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चित्र : Gaertner-Center/सांकेतिक

शिमला- कथित कैंची खरीद घोटाले में फंसते नजर आ रहे सूबे के एक पूर्व मंत्री को बचाने के लिए इसकी जांच बंद की जा रही है। स्टेट विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो के जांच अधिकारी ने फाइल बंद करने की सिफारिश कर दी है। विजिलेंस की नई तफ्तीश में ठोस सबूत नहीं मिलने का दावा किया गया है। उच्चाधिकारियों को भेजी रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें केस ही नहीं बनता। विजिलेंस सूत्रों ने बताया कि इस जांच को बंद करने की सिफारिश पर बडे़ अफसर मंत्रणा कर रहे हैं।

विजिलेंस ब्यूरो के मुताबिक ये कथित घोटाला साल 2005 में सेब के पेड़ों की प्रूनिंग करने वाली कैंचियों की खरीद पर हुआ। विपक्षी भाजपा ने इस खरीद में गड़बड़ी होने का मामला अपनी चार्जशीट में उजागर किया। वर्ष 2008 में विजिलेंस ने इस शिकायत पर जांच शुरू की कि केंद्र से आए बागवानों के पैसों से कैंचियों की खरीद मार्केट रेट से अधिक कीमत पर की गई। बागवानों को दी जाने वाली सब्सिडी का पैसा बिचौलियों की जेब में गया।

भाजपा के शासनकाल में खोली गई थी कैंची की खरीद पर गड़बड़ी की जांच

सरकार को लाखों का चूना लगा। विजिलेंस ब्यूरो ने कांग्रेस सरकार के एक पूर्व मंत्री को भी इस जांच में लपेटा। पूर्व मंत्री से पूछताछ भी की गई, मगर बाद में विजिलेंस ब्यूरो ढीला पड़ता गया। भाजपा कार्यकाल में न तो इस पर भ्रष्टाचार का मामला बनाया गया और न ही यह इन्कवायरी बंद की गई।

इस साल के शुरू में कांग्रेस सरकार ने ये फाइल फिर खोली। हाल में विजिलेंस ब्यूरो ने एक प्रश्नावली बनाकर हिमाचल प्रदेश एग्रो इंडस्ट्रीज कारपोरेशन को भेजी। इसी बीच कारपोरेशन में इस कथित घोटाले से संबंधित फाइल को बुरी तरह से फाड़ने की बात भी सामने आई है।

विजिलेंस ब्यूरो को कारपोरेशन के अधिकारियों के जवाब के बाद अब जांच बंद करने की तैयारी है। वहीं, विजिलेंस ब्यूरो के डीआईजी अरविंद कुमार शारदा का कहना है कि मामला अभी निचले स्तर पर ही है। मुख्यालय स्तर पर आने के बाद ही टिप्पणी की जा सकती है।

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