्यंत संवेदनशील घटना की पुलिस या सीबीआई ने जांच की और लगभग तीन वर्ष बीतने के बावजूद कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाने से प्रदेश में कानून व्यवस्था पर बड़ा प्रशन चिन्ह खड़ा होता है।

चौहान ने आरोप लगाया कि इसी लचर कानून व्यवस्था के कारण आये दिन अपराधी महिलाओं की हत्या, बलात्कार व मारपीट कर खुले घूमते हैं परंतु न जाने किन कारणों से पुलिस इन गंभीर मामलों में भी कार्यवाही नहीं करती है। कई मामलों में तो FIR दर्ज भी नहीं की जाती हैं जिससे अपराधियों के हौंसले बुलंद होते है और आम जनता को डर के साए में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के गठन के समय भी कानून व्यवस्था एक बड़ी समस्या थी और इसी मुद्दे को लेकर जनता ने सरकार को प्रदेश में सत्तासीन किया था और सरकार ने कानून व्यवस्था दरुस्त करने का वायदा किया था। परन्तु एक वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद कानून व्यवस्था दरुस्त करना तो दूर की बात बन गई है बल्कि यह बद से बदतर होती जा रही है और सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही हैं। जिससे कानून व्यवस्था पर सरकार की विफलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

सी.पी.एम. ने मांग की है कि मांग करती हैं कि दुष्कर्म के लिए दोषियों को तुरंत पकड़ कर कड़ी कानूनी प्रक्रिया अमल में लाई जाए तथा लापरवाही करने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध भी तुरन्त कार्यवाही की जाए। पार्टी ने यह भी मांग कि है कि पीड़ित छात्रा को कम से कम सरकार 10 लाख की राशी दे। कानून व्यवस्था को दरुस्त करने के लिए मुख्यमंत्री तुरंत ठोस कदम उठाये। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार तुरन्त दोषियों को पकड़ कर कानूनी कार्यवाही नहीं करती व कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त नहीं करती तो सी।पी।एम। जनता को लामबन्द कर आंदोलन करेगी।

वंही दूसरी और कांग्रेस ने प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर चिंता ब्यक्त करते हुए कहा है कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा की पूरी पोल खुल गई हैं।पुलिस प्रशासन गहरी नींद में है।दिन दहाड़े चोरियां ओर डकैती तो आम बात हो गई है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने कहा है कि इस से बड़ी पुलिस की लाचारी ओर क्या हो सकती है कि पीड़ित महिला ने पुलिस से सुरक्षा मांगी जो उसे नही दी गई।

राठौर ने इसे सरकार की कमजोरी बताते हुए कहा की भाजपा सरकार महिलाओं की सुरक्षा की बड़ी बड़ी बातें तो करती है पर सुरक्षा में जुटी पुलिस ने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी है।

राठौर ने दोषी पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की मांग करते हुए आरोपियों को तुरंत सलाखों के पीछे करने को कहा है।

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