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हिमाचल कांग्रेस ने नोटबंदी के खिलाफ आरबीआई की शिमला शाखा का किया घेराव, गवर्नर को सौंपा ज्ञापन

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नोटबंदी का फायदा मात्र भाजपा के चुनिदां लोगों को फयादा पंहुचान तथा अमरिकी मुद्रा डाॅलर की किमत को बढाना था, नोटबंदी से आम लोगो को कोई भी फायदा नही हुआ है।

शिमला- आज हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ठाकुर सुखविन्दर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शिमला (कसुम्पटी) में नोटबंदी के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर भारतीय रिजर्व बैंक की शाखा का घेराव किया।

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धरने-प्रदर्शन में आये कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए अपने सम्बोधन में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ठाकुर सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने कहा कि नोटबंदी का फैसला बिना सोचे समझें, आगे की तैयारी किये बैगर जल्दवाजी में देश की जनता पर थोपा गया है, जिसमे आरबीआई संस्था की स्वायत्ता को भी खत्म किया गया। उन्होंनें कहा कि नोटबंदी के बाद हिमाचल प्रदेश में कई जहग में भाजपा ने पार्टी के नाम पर करोडों रूपये की जमीने खरीदी हैं।

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हरियाण के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुडडा ने अपने सम्बोधन में कहा कि नोटबंदी का फायदा मात्र भाजपा के चुनिदां लोगों को फयादा पंहुचान तथा अमरिकी मुद्रा डाॅलर की किमत को बढाना था, नोटबंदी से आम लोगो को कोई भी फायदा नही हुआ है।

विडियो

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पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा

अपने संभोदन के बाद कांग्रेस पार्टी ने नोटबंदी के खिलाफ भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को ज्ञापन सौंपा, जिसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ठाकुर सुखविन्दर सिंह सुक्खू, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुडडा, सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य मंत्री विद्या स्टोक्स, डा0 कर्नल धनी राम शांडिल, सांसद शादी लाल बत्रा, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी समन्यवक निर्मल सिंह, संजय कोचड, प्रदेश कांग्रेस कमेटी महासचिव हरभजन सिंह भज्जी, हर्षवर्धन चैहान, ने आरबीआई के अधिकारी के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को ज्ञापन सौंपा।

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आरबीआई अधिकारी के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को ज्ञापन सौंपते कांग्रेस नेता

इस धरने प्रदर्शन में हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष,विधायक अनिरूध सिंह, प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्षा,सेवा दल प्रमुख सहित इस धरने प्रदर्शन में कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारीयों, कार्यकारिणी के सदस्यों, अंग्रणी संगठनों व विभागों के प्रमुख एवं कार्यकारिणी के सदस्यों, जिला व ब्लाॅक अध्यक्षों एवं कार्यकारिणीयों के सदस्यों सहित पूरे प्रदेश से आये सैंकाड़ों कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।

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सड़क के बीच बैठकर नारे लगाते कांग्रेस कार्यकर्ता

हिमाचल प्रदेश कांग्रेस द्वारा आरबीआई के अधिकारी के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को सौंपें ज्ञापन में दिए गए सुझाव

1: नोटबंदी -बिना सोचे-समझे लिया फैसला, आर्थिक अराजकता तथा मुसीबतों का पहाड़

आम भारतीयों को अपने ही खाते से अपनी गाढ़े पसीने की कमाई क्यों नहीं निकालने दी जा रही है? कांग्रेस उपाध्यक्ष, राहुल गांधी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री, डाॅ. मनमोहन सिंह मोदी सरकार तथा आरबीआई से पूछते हैं कि क्या वो किसी भी एक ऐसे देश का नाम बता सकते हैं जहां लोगों को अपने बैंक खातों में अपना पैसा निकालने पर ही रोक लगा दिया गया हो? आरबीआई हर सप्ताह 24,000 रु. निकालने की सीमा को आखिर क्यों नहीं हटा रहा है?

नोटबंदी के चलते 120 से अधिक निर्दोष नागरिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। उनका क्या कसूर था? नोटबंदी के चलते लोगों पर आई मुसीबतों तथा इन दर्दनाक मौतों का जिम्मेदार कौन है? आरबीआई और मोदी सरकार को इन परिवारों तथा पूरे देश से माॅफी मांगनी चाहिए एवं मृत लोगों के परिवारों को मुआवजा भी देना चाहिए।

आरबीआई, वित्त मंत्रालय तथा सरकार के अन्य विभागों ने 70 दिनों में नोटबंदी के नियमों में 138 बार बदलाव किया। अकेले आरबीआई ने 70 दिनों 78 बार नियम बदले जिसके बाद लोगों ने इसे ‘रिवर्स बैंक आॅफ इंडिया’ कहना शुरु कर दिया। क्या इससे यह प्रदर्शित नहीं होता है कि आरबीआई ने इस फैसले के लिए कोई भी तैयारी नहीं की थी? सच्चाई यह है कि आरबीआई एवं मोदी सरकार ने आनन फानन में नोटबंदी फैसला ले डाला।

8 नवंबर, 2016 के नोटबंदी के फैसले से देश के 86 प्रतिशत नोट चलन से बाहर हो गए। विशेषज्ञों की मानें तो 500 रु. के 1658 करोड़ नोट तथा 1000 रु. के 668 करोड़ नोट, यानि कुल 15 लाख करोड़ रु. के 2327 करोड़ नोट चलन से बाहर कर दिए गए।

1000 रु. के नोट ‘भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राईवेट लिमिटेड’ द्वारा छापे जाते हैं। दो शिफ्ट में काम करने पर इसकी नोट छापने की क्षमता 133 करोड़ नोट प्रतिमाह है। अगर तीन शिफ्ट में भी काम करें, तो यह कंपनी हर महीने 200 करोड़ नोट छाप सकती है। 500 रु. के नोट सरकारी कंपनी ‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड’ द्वारा छापे जाते हैं, जिसकी क्षमता 100 करोड़ नोट प्रतिमाह की है। दोनों कंपनियों की क्षमता को देखते हुए चलन से बाहर हुए 86 प्रतिशत नोटों को छापने में 6 से 8 माह लगेंगे।

आरबीआई देश के लोगों को ईमानदारी से यह क्यों नहीं बता रही है कि ‘पुराने नोटों’ की जगह ‘नए नोटों’ को छापने में आखिर कितना समय लगेगा?

500 रु. और 2000 रु. के नए नोटों में कोई नया मबनतपजल थ्मंजनतम नहीं है। न कोई नया वाॅटरमार्क है, न ैमबनतपजल जीतमंक न थ्पइमत और न ही स्ंजमदज प्उंहम । ऐसे में ये नोट पुराने बंद किए गए नोटों से ज्यादा सुरक्षित कैसे होंगे? क्या मात्र रंग व साईज़ बदलने से क्या नए नोटों की पर्याप्त सुरक्षा रह पाएगी? क्या आरबीआई और मोदी जी इसकी जिम्मेदारी लेते हैं?

चैंकाने वाली बात यह है कि मोदी सरकार ने तीन अलग-अलग तरह के 500 रु. के नोट छाप दिए, जो आरबीआई ने स्वयं माना है। जब सरकार खुद कह रही है कि 500 रु. के तीनों तरह के नोट कानूनी मुद्रा हैं, तो फिर क्या ऐसे में नकली नोटों के कारोबारियों द्वारा स्थिति का फायदा उठाकर लोगों को ठगे जाने की संभावना नहीं बढ़ जाएगी?

चैंकाने वाली दूसरी बात यह है कि 500 रु. और 2000 रु. के नए नोटों में बहुत ही खराब क्वालिटी की स्याही का प्रयोग किया गया है, जिससे इन नोटों का रंग कुछ समय में ही उतरने लगता है। क्या इससे भारत के नोटों की विश्वसनीयता को दांव पर नहीं लगा दिया गया है, जिनकी क्वालिटी इतनी घटिया है कि इनकी प्रिंटिंग की स्याही तक उतर रही है?

क्या आरबीआई तथा मोदी सरकार ने पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने की कुल लागत आंकी है? क्या यह लागत 25,000-30,000 करोड़ रुपया है, जैसा कई अर्थशास्त्रियों का मानना है? यह खर्च कौन उठाएगा?

प्रधानमंत्री,नरेंद्र मोदी का यह दावा था कि नोटबंदी के इस फैसले से ‘कालाधन’ रोकने में मदद मिलेगी। क्या आरबीआई यह बताएगा कि 1000 रु. के नोटों को 2000 रु. के नोटों से बदलने पर कालाधन रोकने में मदद कैसे मिलेगी? क्या इससे कालाधन इकट्ठा करने वालों को पैसा रखना आसान नहीं हो जाएगा। यदि नोटबंदी का परिणाम यह हुआ कि लोग ज्यादा आसानी से नकद पैसा अपने पास रखने लगे, तो सरकार के लिए कालाधन रोकने में इससे बड़ी असफलता और क्या होगी?

‘ब्लैक मनी एमनेस्टी स्कीम 2016’ के तहत कालाधन घोषित करने वालों को पुराने नोटों में टैक्स देने की छूट दे दी गई। जब ईमानदार और मेहनतकश भारतीय बैंकों की लाईनों में धक्के खा रहे थे, उसी समय टैक्स चोरी करने वालों तथा कालाधन इकट्ठा करके रखने वालों को आरबीआई एवं मोदी सरकार ने अपना पैसा सफेद बनाने का यह सुनहरा मौका क्यों दे डाला? क्या इससे सरकार द्वारा कालाधनधारकों को संरक्षण देना साफ नहीं होता?

नोटबंदी ने ‘राष्ट्रीय आय’ तथा ‘जीडीपी’ पर बहुत बुरा असर डाला है। सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग आॅन इंडियन इकाॅनाॅमी (सीएमआईई) ने नोटबंदी के पहले 50 दिनों में हुआ नुकसान 1,28,000 करोड़ रु. आंका है। 16 जनवरी, 2017 की एक रिपोर्ट में इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) ने वित्तवर्ष 2016-17 में भारत की जीडीपी को 1 प्रतिशत के नुकसान का अनुमान लगाया है। इसका मतलब है कि देश की जीडीपी को 1,50,000 करोड़ रु. का नुकसान होगा। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री एवं भूतपूर्व प्रधानमंत्री, डाॅ. मनमोहन सिंह ने जीडीपी को लगभग 2 प्रतिशत या 3,00,000 करोड़ रु. के नुकसान का अनुमान लगाया है। आईएमएफ रिपोर्ट की मानें तो भारत अब ‘सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था’ वाले देशों की फेहरिस्त में चीन से पिछड़ गया है। 17 जनवरी, 2017 की ‘वल्र्ड इकाॅनाॅमिक फोरम’ की रिपोर्ट में ‘इंक्लुसिव ग्रोथ एण्ड डेवलपमेंट इंडेक्स’ में 79 देशों में भारत की स्थिति को घटाकर 60 पर कर दिया गया है।

क्या आरबीआई और मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था तथा जीडीपी को हुए नुकसान के बारे में बताएंगे?

नोटबंदी ने कृषि अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। फार्म एवं को-आॅपरेटिव सेक्टर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। 370 जिला को-आॅपरेटिव बैंकों एवं 93,000 से अधिक कृषि को-आॅपरेटिव सोसायटीज़ पर सीधी गाज़ गिरी है।

छोटे और मध्यम उद्योग बंद हो गए हैं और नौकरियां खत्म हो रही हैं। रेहड़ी पटरी वालों, हाॅकर्स, बढ़ई, प्लंबर, राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, लोहार, कपड़ा व्यापारियों, किराना दुकानदारों, सब्जीवालों, छोटे कारोबारियों और दुकानदारों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया है। भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाली नकद लेन-देन पर आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह से टूट गई है। क्या आरबीआई या मोदी सरकार को इन परिणामों का अनुमान है?

2: विश्वसनीयता खोने और आरबीआई की स्वायत्ता खत्म करने के लिए आरबीआई गवर्नर पर जिम्मेदारी का निर्धारण

मोदी सरकार ने 7 नवंबर, 2016 को आरबीआई को एक एडवाईज़री भेजा, जिसमें 1000/500 रु. के नोट बंद करने को कहा गया। 8 नवंबर, 2016 को आरबीआई बोर्ड ने बैठक कर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे यह साबित होता है कि आरबीआई ने बिना सोचे समझे अपनी स्वायत्ता मोदी सरकार को सौंपने का निर्णय कर लिया।

आरबीआई ने मोदी सरकार से एक ही झटके में 86 प्रतिशत नोटों को बंद करने से काॅस्ट-बेनेफिट एनालिसिस के लिए क्यों नहीं कहा? आरबीआई 8 नवंबर, 2016 को हुई आरबीआई की मीटिंग का विवरण जनता के सामने क्यों नहीं रख रही है? क्या यह प्रधानमंत्री के फरमानों की वजह से आरबीआई की अपनी स्वायत्ता को सरकार के समक्ष सौंपने के खुलासे के डर से तो नहीं है?

रिज़र्व बैंक के अधिकारियों तथा कर्मचारियों के यूनाईटेड फोरम ने 13 जनवरी, 2017 को आरबीआई गर्वनर को पत्र लिखकर ‘कार्यसंबंधी कुप्रबंधन’ के बारे में बताया, जिससे आरबीआई की स्वायत्ता तथा प्रतिष्ठा पर गंभीर सवाल उठे हैं। यह आरबीआई के अधिकारियों तथा कर्मचारियों द्वारा आरबीआई गवर्नर के प्रति खोए हुए विश्वास का स्पष्ट प्रमाण है।
आरबीआई अधिकारियों तथा कर्मचारियों ने वित्त मंत्रालय के हस्तक्षेप पर भी आपत्ति की। लेकिन आरबीआई गवर्नर ने इस पूरे मामले में चुप्पी साधे रखी।

आरबीआई के बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स में कुल 21 सदस्य हैं। इनमें से 8 सदस्य 8 नवंबर, 2016 की मीटिंग में शामिल हुए, जिसमें नोटबंदी का फैसला लिया गया। इन 8 सदस्यों में से 4 स्वतंत्र सदस्य थे। तो यह कैसे माना लिया जाए कि नोटबंदी जैसे बड़े फैसले को लेने से पहले पूरी गंभीरता से विचार किया गया होगा?

8 नवंबर, 2016 को कुल 15.44 लाख करोड़ नोट बंद कर दिए गए। आरबीआई के आंकड़े प्रदर्शित करते हैं कि 30 नवंबर, 2016 तक 15 लाख करोड़ फिर से जमा कर दिए गए। एनआरआई को 31 मार्च, 2017 तक अपने पुराने नोट जमा करने की छूट है। इसके अलावा भारत सरकार को पड़ोसी नेपाल से पुराने नोट बदलने के लिए भी एक समाधान निर्मित करना होगा।

97 प्रतिशत पुराने नोट फिर से आरबीआई के खजाने में वापस आ जाने के बाद क्या आरबीआई और मोदी सरकार अब देश को बताएंगे कि काला धन कहां गया? क्या यह नए नोटों में बदल दिया गया? यदि हां, तो आरबीआई तथा सरकार ऐसा करने वालों के खिलाफ क्या कार्यवाही कर रही है?

कैशलेस के नाम पर प्राईवेट कंपनियां भारत के नागरिकों से 2.5 प्रतिशत से 5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क ले रही हैं। रेगुलेटर के रूप में आरबीआई को कैशलेस के नाम पर लिए जाने वाले कमीशन/सेवा शुल्क को बंद करने के अविलंब निर्देश जारी करने चाहिए।

बैंकों के अलावा कई प्राईवेट कंपनियों को आरबीआई से नोट बदलने की अनुमति दी गई। इनमें से कई का भाजपा सरकार से संबंध है। क्या आरबीआई इन कंपनियों को चुनने के मापदंडों का खुलासा करेगी, जिन्हें पुराने करेंसी नोटों को नए से बदलने की अनुमति दी गई है? क्या इन कंपनियों को चुनने में पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किया गया? इन कंपनियों द्वारा कितने पुराने नोट नए नोटों से बदले गए?

आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि अकेले सितंबर, 2016 में शेड्यूल्ड बैंकों में 5,86,000 करोड़ रु. जमा किए गए, जिनमें से 1 से 15 सितंबर, 2016 के बीच की गई फिक्स्ड डिपाॅज़िट लगभग 3,20,000 करोड़ रु. की है। आरबीआई ने इस मामले की जांच करके नोटबंदी से ठीक पहले 5,86,000 करोड़ रु. बैंकों में जमा होने के कारण का पता लगाने की कोशिश क्यों नहीं की?

भारत के वित्तीय रेगुलेटर, भारत की प्रमुख मोनेटरी अथाॅरिटी, भारत के नोटों के संरक्षक एवं जारीकर्ता तथा भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों के प्रमोटर के रूप में आरबीआई की छवि पूरी तरह से क्षत-विक्षत हो गई है। आरबीआई मोदी सरकार की प्रवक्ता बन गई है और केंद्र सरकार की कठपुुतली बनकर काम कर रही है। इससे न केवल भारत के सर्वोच्च वित्तीय रेगुलेटर की निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता नष्ट हुई है, बल्कि यह भारत के विकास के लिए स्थिर वित्तीय स्थिति बनाने के लिए भी काफी नुकसानदायक है। आज आरबीआई की विश्वसनीयता, स्वायत्ता तथा अखंडता को दोबारा स्थापित करने तथा आरबीआई के कामकाज पर मोदी सरकार के नाजायज नियंत्रण को समाप्त करने की आवश्यकता है।

2: विश्वसनीयता खोने और आरबीआई की स्वायत्ता खत्म करने के लिए आरबीआई गवर्नर पर जिम्मेदारी का निर्धारण

3: आईएनसी की मांग

हम सरकार से भारत के लोगों पर लगे सारे प्रतिबंध हटाकर ‘अपना पैसा निकालने की स्वतंत्रता’ देने की मांग करते हैं। आरबीआई तथा मोदी सरकार को, भारत के 125 करोड़ लोगों की ओर से कांग्रेस पार्टी द्वारा इस मेमोरेंडम के माध्यम से उठाए गए प्रश्नों के जवाब एक ‘व्हाईट पेपर’ जारी करके देने चाहिए।

आरबीआई की स्वायत्ता तथा वैधानिक शक्तियों के साथ निस्संदेह समझौता किया गया है। आरबीआई की विश्वसनीयता खोने की जिम्मेदारी आज सिर्फ आरबीआई गवर्नर पर है।

आरबीआई गवर्नर को ‘नोटबंदी के कारण हुई अव्यवस्था’ तथा मोदी सरकार द्वारा आरबीआई के कार्यक्षेत्र में दखलंदाजी करने देने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से तत्काल इस्तीफा देना चाहिए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दशकों तक आरबीआई को एक संस्थान के रूप में विकसित किया है। आज आरबीआई की स्वायत्ता को एक बार फिर से भारत के वित्तीय रेगुलेटर के रूप में पुनः स्थापित किए जाने की तत्काल आवश्यकता है।

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होटल ईस्टबोर्न के 120 मजदूरों का इपीएफ 2016 के बाद नहीं हुआ जमा, ब्रिज व्यू रीजेंसी, ली रॉयल, तोशाली रॉयल व्यू रिजॉर्ट, वुडविले पैलेस में भी इपीएफ में गड़बड़

Himachal Hotel Workers EFP Scam

शिमला-आज दिनांक 22 अगस्त को हिमाचल के अलग-अलग होटलों से 200 कर्मचारियों ने ईपीएफओ विभाग के बाहर धरना प्रदर्शन कियाI

कर्मचारियों का कहना है कि यह धरना प्रदर्शन शिमला शहर के विभिन्न होटलों में इपीएफ की समस्याओं को लेकर किया गया जिसमें मुख्य समस्या होटल ईस्ट बोर्न, होटल ब्रिज व्यू रीजेंसी, होटल ली रॉयल, होटल तोशाली रॉयल व्यू रिजॉर्ट, होटल वुडविले पैलेस की हैI

हिमाचल होटल मजदूर लाल झंडा महासचिव विनोद ने कहा कि ईस्टबोर्न में लगभग 120 मजदूर कार्यरत है जिसका इपीएफ 2016 से प्रबंधन द्वारा अभी तक जमा नहीं किया गया है और वैसा ही हाल ब्रिज व्यू में भी हैI

वहां पर भी एक साल से प्रबंधक द्वारा पीएफ का पैसा जमा नहीं किया गया हैI विनोद ने कहा कि वही होटल ले रॉयल में मजदूरों का पीएफ का पैसा जिस एक्ट के तहत कटना चाहिए था वह मालिक नहीं काट रहा है और होटल ली रॉयल का इपीएफ वेस्ट बंगाल में जमा किया जाता है जिससे मजदूरों को समस्या का हो रही हैI विनोद ने कहा कि तोशाली में भी मजदूरों का पीएफ के पैसे में कटौती की जा रही है जोकि यूनियन को बिल्कुल मंजूर नहीं होगाी

विनोद ने कहा कि यूनियन ने पीएफ कमिश्नर को इन समस्याओं से अवगत करवाया और पीएफ कमिश्नर ने वादा किया कि 31 अगस्त तक सभी होटलों में प्रबंधन द्वारा की जा रही गड़बड़ियों की पूरी जांच की जाएगी और जहां भी मालिक को द्वारा मजदूरों का पैसा जमा नहीं किया जा रहा है उन मालिकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगीI

इस प्रदर्शन में सीटू राज्य सचिव विजेंद्र मेहरा, सीटू जिला सचिव अजय दुलटा, सीटू जिला प्रधान कुलदीप डोगरा, सीटू जिला उपाध्यक्ष किशोरी डलवालिया,अध्यक्ष बालकराम, कोषाध्यक्ष पवन शर्मा व अन्य साथी कपिल नेगी विक्रम शर्मा सतपाल राकेश चमन मौजूद थे

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शिमला जिला में सड़क मार्ग सुचारू न होने से सेब सड़ने की कगार पर, बागवानों को सेब मंडियों तक पहुंचाने में में आ रही परेशानी

Shimla roads closed due to rain

शिमला-हिमाचल प्रदेश में पिछले दिनों हुई भारी वर्षा से बहुत क्षति हुई हैी इस दौरान 63 जाने गई हैI प्रदेश में आज सैंकड़ो सड़के बन्द पड़ी है राष्ट्रीय उच्चमार्ग व अन्य मुख्य मार्गो पर भी सफर अभी तक जोखिम भरा है। इस आपदा से प्रदेश के लगभग सभी जिले प्रभावित हुए हैं परन्तु शिमला,कुल्लू, सिरमौर, किन्नौर,हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन आदि जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। अधिकांश क्षेत्रों में बिजली, पानी व सड़के सुचारू नही है। जिससे क्षेत्र के बागवानों को सेब मण्डिया तक पहुंचाने में बेहद परेशानी हो रही हैी

यह कहना है भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) की ज़िला कमेटी शिमला के सचिव व पूर्व मेयर संजय चौहान का। उन्होंने प्रदेश सर्कार से इस क्षति का तुरंत आंकलन करवा कर इसकी क्षतिपूर्ति की मांग की है।

उन्होंने कहा कि शिमला जिला के चौपाल, रोहड़ू, रामपुर व ठियोग तहसीलों में अधिक जान व माल की क्षति हुई है। आज भी चौपाल, चिढ़गांव रामपुर तहसील के अधिकांश क्षेत्र अन्य हिस्सों से कटे हुए हैं। शिमला जिला में अधिकांश सम्पर्क मार्ग या तो बन्द है या सुचारू रूप से कार्य नहीं कर रहे हैं। जिला में सेब का सीजन पूरे यौवन पर है तथा सड़को का सुचारू रूप से कार्य न करना बागवानों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बना हुआ है। सड़क मार्ग सुचारू न होने से सेब सड़ने की कगार पर आ गया है।

चौहान ने कहा कि रोहड़ू – देहरादून वाया हाटकोटी मार्ग बंद होने से बागवानों को बेहद परेशानी उठानी पड़ रही है क्योंकि जुब्बल,रोहड़ू,चिढ़गांव आदि क्षेत्रों से अधिकांश सेब इसी मार्ग से मण्डिया में भेजा जाता है।

पार्टी ने मांग की है कि आपदा से हुई इस क्षति का आंकलन तुरंत करवाया जाए तथा प्रभावितों को इसका उचित मुआवजा तुरंत दिया जाए। इसके अतिरिक्त बन्द पड़े सभी मुख्य व लिंक मार्गो को तुरंत खोला जाए ताकि बागवानों को उनका सेब मण्डिया तक पहुचाने में आ रही परेशानी को समाप्त किया जाए। चौहान ने कहा कि यदि सरकार समय रहते कदम नहीं उठती तो पार्टी आंदोलन के लिए मजबूर होगी।

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वी वी की कक्षाओं में छत से टपक रहा पानी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए, पीने के पानी की भी नहीं है कोई सुविधा

HPU Law Department Roof Leaking

शिमला-आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय एसएफआई की लॉ फैकल्टी कमेटी ने विभाग की समस्याओं के मद्देनजर विभाग के अध्यक्ष सुनील देष्ट्टा को मांग पत्र सौंपा।

लॉ विभाग एसएफआई सचिव अमरीश का कहना है कि विभाग में टॉप फ्लोर में पानी का रिसाव हो रहा है लेकिन प्रशासन इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।छात्रों को टपकती छतो तथा पानी से तर कमरों में अपनी शिक्षा ग्रहण करनी पड़ रही है। छात्रों ने कहा कि सोशियोलॉजी विभाग की कक्षाओं की भी यही स्थिति है।

विभाग में छात्रों को कंप्यूटर लैब की सुविधा भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। क्लास रूम की खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं।विभाग में एक्वागार्ड की उचित सुविधा नहीं है। छात्रों ने मांग कि है कि लॉ विभाग के हर फ्लोर पर एक एक्वागार्ड लगाया जाए।

फैकल्टी अध्यक्ष करण ने कहा कि विभाग में बिना एंट्रेंस एग्जाम दिए एडमिशन देने की कवायद हो रही है जिसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभाग ने पहले ही बहुत कम अंक लिए हुए छात्रों को एडमिशन दे दी है।अब बिना एंट्रेस एग्जाम एडमिशन देना तर्कसंगत नहीं है।

एस एफ आई ने कहा कि यदि इन मांगों पर जल्द कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई तो विभाग के छात्रों को लामबंद कर आंदोलन का रास्ता इख्तियार किया जायेगा।

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शिमला-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने भारतीय संविधान के अनुछेद 370 को हटाने के कदम को जम्मू कश्मीर की जनता के...

CM Jairam Thakur and BJP Welcomes Move to Scrap Article 370 CM Jairam Thakur and BJP Welcomes Move to Scrap Article 370
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अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के निर्णय से जम्मू और कश्मीर के सामाजिक एवं आर्थिक जन-जीवन तथा विकास पर पड़ेगा सकारात्मक प्रभाव: मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर व हिमाचल बीजेपी

शिमला-मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के निर्णय को ऐतिहासिक बताया है जिससे...

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