सूखे की चपेट में हिमाचल, प्रदेश के सीमांत इलाकों में भू-जलस्तर में आधा फुट तक की गिरावट दर्ज

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चित्र:Clean Water Store/सांकेतिक

सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शिमला, कुल्लू, लाहुल-स्पीति व कांगड़ा बताए गए हैं, जहां सूखे की दर 85 से 95 फीसदी रही है।

शिमला- मैदानी इलाकों की ही तर्ज पर हिमाचल में भी सूखे ने कोहराम मचा दिया है। प्रदेश के सीमांत इलाकों में भू-जलस्तर में आधा फुट तक की गिरावट दर्ज की गई है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शिमला, कुल्लू, लाहुल-स्पीति व कांगड़ा बताए गए हैं, जहां सूखे की दर 85 से 95 फीसदी रही है।

अधिकांश जिलों में रबी की फसल की बुआई पर बुरा असर पड़ा है। नमी न मिलने के कारण किसान बारिश के इंतजार में हैं। शिमला व कुल्लू की सेब बैल्ट को सूखे से ज्यादा नुकसान हुआ है। बागीचों में इन दिनों नमी के साथ-साथ चिलिंग आवर्ज की जरूरत रहती है। बागबान इसी के अनुरूप तैयारियों को परवान चढ़ाते हैं, मगर मौसम की बेरुखी से पूरे इलाके में बीमारियों का भी खतरा पैदा हो गया है। प्रदेश के कई हिस्सों से पेयजल व सिंचाई योजनाओं में भी गिरावट की सूचनाएं हैं।

मौसम विभाग हालांकि संभावनाएं तो व्यक्त कर रहा है, मगर किसी भी क्षेत्र में छुटपुट बारिश भी नहीं हुई है। दिसंबर के पहले हफ्ते तक मौसम का यही आलम बरकरार रहने की खबर है। बहरहाल, प्रदेश के सीमांत इलाकों ऊना, सिरमौर, नालागढ़, मंडी के बल्ह व कांगड़ा घाटी में भूमिगत जल का सर्वाधिक प्रयोग सिंचाई व पेयजल के तौर पर किया जाता है। अन्य जिले भी अब इसी ओर आगे बढ़ रहे हैं।

हालांकि प्रदेश अब भी कुल भंडारण क्षमता का 25 फीसदी ही प्रयोग में ला पा रहा है। बावजूद इसके इन इलाकों में भू-जल का प्रयोग 75 से 80 फीसदी की दर से होता है। ट्यूबवेल, नहरें व हैंडपंप सबसे ज्यादा इन्हीं क्षेत्रों में हैं। जानकारों के मुताबिक प्रदेश के ऐसे ही इलाकों में भूमिगत जल की व्यापक स्तर पर रिचार्ज व्यवस्था न हो पाने के कारण हर वर्ष गर्मियों व सूखे की स्थिति में यही दिक्कतें आती हैं। केंद्रीय भू-जल बोर्ड ने फिर से ऐसे क्षेत्रों को ग्रे एरिया में चिन्हित किया है। बहरहाल, यदि दिसंबर के पहले पखवाड़े तक प्रदेश में बारिश नहीं होती है और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी देखने को नहीं मिलती है तो फसलों के साथ-साथ बागबानी का कारोबार भी चौपट हो सकता है।

यह है मुख्य दिक्कत

हिमाचल में भू-जल को रिचार्ज करने के लिए प्रचलित तकनीक को अभी तक भी नहीं अपनाया जा सका है। हालांकि केंद्रीय भू-जल बोर्ड व अन्य केंद्रीय एजेंसियों ने इस बाबत कारगर कदम समय-समय पर उठाने के लिए मंडी, कांगड़ा व अन्य क्षेत्रों में जागरूकता मुहिम भी शुरू की, मगर इसके कोई सार्थक नतीजे सामने नहीं आ सके हैं।

ये हैं अंडरग्राउंड वाटर के हाल

हिमाचल प्रदेश में 32219 से भी ज्यादा हैंडपंप और 21840 ट्यूबवेल सिंचाई व पेयजल की दिक्कतें सुलझा रहे हैं, जबकि 33 टैंक और 4213 नहरें भी ऐसे साधन मुहैया करवा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 36615.92 हेक्टेयर मीटर अंडरग्राउंड वाटर उपलब्ध है। इस फेहरिस्त में कांगड़ा के इंदौरा, नुरपूर घाटी में 9214.96 हेक्टेयर मीटर, मंडी की बल्ह वैली में 3483.00 हेक्टेयर मीटर, सिरमौर की पांवटा वैली में 6924.14 हेक्टेयर मीटर, सोलन की नालागढ़ वैली में 6936.12 हेक्टेयर मीटर, ऊना वैली में 10057.77 हेक्टेयर मीटर भू-जल की उपलब्धता है।

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