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शिक्षा मंत्री के कहने पर नियमों को दरकिनार कर भाजपा कार्यकर्ता को दे दिया टेंडर, विरोध दबाने के लिए ली हिंसा की आड़: एस.एफ.आई.

SFI On HPU Campus Violence

शिमला-गौरतलब है कि 24 मार्च से लेकर प्रदेश वि. वि.में जो हिंसा और तनाव का माहौल है जिसके लिए लगातार छात्र राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है परन्तु असल में यदि हम पूरे प्रकरण को ध्यान से समझने का प्रयास करें तो हम पाते है कि इस घटनाक्रम की पूरी पृष्ठभूमि प्रदेश वि. वि. प्रशासन और प्रदेश की सरकार द्वारा पहले से ही सुनियोजित थी। यह कहना है एस.एफ.आई. का।

आज दिनांक 9 अप्रैल, 2019 को एस.एफ.आई. ने एक प्रैस वार्ता के माध्यम से हि. प्र. वि. वि. में 24 मार्च से अभी तक घटित हो रहे घटनाक्रम व उसके बाद पुलिस तथा वि.वि. प्रशासन की एकतरफा कार्यवाही की निन्दा की व मीडिया के माध्यम से कुछ सवाल उठाएं।

इस पत्रकार वार्ता को अखिल भारतीय सह सचिव दिनित दैन्टा, राज्य सचिव अमित ठाकुर, वि.वि. इकाई सचिव जीवन ठाकुर व अखिल भारतीय कमेटी सदस्या रूचिका वजीर ने सम्बोधित किया।

एस.एफ.आई. ने आरोप लगाया है कि यह सुनियोजित हमला इसलिए हुआ क्योंकि गत मार्च महीने की शुरूआत में वि. वि. प्रशासन व प्रदेश की सरकार द्वारा वि. वि. में आऊटसोर्स के तहत कर्मचारियों की गैर कानूनी तरीके से भर्तियां की गई। इस पूरी भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितता बरती गई। जिसमें वि. वि. प्रशासन के साथ शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज की मिलीभगत भी बेनकाब हुई।

एस.एफ.आई. ने आरोप लगाया है कि शुरूआत में जब इस आऊटसोर्स प्रक्रिया के टेंडर मार्च 2018 में आॅपरेटिव केयर कम्पनी को पास हुआ तो शिक्षा मंत्री के कहने पर बड़े सुनियोजित तरीके से नियमों को दरकिनार करते हुए इस टेंडर को उत्तम हिमाचल नाम की कम्पनी को दे दिया गया जिसका मालिक संजीव देष्टा है जो वि. वि. में केन्द्रिय छात्र संघ का पदाधिकारी और ए.बी.वी.पी. का कार्यकर्ता रह चुका है और वर्तमान में भाजपा का कार्यकर्ता है।

एस.एफ.आई. ने कहा कि इस घटनाक्रम के सामने आते ही एस.एफ.आई.ने वि. वि. प्रशासन और शिक्षा मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जिसमें एस।एफ।आई। ने शिक्षा मंत्री के पुतला दहन के साथ-2 रजिस्ट्रार वि. वि. का घेराव कर इस भर्ती प्रक्रिया को निरस्त करने और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाने की मांग उठाई।

एस.एफ.आई. ने कहा कि इस विरोध के चलते वि. वि. प्रशासन और प्रदेश सरकार जनता के सामने बेनकाब हो चुकी थी और किसी भी प्रकार से इस पूरे प्रकरण पर पर्दा डालने की कोशिश में जुटी थी।

एस.एफ.आई. ने आरोप लगाया कि अपनी कोई भी कोशिश कामयाब न होती देख वि. वि. प्रशासन और प्रदेश सरकार ने छात्र आन्दोलन को कुचलने की सुनियोजित कोशिश शुरू कर दी। जिसके तहत 19 मार्च से वि. वि. छात्रावास के नज़दीक पोटर हिल मैदान में आर।एस।एस। की शाखाओं को लगाना शुरू किया गया। इसी दौरान एस।एफ।आई। का मानना है कि वि. वि. परिसर में एक के बाद एक गतिविधियों के आयोजन द्वारा छात्रों का भारी समर्थन व लोकप्रियता जीत रही थी।

एस.एफ.आई. का यह भी आरोप है कि इस बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर 24 मार्च की सुबह पोटरहिल मैदान में क्रिकेट खेल रहे छात्रों पर लगभग चालीस से पच्चास लोगों द्वारा तेज़धार हथियारों व डंडों के साथ सुनियोजित तरीके से हमला किया गया, जिसमें आर।एस।एस। व ए.बी.वी.पी. के कार्यकर्ता शामिल थे।

एस.एफ.आई. ने कहा कि इस हमले में अनेकों छात्रों को गम्भीर चोटें आई और अस्पताल में भर्ती हुए। एस.एफ.आई. ने कहा कि यह हमला छात्रों में भय का माहौल तैयार करने के लिए किया गया था। इस भय और हिंसा के माहौल को बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार व वि. वि. प्रशासन द्वारा पुलिस प्रशासन का प्रयोग करते हुए छात्रों पर एकतरफा कानूनी कार्रवाई की गई। जिसके तहत एस.एफ.आई. कार्यकर्ताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया वहीं दूसरी तरफ इस पूरे उपद्रव के लिए जिम्मेवार आर.एस.एस. व ए.बी.वी.पी. के कार्यकर्ताओं पर कोई भी कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई।

एस.एफ.आई. ने कहा कि अगले दिन 25 मार्च सुबह 4 बजे छात्रों को हाॅस्टल से खदेड़ने के लिए पुलिस प्रशासन का दुरूपयोग करते हुए हाॅस्टलों में रेड़ डलवाई गई और छात्रों को जबरदस्ती बसों में डालकर थाने ले जाया गया। इसके तुरन्त बाद पुलिस का सहारा लेते हुए आर.एस.एस। के कार्यकर्ता जिसमें अनेक वि. वि. के प्राध्यापक व कर्मचारी भी शामिल थे, ने डंडों व पत्थरों द्वारा छात्रों पर हमला किया और वि. वि.के छात्रावासों में तोड़फोड़ भी की गई। एस.एफ.आई. ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में पुलिस वहां मूकदर्शक बनी रही और आर.एस.एस. के कार्यकर्ताओं का साथ देती नज़र आई।

एस.एफ.आई. ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में पुलिस प्रशासन और वि. वि. प्रशासन का रवैया देख कर छात्र समुदाय भड़क उठा और इसके खिलाफ वि. वि. परिसर में विरोध प्रदर्शन कर इसका विरोध किया। उसी दिन जिन छात्रों को पुलिस हाॅस्टल से उठा कर ले गई थी शाम के वक्त जब उन छात्रों को थाने से छोड़ा जाता है तो उन पर थाने से पांच मिनट की दूरी पर बालुगंज चौक पर ही ए.बी.वी.पी. कार्यकर्ताओं द्वारा नुकीले व धारदार हथियारों द्वारा हमला किया जाता है जिसमें अनेकों छात्रों को गम्भीर चोटें आती है। एस.एफ.आई. ने कहा कि इस पूरी घटना में पुलिस छात्रों को हाॅस्टल से तो बसों में भरकर लाती है परन्तु इस हिंसा के माहौल में थाने से बिना किसी सुरक्षा के छोड़ देती है।

एस.एफ.आई. ने कहा कि इस घटना में संलिप्त आर.एस.एस. व ए.बी.वी.पी. के एक भी छात्र को अभी तक हिरासत में नहीं लिया गया है जो पुलिस प्रशासन की एकतरफा कार्यवाही को दर्शाता है।

एस.एफ.आई. ने कहा कि जब पुलिस प्रशासन से ए.बी.वी.पी. के कार्यकर्ताओं पर कार्यवाही की मांग की गयी तो ए.बी.वी.पी. के कुछ छात्रों को मात्र पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया और सुबह होने से पहले ही छोड़ दिया गया।

एस.एफ.आई. ने कहा कि 25 मार्च की शाम समरहिल चौक पर ए.बी.वी.पी.की लड़कियों द्वारा एस.एफ.आई की छात्राओं पर हमला किया गया। साथ ही छात्राओं को हाॅस्टल न आने की धमकी भी दी गई। परन्तु इस सबके बावजूद जब छात्राएं अपने -2 हाॅस्टल में गई तो विद्योत्तमा हाॅस्टल में एक छात्रा को अकेला पा कर ए.बी.वी.पी. की छात्राओं द्वारा हमला किया गया जिसमें हाॅस्टल की बाकी छात्राओं ने वक्त पर आकर बीच बचाव किया। एस.एफ.आई. ने कहा कि इसी रात लगभग आठ बजे के करीब ए.बी.वी.पी. का एक कार्यकर्ता हाथ में दराट लेकर शराब के नशे में कन्या छात्रावासों में घुस आया जहां पर उसे पुलिस और छात्राओं द्वारा धर दबोचा गया। एस.एफ.आई. ने कहा कि इस पूरे
घटनाक्रम के बाद भी पुलिस प्रशासन के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। एस.एफ.आई. ने कहा कि जहां एक तरफ हाॅस्टल में घुसकर हमला करने वाली छात्राओं पर कोई भी कार्रवाई नहीं की गई वहीं दूसरी तरफ हाॅस्टल की आऊटिंग खत्म होने के बाद शराब के नशे में दराट ले कर हाॅस्टल में घुसने वाले छात्र को भी सिर्फ सामान्य धाराओं के तहत गिरफ्तार करके सुबह तक छोड़ दिया गया।

संगठन ने आरोप लगाया कि जहां एक तरफ 24 मार्च और 25 मार्च के घटनाक्रम के बाद पुलिस व वि. वि.प्रशासन द्वारा एस.एफ.आई. कार्यकर्ताओं पर मुकद्दमें बनाकर गिरफ्तार किया गया वहीं दूसरी तरफ छात्रों को जख्मी करने वाले व कन्या छात्रावासों में दराट लेकर घुसने वाले ए.बी.वी.पी. कार्यकर्ता पर कोई भी कार्यवाही नहीं की जाती। एस.एफ.आई. ने कहा कि इस मामले को लेकर छात्रों द्वारा 26 मार्च को चीफ वार्डन का घेराव करने व उन पर दवाब बनाने के बाद वि. वि.प्रशासन द्वारा तोड़फोड़ करने व दराट लेकर गल्र्ज़ हाॅस्टल में जाने वाले गुण्डों के खिलाफ शिकायत दी गई परन्तु पुलिस द्वारा अभी तक इस मामले कोई भी कार्यवाही नहीं की गई।

एस.एफ.आई. ने कहा कि 29 मार्च को गैर लोकतान्त्रिक तरीके से वि. वि. प्रशासन द्वारा न्यायालय का हवाला देकर वि. वि. परिसर में बैज़ पहनने, विरोध प्रदर्शन करने, कक्षाओं को संबोधित करने व प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत करने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। एस.एफ.आई. का आरोप है कि वि. वि.कि परिसर में बैज़ पहनने, विरोध प्रदर्शन करने, कक्षाओं को संबोधित करने व प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत करने पर यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि परिसर के अन्दर जनवादी लोकतान्त्रिक माहौल को खत्म किया जा सके और छात्र वि. वि. प्रशासन के खिलाफ अपनी आवाज़ न उठा सकें व वि. वि. प्रशासन घोटालों व छात्र विरोधी निर्णयों को आसानी से लागू कर सके।

एस.एफ.आई. ने कहा कि बैज़ को बहाना बना कर वि. वि. प्रशासन द्वारा अपने दमन चक्र को तेज करते हुए परिसर में बेज़ पहनने वाले छात्रों को निलंबित किया जाता है। वर्तमान में निलंबित छात्रों की संख्या 35 से ज्यादा हो गई है। निलंबित छात्रों में कुछ छात्र ऐसे भी हैं जिन्होंने बेज़ नहीं पहना था या कुछ छात्र इस दौरान परिसर में थे ही नहीं। एस.एफ.आई. ने कहा कि यह दर्शाता है कि वि. वि. प्रशासन ए.बी.वी.पी. के साथ मिल कर पूरे घटनाक्रम को अन्जाम दे रहा है।

इसी बीच 1 अप्रैल को एस.एफ.आई. द्वारा वि. वि. प्रशासन का एक और गैर कानूनी कारनामा सामने लाया जाता है जिसमें एम।सी।ए। विभाग में पी।एच।डी। में अयोग्य भर्ती की जाती है। एस.एफ.आई. ने कहा कि यह भर्ती सीधे तौर से डी.एस. द्वारा करवाई गई जिसमें सेन्ट बिड्स काॅलेज में काॅन्ट्रेक्ट पर पढ़ाने वाली अध्यापिका को प्राध्यापक कोटे से पी।एच।डी। में प्रवेश दिया जाता है।

एस.एफ.आई. ने कहा कि यह प्रवेश गैर कानूनी इसलिए है क्योंकि इस सीट को विज्ञापित नहीं किया गया था, प्राध्यापक कोटे के तहत सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने वाले को प्राथमिकता दी जाती है व डी.एस. द्वारा मात्र स्टैंडिंग कमेटी के माध्यम से अधिसूचना में रेगुलर के स्थान पर रेगुलर, काॅन्ट्रेक्ट व एडहाॅक शब्द जोड़ दिए गए जो कि वि. वि. आॅर्डिनांस की अवहेलना है। 2 अप्रैल को वि. वि.प्रशासन द्वारा एक और छात्र विरोधी फरमान जारी किया गया जिसके तहत कुलपति द्वारा वि. वि. में 10 प्रतिशत फीस वृद्धि का प्रस्ताव रखा गया है।

एस.एफ.आई. ने कहा कि 3 अप्रैल को सुनियोजित तरीके से डी.एस.पी. द्वारा छात्रों के साथ दुव्र्यवहार किया गया। एस.एफ.आई. राज्याध्यक्ष को निशाना बना कर डी.एस.पी. सुरेश चैहान द्वारा राज्याध्यक्ष के साथ गाली – गलौच व जान से मारने की धमकी दी जाती है व झूठा मुकद्दमा बना कर गिरफ्तार किया गया। वहीं दूसरी तरफ वि. वि. प्रशासन द्वारा छात्रावास में रह रहे छात्रों को प्रताड़ित किया जाता रहा व 24 घण्टे खुले रहने वाले हाॅस्टलों को पुलिस के सहारे सुबह 6 से रात 10 बजे तक खुला रखा जाता है व 24 घण्टे खुली रहने वाली लाईब्रेरी को रात 9 बजे बंद किया जा रहा है।

एस.एफ.आई. मानती है कि 2014 के बाद आर.एस.एस. व भाजपा द्वारा देश भर में विश्वविद्यालयों, प्रगतिशील विचार, जनवादी और लोकतान्त्रिक संस्थानों पर हमले कर रही है। हि. प्र. में भी प्रदेश सरकार व आर.एस.एस. वि. वि.प्रशासन के साथ मिलकर वि. वि. में अपने चहेतों को भर्ती कर व उन्हें फायदा पहुंचा कर भगवाकरण के एजैण्डे को लागू करना चाहती है व शिक्षा के निजीकरण व व्यवसायिकरण की मुहिम को तेज कर रही है। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मुख्यमंत्री व शिक्षा मंत्री का रवैया निन्दनीय है। मुख्यमंत्री द्वारा बिना किसी जांच के एस.एफ.आई. को गलत ठहराना उनकी नकारात्मक सोच को दर्शाता है।

एस.एफ.आई. ने मांग कि है कि:-

  1. आऊटसोर्स के नाम पर गैर कानूनी तरीके से हुई भर्तियों को रद्द किया जाए और इस प्रक्रिया में संलिप्त लोगों पर कानूनी कार्यवाही की जाए।
  2. छात्रों पर हुए हमले और वि. वि. में हिंसा और भय के माहौल बनाने वाले ए.बी.वी.पी./आर.एस.एस. के कार्यकर्ताओं पर कड़ी कार्यवाही की जाए।
  3. एम।सी।ए। विभाग में गैर कानूनी तरीके से हुई पी।एच।डी। में प्रवेश को वापिस लिया जाए और इस प्रक्रिया में संलिप्त लोगों पर कानूनी कार्यवाही की जाए।
  4. कुलपति द्वारा प्रस्तावित किए गए 10 प्रतिशत फीस बढ़ोतरी के प्रस्ताव को वापिस लिया जाए।
  5. छात्रों के जनवादी अधिकारों को परिसर के अन्दर बहाल किया जाए।
  6. हाॅस्टल से पुलिस के पहरे को हटाया जाए और 10 बजे की बाध्यता को हटाया जाए। ताकि छात्रों में भय का माहौल न रहें।
  7. बैज़ के नाम पर निलंबित किए गए छात्रों का निलम्बन तुरन्त वापिस लिया जाए।
  8. वि. वि. में प्रशासनिक नियुक्तियां राजनीतिक स्तर पर न हो कर वरिष्ठता के आधार पर की जाए।
  9. छात्रों के साथ दुव्र्यवहार और उन्हें डराने वाले डी.एस.पी. पर कार्यवाही की जाए।

एस.एफ.आई. प्रदेश सरकार व वि. वि. कुलाधिपति से  पूछा है:-

  1. बैज़ पहनने पर छात्रों का निलंबन परन्तु गल्र्ज़ हाॅस्टल में शराब पी कर व दराट लेकर जाने वाले ए.बी.वी.पी.कार्यकर्ता पर अब तक कोर्यवाई क्यों नहीं?
  2. वि. वि.में हुए पी।एच।डी। फर्जीवाड़े (यू।जी।सी। के नियमों को दरकिनार करते हुए 10 महीने में पूर्व कुलपति के बेटे की पी।एच।डी। थिसिज को जमा करवाया गया) व एम। काॅम प्रश्न प्रत्र फर्जीवाड़े (अपनी एक ही किताब से लगभग 80 प्रश्न प्रवेश परीक्षा में शामिल किए गए जो परीक्षा बाद में रद्द की गई) में संलिप्त प्रो। कुलवंत पठानियां जो कि वर्तमान में दूरवर्ती शिक्षा केन्द्र के निदेशक है, पर कोई कार्यवाही कुलाधिपति महोदय द्वारा क्यों नहीं की गई?
  3. वि. वि. में पढ़ाने वाले प्राध्यापक जोकि ए.बी.वी.पी. के पदाधिकारी है और वि. वि. में होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेवार है पर कुलाधिपति महोदय द्वारा अभी तक कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया गया?
  4. वि. वि. द्वारा विभिन्न मामलों में गठित की जाने वाली जांच कमेटी में शामिल प्रशासनिक अधिकारियों जो कि किसी एक राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं, द्वारा निष्पक्ष जांच कैसे की जा सकती है?
  5. अन्तर्राष्ट्रीय दूरवर्ती शिक्षा केन्द्र में हुए करोड़ों के प्रोस्पेक्टस घोटाले में संलिप्त एक ही कर्मचारी से जांच पड़ताल क्यों?
  6. वि. वि.में चल रहे म्त्च् ;म्दजमतचतपेम त्मेवनतबम च्संददपदहद्ध प्रोजेक्ट जो कि 8।5 करोड़ की लागत का है, को पूरा करने की समय सीमा 2018 में समाप्त हो चुकी है परन्तु अभी भी प्रोजेक्ट अधर में लटका है इस पर अब तक जांच कमेटी क्यों नहीं गठित की गई?
  7. पिछले कल छप्त्थ् ;छंजपवदंस प्देजपजनजपवदंस त्ंदापदह थ्तंउमूवताद्ध द्वारा जारी की गई छप्त्थ् त्ंदापदह 2019 में प्रदेश वि. वि.का स्थान 150 – 200 के बीच में है जो कि वर्ष 2017 में 100 – 150 के बीच था जिसमें लगातार गिरावट आई है इस रैंकिंग में सुधार करने के लिए प्रदेश सरकार, कुलाधिपति महोदय, वि. वि. प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाएं जा रहे हैं?
  8. वि. वि. परिसर में छात्रों द्वारा पहने जाने वाले बैज़ से तनाव का माहौल कैसे बनता है? वि. वि.प्रशासन अपने इस बेतुके फरमान पर जवाब दे।
  9. वि. वि. परिसर में न्यायालय का हवाला देकर छात्रों को धरना – प्रदर्शन करने से रोक दिया गया परन्तु वि. वि. कुलपति ने जिस दिन अपना कार्यभार ग्रहण किया उस दिन नारों के साथ समरहिल चैक से कुलपति कार्यालय तक गए। क्या न्यायालय के आदेश केवल छात्रों पर ही लागू होते हैं?

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दो वर्षों में अपने ऐशो आराम के लिए जनता के पैसों से फिजूलखर्ची के अलावा कुछ भी नहीं कर पाया शिमला नगर निगम:चौहान

BJP Rules Shimla MC is a complete failure

शिमला– नगर निगम शिमला में बीजेपी के दो वर्षों का कार्यकाल पूर्णतः विफल रहा है। इन दो वर्षों में पानी व कूड़े की दरों, किराया आदि में वृद्धि कर जनता के ऊपर आर्थिक बोझ डालने व सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया है तथा अपने ऐशो आराम के लिए नई गाड़ियां खरीद कर जनता के पैसों से फिजूलखर्ची को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह कहना है भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के नेता और शिमला शहर के पूर्व मेयर संजय चौहान का।

चौहान का कहना है कि पूर्व नगर निगम के प्रयासों से वर्ष 2016 में पेयजल की सभी योजनाओ को सरकार से अपने अधीन लेने के पश्चात जो ग्रेटर शिमला वाटर सप्लाई एंड सिवरेज सर्कल(GSWSSC) का गठन कर इसमें सुधार का कार्य किया गया था, जिसमें मुख्यतः गिरी, गुम्मा व अश्विनी खड्ड पेयजल योजनाओं की पाइपलाइन व पम्पो को बदलने का कार्य किया गया तथा टैंकों की मुरम्मत की गई, उसका ही नतीजा है कि 20 से 28 MLD मिलने वाला पानी आज 50 MLD से उपर तक पहुंच गया है। परन्तु जिस प्रकार से शिमला शहर में गत वर्ष 2018 में नगर निगम के कुप्रबंधन के कारण पानी के त्राहि त्राहि हुई और विश्वभर में शहर की बदनामी हुई उसके लिए शहरवासी कभी भी वर्तमान बीजेपी शासित नगर निगम को मुआफ़ नहीं करेगी।

2 वर्ष में न तो पानी के मीटर लगा पाया, न ही बिल मीटर रीडिंग के आधार पे दे पाया निगम

वर्तमान नगर निगम की विफलता इससे भी स्पष्ट हो जाती है कि पूर्व नगर निगम ने पूरे शहर के पानी के मीटर बदल कर जून, 2017 से पानी के बिल हर महीने मीटर रीडिंग के आधार पर देने का कार्य जोरो पर आरम्भ कर दिया था परन्तु आज 2 वर्ष बीतने के बावजूद न तो पूरे मीटर बदले गए न ही हर महीने पानी के बिल मीटर रीडिंग के आधार पर दिए जा रहे हैं। हद तो तब हो गई हैं कि कई वार्डो में तो मार्च, 2018 यानी तकरीबन एक साल तीन महीने बीतने के बावजूद पानी के बिल नहीं दिये गए हैं। इससे बीजेपी शासित नगर निगम की विफल कार्यशैली स्पष्ट होती है।

शहर के जीणोद्धार व आधुनिकीकरण के लिए 2906 करोड़ रुपये की स्वीकृत परियोजना  में 2 वर्ष के पश्चात  कोई प्रगति नही

उन्होंने कहा कि पूर्व नगर निगम ने वर्ष 2016 में शिमला शहर के लिए पेयजल व सीवरेज के सुधार व सतलुज से 65 MLD अतिरिक्त पानी उपलब्ध करवाने हेतू विश्व बैंक से 125 मिलियन डॉलर की परियोजना स्वीकृत करवाई गई थी। इससे शहर में 24×7 पानी शहर में दिया जाना था। परन्तु अभी तक इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है। इसके विपरीत वर्तमान नगर निगम ने प्रदेश सरकार के दबाव के चलते पानी को अपनी परिधि से बाहर कर कंपनी का गठन कर इसके निजीकरण का कार्य कर दिया है।

स्मार्ट सिटी परियोजना, जो कांग्रेस की राज्य सरकार व केंद्र की बीजेपी सरकार के विरोध के बावजूद एक लम्बे संघर्ष के पश्चात उच्च न्यायालय में दखल से पूर्व नगर निगम ने वर्ष 2016 में शिमला शहर को इसमें सम्मिलित किया था तथा शहर के जीणोद्धार व आधुनिकीकरण के लिए 2906 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की थी। परन्तु आज 2 वर्ष से अधिक समय बीतने के पश्चात अभी तक इसमें कोई प्रगति नही की गई है। इससे नगर निगम व प्रदेश सरकार का शिमला शहर के प्रति उदासीन रवय्या स्पष्ट होता है।

सफाई व्यवस्था पूर्णतःध्वस्थ, महीनों तक नहीं उठ रहा कूड़ा

चौहान ने कहा कि आज शिमला शहर में सफाई व्यवस्था पूर्णतः चरमरा गई है। कई वार्ड तो ऐसे हैं जहाँ महीनों तक कूड़ा नहीं उठ रहा है। पूरे शहर में गंदगी फैली है परन्तु इस ओर नगर निगम का कोई ध्यान नहीं है। यहां तक कि सत्तारूढ़ बीजेपी के कई पार्षद भी इस पर कई बार प्रश्नचिन्ह लगा चुके हैं। भरयाल स्थित कूड़े से बिजली बनाने वाला प्लांट 2 वर्ष पूर्व लगाया गया है परन्तु वर्तमान नगर निगम इसे चलाने में पूर्णतः विफल रही है और आज इन कूड़े के ढेरों में कई दिनों से आग लगी है औऱ इससे पूरे शहर व इसके साथ लगते क्षेत्रों की हवा में जहर घुल रहा है तथा पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। परंतु नगर निगम इसको रोकने व सफाई व्यवस्था को सुचारू करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है।

पुरानी योजनाओं का शिलान्यास कर किया जा रहा दिखावा व प्रचार

पूर्व नगर निगम द्वारा आरम्भ की गई परियोजनाएं जिनमे पार्किंग, पार्क, फुटब्रिज, सामूदायिक भवन,रोपवे, तहबाजारियों के पुनर्वास, शहरी गरीब के लिए आवास, लेबर होस्टल, लक्कड़ बाज़ार से लिफ्ट व लिफ्ट से छोटा शिमला टनल आदि के निर्माण में वर्तमान नगर निगम कोई रूचि नहीं दिखा रही हैं। आज भी आई जी एम सी, विकास नगर, कैथू, स्नोव्यू, रामनगर, पंथाघाटी, ढली आदि स्थानों जो पार्किंग व फुटब्रिज का निर्माण कार्य होना है उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कसुम्पटी में जो शहर का आधुनिकतम रानी ग्राउंड पार्क का निर्माण जो 90 प्रतिशत वर्ष 2017 में पूर्ण हो गया था पिछले 2 वर्षों में शेष 10 प्रतिशत कार्य भी पूर्ण कर इसे जनता को समर्पित नही किया गया है। केवल पुरानी योजनाओं का शिलान्यास कर दिखावा व प्रचार किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि बीजेपी शासित नगर निगम अपनी व शहरवासियों की बहुमूल्य सम्पत्तियों जिसमें ऐतिहासिक टाउन हॉल, टूटीकंडी क्रॉसिंग बहुउद्देश्यीय कॉम्प्लेक्स व पार्किंग, लिफ्ट, पार्क आदि को सुरक्षित रखने में पूर्णतः विफल रही है। टाउन हॉल जो शुरू से ही नगर निगम की सम्पत्ति है और इसमें नगर निगम का कार्यालय रहा है इसे हासिल करने में वर्तमान नगर निगम कोई रूचि नहीं दिखा रहा है और सरकार की मंशा में सहमति प्रदान कर इसे किसी संस्था को गुपचुप तरीके से देने के लिए कार्य किया जा रहा है। जोकि शहर की जनता के साथ एक बड़ा धोखा किया जा रहा है।

सब्जी मंडी, अनाज मंडी, टिम्बर मार्किट व ट्रांसपोर्ट एरिया को शहर से बाहर शिफ्ट करने के लिए नहीं किया कोई भी कार्य

वर्तमान नगर निगम द्वारा शहर से सब्जी मंडी, अनाज मंडी, टिम्बर मार्किट व ट्रांसपोर्ट एरिया को शहर से बाहर पूर्व नगर निगम द्वारा चिन्हित स्थानों में शिफ्ट करने के लिए कोई भी कार्य नहीं किया गया है। इससे जनता को रोजाना लगने वाले ट्रैफिक जाम से निजात मिलनी थीं तथा कारोबारियों को भी खुले में कारोबार का अवसर प्राप्त होना था।

निगम अपने कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने में विफल

चौहान ने ये भी आरोप लगाया कि वर्तमान नगर निगम अपने कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है। आज चाहे स्वास्थ्य विभाग में सफाई कर्मचारी हो या जल आपूर्ति विभाग का कंपनी में भेजा कर्मचारी हो वह सभी प्रताड़ित व शोषित महसूस कर रहे हैं। सैहब सोसाइटी के कर्मचारियों का काम का बोझ तो बढ़ाया जा रहा है परन्तु इनका वेतन नही बढ़ाया जा रहा है। जल आपूर्ति विभाग के कर्मचारियों को जबरन कंपनी की सेवा शर्तों पर कार्य के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार द्वारा नई भर्ती पर रोक से कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे हालात पैदा कर अब पानी के साथ साथ अब सफाई भी ठेके पर देने का कार्य वर्तमान नगर निगम ने किया है।

बीजेपी शासित नगर निगम शिमला गत दो वर्षों में शहर के विकास को दिशा देने व पूर्व नगर निगम द्वारा स्वीकृत योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में भी पूर्णतः विफल रही है। शहर में विकास का चक्र ठप हो गया है। बीजेपी शासित नगर निगम ने जनविरोधी नीतियों को लागू कर जनता पर आर्थिक बोझ लादने का कार्य किया है। मूलभूत सुविधाओं जैसे पानी, सफाई, बिजली, पार्किंग, सड़क आदि का निजीकरण कर जनता की जेब मे डाका डाला जा रहा है। चौहान ने कहा कि सी.पी.एम. इन जनविरोधी नीतियो को बदलने के लिए इनके विरुद्ध जनता को लामबंद कर जनआंदोलन करेगी और ये तब तक जारी रहेगा जब तक बीजेपी की सरकार व नगर निगम इनको नहीं बदलेगी तथा जनता को बेहतर सुविधाएं व राहत नहीं प्रदान करेगी।

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शिमला में दबंगों द्वारा दलित परिवार से मारपीट, न पुलिस ने एफआईआर दर्ज़ की, न डॉक्टर ने दिया उचित उपचार: दलित शोषण मुक्ति मंच

Dalit Family in Shimla's Dhalli beaten

शिमला-हिमाचल प्रदेश दलित शोषण मुक्ति मंच शिमला के ढली थाना के अन्तर्गत आने वाले परिवार के साथ पड़ोस में रहने वाले दबंगों द्वारा जातिगत उत्पीड़न और मारपीट के मामले की कडी निन्दा शिमला है।

मंच ने आरोप लगाया है कि जब पीडित परिवार एफआईआर दर्ज करवाने के लिए ढली थाने में पहुंचा तो थाना प्रभारी ने भी एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की,जिस वजह से पीडित परिवार को ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवानी पड़ी। मंच ने कहा कि ढली थाना ने 18 घंटे तक एफआईआर तक दर्ज नहीं की गयी और पुलिस आरोपियों को पुलिस वैन में घुमाती रही।

उसके बाद पीडित परिवार जब उपचार के लिए आई.जी.एम.सी. पहुंचा तो उन्हें उचित उपचार नहीं मिला, पीडित लड़की कई घंटों तक स्ट्रेचर पर पड़ी खून से लतपथ दर्द से कहलाती रही। दलित शोषण मुक्ति मंच पुलिस और डॉक्टर के इस तरह की गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए कडी आलोचना की है और सरकार से मांग की है कि दोषी पुलिस कर्मियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐ।



दलित शोषण मुक्ति मंच के शहरी संयोजक विवेक कश्यप व सह संयोजक राकेश कुमार ने कहा कि जब से प्रदेश में बीजेपी की सरकार सत्ता में आई है तब से दलितों पर अत्याचार बड़े है वो चाहे सिरमौर में केदार सिंह जिदान की हत्या हो,नेरवा में रजत की हत्या हो,कुल्लू घाटी के थाटीबीड़ की घटना हो या सोलन के लुहारघाट में एक दलित शिक्षक के साथ मारपीट का मामला हो,सरकार इन सब मामलों में न्याय दिलाने में विफल रही।

उन्होंने कहा कि इससे सरकार का दलित विरोधी रवैया सामने आया है। ढली मारपीट व छेडछाड मामले में ऐट्रोसिटी एक्ट लगने के बाद भी पुलिस अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं कर पाई है।

‌दलित शोषण मुक्ति मंच ( हि।प्र) सरकार से मांंग की है कि अपने काम में कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों और डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाऐऔर मारपीट और छेड़छाड़ के आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार किया जाऐ। मंच ने चेतवानी दी है कि अगर सरकार दोषियों को तुरंत गिरफ्तार नहीं करती है तो दलित शोषण मुक्ति मंच शहर की जनता को लामबंद कर के एक उग्र आंदोलन करेगी।

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समय रहते पुलिस ने की होती मदद तो नहीं होता दुराचार, दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर भी दर्ज़ हो एफआईआर: गुड़िया न्याय मंच

Shimla Police did not help rape victim

शिमला-गुड़िया न्याय मंच ने शिमला शहर के बीचोंबीच बलात्कार के मामले में पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की है व दोषियों के साथ जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। मंच ने चेताया है कि अगर बलात्कार के दोषियों व जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई तो मंच जनता को लामबंद करके आंदोलन करेगा।

मंच के सह संयोजक विजेंद्र मेहरा ने पुलिस की नाक के नीचे एक और लड़की के बलात्कार पर कड़ा रोष ज़ाहिर किया है। उन्होंने कहा है कि इस बेहद संवेदनशील मामले में बलात्कार के दोषियों के साथ ही जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों पर तुरन्त एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। अगर पुलिस प्रशासन ने थोड़ी भी संवेदनशीलता दिखाई होती तो मानवता को शर्मशार करने वाला यह घिनौना कार्य नहीं होता।

मंच ने यह सवाल उठाया है कि जब यह लड़की पुलिस के पास मदद मांगने गई तो फिर उसे मदद क्यों नहीं मिली। मंच के सह संयोजक ने कहा कि अगर पुलिस ने इस लड़की की समय रहते मदद की होती तो इस लड़की से दुराचार नहीं होता और न ही दरिंदे अपने मंसूबों में कामयाब हो पाते। उन्होंने इस बलात्कार के लिए पूरी तरह पुलिस जिम्मेवार ठहराया है।

उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम से गुड़िया प्रकरण की तरह एक बार फिर से स्पष्ट हो गया है कि हिमाचल प्रदेश के थाने किसी भी तरह से आम जनता के लिए सुरक्षित नहीं हैं और न ही इन थानों में जाने पर जनता को सुरक्षा,न्याय व मदद मिलती है। यह घटनाक्रम एक बार पुनः गुड़िया प्रकरण की तरह पुलिस की बेहद संवेदनहीन कार्यप्रणाली की पोल खोलता है व उस पर काला धब्बा है।

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