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केदार सिंह जिंदान हत्याकांड- ताकि और न कोई जिंदान उभरे

RTI-Activist-Kedar-Singh-Jindal-Murdered-case

शिमला-हिमाचल प्रदेश के बहुचर्चित केदार सिंह जिंदान हत्याकांड में आखिरकार 44 गवाहों की गवाही के बाद विशेष न्यायाधीश सिरमौर आरके चौधरी की अदालत ने तीन दोषियों को सजा सुना दी है। तीन साल पहले दलित नेता और आरटीआई एक्टिविस्ट केदार सिंह जिंदान को तथाकथित उच्च जाति के दबंगों ने सिरमौर जिला के बकरास गांव में क्रूरता के साथ पीट-पीट कर मार डाला था और सबूत को छुपाने के लिए उसको एक्सीडेंट में तब्दील कर दिया था। लाश को सड़क पर डाल कर उस पर एसयूवी चढ़ाई गई और बुरी तरह से कुचल दिया था। यह केवल जातीय उत्पीड़न का मामला नहीं था बल्कि यह मामला दलितों में बढ़ती चेतना और कोई केदार न उभरने देने का भी प्रयास था।

जिला न्यायवादी बीएन शांडिल ने यह जानकारी देते हुए बताया है कि यह मामला वर्ष 2018 का है। 07 सितंबर 2018 को मृतक केदार सिंह जिंदान, रघुवीर सिंह व जगदीश बीआरसी दफ्तर से बाहर निकले। इसी दौरान दोषी पाए गए जय प्रकाश उप प्रधान ग्राम पंचायत बकरास, कर्म सिंह उर्फ काकू व गोपाल सिंह सड़क पर पहले से ही खड़े थे। इसी बीच जय प्रकाश व कर्म सिंह उर्फ काकू स्कार्पियो गाड़ी से उतर कर नैन सिंह को मिले। दोनों ने नैन सिंह से हाथ मिलाया। वहीं बातचीत में नैन सिंह को ऐसा लगा कि केदार सिंह को मारने की योजना बनाई गई है।

करीब दोपहर 12 बजे जब मृतक केदार सिंह जिंदान, रघुवीर सिंह व जगदीश चंद कार्यालय से बाहर निकले, तो सड़क पर आरोपी जयप्रकाश ने मृतक केदार सिंह जिंदान को सड़क पर आने को लेकर आवाज लगाई। मृतक केदार सिंह जिंदान नीचे सड़क पर चला गया। वहीं रघुवीर सिंह व जगदीश चंद भी बीआरसी दफ्तर के बाहर खड़े रहे। नीचे सड़क पर आरोपी जय प्रकाश की काले रंग की स्कार्पियो पहले से ही खड़ी थी। जैसे ही मृतक केदार सिंह जिंदान गाड़ी के नजदीक पहुंचा, तो जय प्रकाश ने मृतक केदार सिंह जिंदान को गाड़ी के बोनट के पास चलने को कहा, तो वहां आरोपी गोपाल सिंह व कर्म सिंह उर्फ काकू भी खड़े हो गए।

जिसके बाद तीनों में बहस शुरू हो गई। इसी दौरान तीनों आरोपियों ने स्कार्पियो से डंडे निकालकर केदार सिंह जिंदान से मारपीट शुरू कर दी। इस मारपीट में मृतक केदार सिंह सड़क पर गिर गया। जब वह उठने की कोशिश कर रहा था, तो आरोपी जयप्रकाश एक लोहे का गाडर उठा कर लाया और मृतक केदार सिंह जिंदान के सिर पर 4-5 बार वार किया। फिर आरोपी जयप्रकाश ने गाड़ी को स्टार्ट किया। आरोपी कर्म सिंह उर्फ काकू व गोपाल सिंह ने मृतक केदार सिंह जिंदान को उठाकर गाड़ी के आगे सड़क पर रखा और आरोपी जय प्रकाश ने एक बार स्कॉर्पियो को मृतक केदार सिंह जिंदान के शरीर के ऊपर से आगे, फिर पीछे किया।

इसके बाद गाड़ी को शरीर के ऊपर से सीधा आगे ले जाकर मृतक के शरीर से करीब 160 फुट आगे खड़ा कर दिया। उसके उपरांत उसने गाड़ी की बाईं साइड के पिछले टायर के ब्रेक आयल पाइप को तोड़ दिया, ताकि पुलिस को संशय बने कि यह हत्या नहीं बल्कि सड़क दुर्घटना हुई है। इस दौरान आरोपी जयप्रकाश गाड़ी से उतरा, तो कर्म सिंह उर्फ काकू व गोपाल सिंह ने आरोपी जय प्रकाश को बताया कि जगदीश ऊपर से देख रहा है।

इसके बाद आरोपी जयप्रकाश ने ऊपर जगदीश को देख कर कहा कि तू क्या देख रहा है, शाम तक तेरा भी यही हाल करेंगे। इसी मामले में अभियोग पक्ष ने विशेष अदालत में 44 गवाह पेश किए और बचाव पक्ष ने दो गवाह पेश किए। लिहाजा अदालत में तीनों दोषियों को सजा सुनाई।

केदार सिंह जिंदान की हत्या के मामले में आरोपी जय प्रकाश को आईपीसी की धारा 302 सहित एससी व एसटी एक्ट की धारा 3(2) के तहत दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा व एक लाख रुपए जुर्माना अदा करने की सजा सुनाई गई है। जुर्माना अदा न करने की सूरत में दोषी को एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। दोषी जय प्रकाश को धारा 201 के तहत 5 वर्ष का कारावास व 25 हजार रुपए जुर्माना अदा करने के भी आदेश अदालत ने जारी किए हैं। जुर्माना अदा न करने की सूरत में दोषी को एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

इसी मामले में एक अन्य आरोपी गोपाल सिंह को भी आईपीसी की धारा 302 व एससीएसी एक्ट की धारा 3(2)(वी) के तहत उम्र कैद व 50,000 रुपए जुर्माना अदा करने की की सजा सुनाई गई है। वहीं जुर्माना अदा न करने की सूरत में एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। जबकि आईपीसी की धारा 201 के तहत पांच वर्ष का कारावास व 25000 रुपये जुर्माना अदा करना होगा। वहीं जुर्माना अदा न कर पाने की सूरत में एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना में होगा।

इसके अलावा जिंदान हत्याकांड में आरोपी कर्म सिंह को आईपीसी की धारा 323 के तहत एक वर्ष का कठोर कारावास व एक हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई है। जुर्माना अदा न करने की सूरत में एक महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा और धारा 325 के तहत तीन वर्ष का कारावास व 5000 रुपये जुर्माना अदा करना होगा। वहीं जुर्माना अदा न कर पाने की सूरत में एक महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। इसके अलावा धारा 201 के तहत एक वर्ष का कारावास व 5000 रुपये जुर्माना अदा करना होगा। जुर्माना अदा न करने की सूरत में एक महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

कौन थे केदार सिंह जिंदान और क्या बनी मौत की वजह

केदार सिंह जिंदान एक जिंदादिल और क्रांतिकारी इंसान थे। उसने सदियों से दबी-कुचली जनता पर हो रहे जुल्मों का विरोध करना शुरू कर दिया था। उसने अपने गांव ही नहीं पूरे इलाके में तथाकथित उच्च के उत्पीड़न का विरोध किया, लोगों को संगठित करना शुरू किया और लोगों में उम्मीद जगानी शुरू कर दी थी। उसने जातीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए अंतरजातीय विवाहों का समर्थन किया। महिला और बच्चों की समग्लिंग का पर्दाफाश किया।

उन्होंने अमीर लोगों द्वारा बीपीएल सूची में नाम दर्ज कर गरीबों का हक मारने के खिलाफ आरटीआई फाईल कर खुलासा किया। उन्होंने पढ़-लिख वकालत की और अपने लोगों के केस लड़ने शुरू किये। एक तरह से कहा जाए तो वह गरीब-दलितों के नेता बनकर उभरने लगे थे। और केवल दिखावए और चापलूस नेता नहीं बल्कि एक जुझारू लड़ाकू नेता के तौर पर उन्होंने संघर्ष किया। जो उनकी मौत का कारण बनी वह जून 2018 की घटना है।

उन्होंने शिमला के अंदर प्रैस कॉन्फ्रेंस की और तथाकथित उच्च जाति के दबंग अमीर लोगों द्वारा बीपीएल श्रेणी में नाम दर्ज करवा कर गरीबों का हक मारने का पर्दाफाश किया। केदार सिंह जिंदान द्वारा की गई प्रैस कॉन्फ्रेंस का विडियो देखें। उन्होंने साफ तौर पर बताया कि किस तरह से उप प्रधान (गांव का उप सरपंच) जय प्रकाश (जिसने बाद में जिंदान की हत्या की) ने अपने परिजनों के बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) में नाम दर्ज करवा रखे थे, इस का फायदा उनको नौकरियों में हुआ है और उनके पास एसयूवी, महिंद्रा, अल्टो गाड़ियां है और कई जगह घर है। आरटीआई से हुए इस खुलासे से पूरे इलाके के दबंग घबरा गए थे और स्थानीय उत्पीड़ित लोगों में लड़ने का हौंसला आने लगा था। लेकिन यह उनकी मौत का कारण बना।

विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा की गई जांच रिपोर्ट के अनुसार 44 वर्षीय केदार का जन्म सिरमौर जिला के ब्लाक शिलाई, ग्राम पंचायत गुनडाह, गांव पाब में स्वर्गीय रतन सिंह के घर  हुआ था। उनका परिवार अनूसूचित जाति (कौली) से संबंध रखता है। सिरमौर जिले में कौली लगभग भूमिहीन दलित है जो पारंपरिक रूप से हरकारे सहित ब्रह्मणों और राजपूतों के खेतों में बेगार और बंधुआ मजदूरी का काम करते थे। अभी भी जिंदान के भाई राजपूतों की आज्ञा से उनको 5000 रुपये और बकरी देकर शामलात जमीन पर थोड़ी बहुत खेती करते हैं।

एक जमीनी झगड़े में जिंदान ने अपने बाप को जवानी में ही खो दिया था। उच्च जाति के दबंगों के उकसावे में दलितों में आपसी झगड़ा हुआ जिस में उनकी मौत हो गई थी। जिंदान ने 2010 में शिलाई थाने में जब एफआईआर दर्ज करवाई थी तो ये मामला उठाया था। जब गांव के प्राथमिक स्कूल में उन्होंने ठेके पर रखे अध्यापक के घोटाले का पर्दाफाश किया तो उन्होंने लिखवाया था कि उसको उच्च जाति के लोगों से खतरा है जिसमें लाईन थी – “हमने तुम्हारे बाप को तुम्हारे कौली परिवारों से ही मरवाया लेकिन तुम्हें हम अपने हाथों से ही मारेंगे।”

केदार ने नवोदय विद्यालय से पढ़ाई पूरी की और फिर कानून की डिग्री हासिल की थी। उन्होंने नौजवान छात्रों को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए एक शैक्षिक अकादमी की शुरुआत भी की थी। इस दौरान वह कोली समाज की आवाज बनकर उभरा था। वह अखिल भारतीय कौली महासभा का उप अध्यक्ष और हरिजन लीग का पदाधिकारी भी बना। उसने बहुजन समाज पार्टी की टिकट से एक बार चुनाव भी लड़ा था। वह लगातार आरटीआई कार्यकर्ता के तौर पर इलाके के विकास कार्यों में होने वाली धांधलियों और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर रहा था। यही कारण था कि वह पूरे इलाके के दबंगों के आंख की किरकिरी बन गया था।

ध्यान देने वाली बात यह है कि वह लगातार पुलिस और प्रशासन के संपर्क में था और उनके पास गुहार लगा रहा था। लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। इस से पहले नवंबर 2017 में भी शिलाई गांव के पास जिंदान पर हमला हुआ था। उनको बस से उतार कर लगभग 50 लोगों ने उनसे बुरी तरह मारपीट की थी। वह उसको मरा समझ कर छोड़ कर चले गए थे। पीटने के बाद जब वह लहूलुहान होकर बेहोश हो गया था, तो उनके ऊपर कई तसले मिट्टी के डाल दिये गये थे। इस मामले को जिंदान ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के समक्ष उठाया था। इसकी जांच के आदेश हुए। इसके बाद जिंदान ने जो प्रैस कॉन्फ्रेंस की थी उसमें उन्होंने 30 लोगों के नाम दिये थे, जिनसे उनको खतरा था। उनमें से एक नाम उनकी हत्या के दोषी पाए गए जयप्रकाश का भी था।

तीन केश जो उनकी जान के दुश्मन बने वह ये थे- आरटीआई के खुलासे के बाद उनके गांव के अनुबंधित अध्यापक को बरखास्त किया गया। उन्होंने 2014 में दवरा, और 2017 में मनाली गांव में अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया और जिस कारण उन पर दिसंबर 2017 का हमला भी हुआ। तीसरा बीपीएल योजना का दुरुपयोग कर बकरास पंचायत में फायदा उठाने वालों का पर्दाफाश जिस कारण उनकी 07 दिसंबर को हत्या हुई।

फैसले का स्वागत

जिंदान की हत्या से चिंतित मानव अधिकार कार्यकर्ताओं व पर्यवारणवादियों द्वारा सबसे पहले की गई तथ्य अनवेषण रिपोर्ट (The Moment of Reckoning) और इसकी सदस्य रही हिमधरा क्लेक्टिव की मानशी असेर ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि संविधान दिवस पर ये खबर मिलना कि केदार सिंह जिन्दान के कातिलों को सज़ा सुनाई गयी सभी न्याय के पक्षधरों के लिए ख़ुशी की बात है।

यह फैसला ऐतिहासिक है क्योंकि हिमाचल राज्य में सरकारी आंकड़ों के अनुसार जातीय उत्पीड़न में सजा की दर मात्र 09% है। तीन साल में इस तरह का फैसला न्यायालय से आना जहां दोषियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई जाए ये अपने आप में बड़ी बात है। इस केस में कोर्ट और पुलिस दोनों की ही भूमिका सराहनीय थी पर इसमें सबसे बड़ी जीत उन सभी लोगों की है जो लगातार न्याय के लिए संघर्षरत रहे। चाहे वो जिन्दान के परिवारजन हों या उनके साथ खड़े संगठन।

केदार सिंह जिन्दान ने जो मुद्दे उठाये और जिस मुहिम के चलते अपनी जान गवाई, यह उसकी भी जीत है। हिमाचल में जातिगत भेद भाव और हिंसा का मुद्दा आज भी काफी हद तक नजरअंदाज किया जाता है। अभी भी और बहुत सारे सामाजिक प्रयासों की जरूरत है। राज्य में अनूसूचित जाति आयोग और मानव अधिकार आयोग दोनों को मज़बूत करने का काम सरकार को करना चाहिए। परन्तु उससे बड़ा काम है सामाजिक मानसिकता को बदलने का, ताकि हमारे संवैधानिक मूल्यों पर हम खरे उतर सकें।

सामाजिक-आर्थिक समानता का जन अभियान की तरफ से सुखदेव विश्वप्रेमी ने फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिंदान की हत्या से पूरा समाज दुखी था। इस की लड़ाई में, कोर्ट से लेकर सड़कों तक सभी तरह के संगठनों और सभी तरह के समुदायों का समर्थन हासिल हुआ। आज हिमाचल में तरह-तरह की यात्राओं के नाम पर लोगों को जाति और आरक्षण के नाम पर आपस में लड़ाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे लोग मानव अधिकार की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ लोगों को उकसा रहे हैं। ऐसे में जिंदान के दोषियों को सजा देना स्वागत योग्य है और यह पूरे समाज की जीत है।

वहीं अखिल भारतीय कोली समाज ने न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। सिरमौर जिला अध्यक्ष संजय पुंडीर ने जारी एक बयान में  बताया कि अखिल भारतीय कोली समाज और अन्य संगठनों ने मिल कर दलित शोषण मुक्ति मंच का गठन किया और लड़ाई लड़ने में निर्णायक भूमिका अदा की। दलित शोषण मुक्ति मंच जिला सिरमौर कमेटी और अनुसूचित जाति वर्ग के सभी संगठनों वाल्मीकि समाज, रविदास समाज, समता सैनिक दल, कबीर पंथी समाज, हरिजन लीग, महिला समिति, छात्र संगठन, मजदूरों और किसानों के संगठन का भी उन्होंने धन्यवाद किया है।

संजय पुंडीर ने बताया की ये माकपा विधायक ने जाति विशेष से ऊपर उठ कर जिन्दान को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जब शिलाई क्षेत्र में जिन्दान के शव को जलाने का विरोध होने लगा, उस समय भी राकेश सिंघा ने स्वयं जिन्दान की पत्नी और बच्चों के साथ जिन्दान के गांव पहुंच कर जाति विशेष से ऊपर उठ कर जिन्दान के गाँव मे ही दाह संस्कार करवा कर दलित समुदाय के अन्दर से भय के माहौल को खत्म किया था। संजय पुंडीर ने कहा कि हम उन सभी संगठनों का धन्यवाद करते है जिन्होंने इस लड़ाई में जाति से ऊपर मानवता को माना और इस शोषण के खिलाफ जंग में साथ दिया।

दलित शोषण मुक्ति मंच के अशिष ने बातचीत करते हुए कहा कि हमारे संगठन ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। हमारा संगठन हर तरह के शोषण के खिलाफ है। चाहे वह सर्वण समाज का हो या फिर दलित समाज का।

लेखक: गगनदीप सिंह, एक लेखक, स्वतंत्र पत्रकार, शोधकर्ता, अनुवादक और डॉक्यूमेंटरी मेकर (Documentary maker)

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हिमाचल वाचर इस लेख की किसी भी जानकारी की सटीकता, पूर्णता, उपयुक्तता या वैधता के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। सभी जानकारी यथास्थिति के आधार पर प्रदान की जाती है। लेख में दी गई जानकारी, तथ्य या राय हिमाचल वाचर के विचारों को नहीं दर्शाती है और हिमाचल वाचर इसके लिए कोई जिम्मेदारी या दायित्व नहीं लेता है।

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आजादी के अमृतमहोत्सव से गायब है पांगना (मंडी) के अनाम स्वतंत्रता सेनानी नरसिंह दत्त की कहानी 

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ऐसे ही एक शख्स थे पांगना गांव के नरसिंह दत्त (चिन्गु) और अन्य नेतृत्वकारी नरसिंह दत्त (भाऊ लिडर) के दोस्त थे। नरसिंह दत्त के छोटे बेटे ज्ञानचंद (45) ने बताया कि उनके पिता हमेशा राजा के खिलाफ विद्रोह में लगे रहते थे। उन्होंने प्रजा मंडल के आंदोलन के संबंध में बिलासपुर, सुंदरनगर, सिरमौर, रामपुर बुशहर आदि जगहों पर यात्राएं की थी। राजा ने एक बार उनको सुंदरनगर कैद में भी रखा था। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण खुद यशवंत सिंह परमार ने उनको नौकरी दी थी। वह व्यक्तिगत रूप से उनको जानते थे।

शिमला-भारत सरकार आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर पूरे देश में साल भर के लिए आजादी का अमृतमहोत्सव मना रही है। जगह-जगह लाखों रूपये खर्च कर के भव्य कार्यक्रम किये जा रहे हैं। लेकिन इन कार्यक्रमों के बीच स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों, उनके परिवारों और स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में नाम लिखवाने से रह गए अनाम सैनिकों की कोई पूछ-परख नहीं हो रही है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला की करसोग, पांगना, निहरी जैसी तहसील, उप तहसिलों में हजारों की संख्या में सुकेत राजा के खिलाफ लोगों ने 1948 में विद्रोह किया था। उस में भाग लेने वाले 4000 हजार के करीब लोगों का ब्योरा सरकार के पास नहीं है। अगर कोई शोधार्थी, परिजन, समाजसेवी खोज कर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम सूची में जुड़वाना चाहे तो इसकी भी जानकारी नहीं है।

सुकेत रियासत पर लंबे समय तक सामंती राजाओं का शासन था। लिखित इतिहास के तथ्यों को देखें तो 1862 से 1948 तक लगातार पांगणा, करसोग च्वासी, मण्डी हिमाचल की जनता ने राजाओं के जुल्मों के खिलाफ विद्रोह किया था। 1948 में हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री रहे यशवंत सिंह परमार के प्रत्यक्ष नेतृत्व में राजा लक्ष्मण सेन के खिलाफ विद्रोह किया गया था।

सुकेत इतिहास के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार जगदीश शर्मा बताते हैं कि पांगणा पर जब सत्याग्रहियों द्वारा कब्जा किया गया था तो यहां पर 4000 के करीब सत्याग्रहियों  ने 19 फरवरी 1948 से 22 फरवरी 1948 तक प्रातः तीन दिन तक पांगणा में डेरा जमाया था। इस दौरान भारी बारिश हो रही थी तथा अगले निर्देशों तक पागंणा में रुकने की सलाह गृह मंत्री से मिली थी। पांगणा वासियों ने, महिलाओं ने सभी सत्याग्रहियों के लिए पांगणा में रहने, खाने और सोने का प्रबंध किया था। इस इलाके के सैकड़ों लोग सत्याग्रहियों की सेवा में शामिल थे।

ऐसे ही एक शख्स थे पांगना गांव के नरसिंह दत्त (चिन्गु) और अन्य नेतृत्वकारी नरसिंह दत्त (भाऊ लिडर) के दोस्त थे। नरसिंह दत्त के छोटे बेटे ज्ञानचंद (45) ने बताया कि उनके पिता हमेशा राजा के खिलाफ विद्रोह में लगे रहते थे। वह घर पर भी कम ही रहते थे। उन्होंने प्रजा मंडल के आंदोलन के संबंध में बिलासपुर, सुंदरनगर, सिरमौर, रामपुर बुशहर आदि जगहों पर यात्राएं की थी। राजा ने एक बार उनको सुंदरनगर कैद में भी रखा था। बिलासपुर के उनके साथ आंदोलन में रहे लोगों से जब हम मिले तो उन्होंने भी इसकी तस्दीक की थी।

वर्तमान में नरसिंह दत्त के परिवार में उनकी बड़ी बेटी मीना (60), टेक चंद (50) और ज्ञान चंद (45) जीवीत हैं। उनका कहना है कि सरकार बहुत सारे कार्यक्रम आजादी के लिए करती है लेकिन उनके पिता जो लगातार आजादी के लिए लड़ते रहे उनका नाम तक स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की सूची में नहीं है।

ज्ञान चंद ने हमें हिमाचल सरकार द्वारा उनके पिता को जारी किया गया होमगार्ड का कार्ड दिखाया, जिसमें नरसिंह दत्त का जन्म 1927 लिखा हुआ है। उनके पिता का नाम कृष्ण दत्त था। बटालियन नंबर 956 में उनको 1965 में नौकरी दी गई थी। उनका कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण खुद यशवंत सिंह परमार ने उनको नौकरी दी थी। वह व्यक्तिगत रूप से उनको जानते थे।

नरसिंह दत्त उर्फ चिन्गु के सितम्बर 1947 में लिपटी राम सहित रियासत मण्डी से शिमला भागकर भूमिगत होने का वर्णन हिमाचल भाषा, कला संस्कृति अकादमी द्वारा प्रकाशित स्मृतियाँ नामक किताब के 49 पृष्ठ पर भी दर्ज है। लेकिन इसके बाद इस परिवार को पूर्व सरकार की तरफ से कोई सहायता नहीं दी गई है।

स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सैनिकों पर शोध कर रहे मनदीप कुमार का कहना है कि करसोग और पांगना में ऐसे लोग सैकड़ों की संख्या में हैं, जिनका नाम सूची में नहीं जुड़ पाया है। ऐसे लोगों पर खोज होनी चाहिए और स्थानीय प्रशासन को इसके लिए सहयोग देना चाहिए।

हिमाचल प्रदेश भाषा कला और संस्कृति विभाग को इस की तरफ विशेष जोर देना चाहिए। बहुत सारे लोगों ने सूची में अपने नाम नहीं लिखवाए हैं। इस के कारणों का विश्लेषण करते हुए जगदीश शर्मा कहते हैं कि उस समय लोग अनपढ़ थे। सरकार और पुलिस अगर किसी का नाम, कागज पत्र मांगती थी तो लोग इस बात से डरते थे कि कहीं किसी मामले में जेल न हो जाए। इस लिए बहुत सारे लोगों ने जो विद्रोह में थे अपने नाम सरकार के पास नहीं भेजे। अभी सरकार को ऐसे लोगों का संज्ञान लेना चाहिए और सुकेत विद्रोह की याद में प्रशासन को चाहिए कि वह पांगना, करसोग, सुंदरनगर, मण्डी आदि क्षेत्रों में सर्वेक्षण करवाए और ऐसे लोगों के परिवारों को सम्मानित करें।

लेखक: गगनदीप सिंह, एक लेखक, स्वतंत्र पत्रकार, शोधकर्ता, अनुवादक और डॉक्यूमेंटरी मेकर (Documentary maker)

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हिमाचल वाचर इस लेख से जुडी किसी भी जानकारी की सटीकता, पूर्णता, उपयुक्तता या वैधता के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। सभी जानकारी यथास्थिति के आधार पर प्रदान की जाती है। लेख में दी गई जानकारी, तथ्य या राय हिमाचल वाचर के विचारों को नहीं दर्शाती है और हिमाचल वाचर इसके लिए कोई जिम्मेदारी या दायित्व नहीं लेता है।

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अमेरिका की इस हिमाचली सभा मे मिली प्रदेश की संस्कृति की झलक

17 सितम्बर 2016 को अमेरिका के न्यू जर्सी मे इक हिमाचली सभा का आयोजन काँगड़ा ज़िले के श्रीमान विरेंद्र ठाकुर जी और उनकी धर्म पत्नी श्रीमती मिनाक्षि कटोच ने किया।

शिमला- “हिमाचल प्रदेश” एक ऐसा प्रदेश जिसका नाम लेते ही हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों, हरे भरे वनों का विस्मरण होनेलगता है। इस प्रदेश मे विभिन्न समुदायों का वास है। विभिन धर्मों के समुदाय के लोग, यहाँ प्रेम और सौहार्द के साथ वास करते हैं।

भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है और उसकी धर्म निरपेक्षता का एक उचतम उदाहरण हिमाचल प्रदेश है हिमाचल प्रदेश आज भौतिकता के युग मे इक्सवीं सदी के विकसित प्रदेशों मे अपनी एक अलग पहचान बना चुका है । आज देश माएँ ही नहीं अपितु विदेश मार ही हिमाचल अपनी प्रकाषठा स्थापित कर चुका है ।

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आज के इस भौतिक समय मे भी ये प्रदेश अपनी संस्कृति और रीति रिवाजों को संजोये हुए है। इस छोटे से प्रदेश मे भी संस्कृति और सामाजिक की विभिनता को देखा जा सकता है। जिसके अपने ही अस्तित्व की विस्मायतित प्रकाषठा है। इन विभिनताओं के बना भी इस प्रदेश के लोग प्रेम और सौहार्द के इक सूत्र मे बँधे हुए हैं।

दूर विदेश माएँ बेठे हुए हर स्वदेशी अपने देश की मिट्टी के लिए हर समय व्याकुल रहताहै क्यूँकि उस प्रेम और अपनेपन का स्पर्श अंतर आत्मा तक ना पहुँचे तब तक संतोष का अनुभव होना कठिन है। मुझे विदेश आए हुए एक साल हो चला था और मेरी अवस्था भी कुछ इसी प्रकारथी। प्रदेशी तो दूर में तो किस्सी स्वदेशी समुदाय के सम्पर्क मे आने के लिए व्याकुल थी। परंतु मेरी इस प्रतीक्षा का शीघ् ही अंत हुआ , और मुझे विदेश मे प्रदेश मिला ।

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17 सितम्बर 2016 को अमेरिका के न्यू जर्सी मे इक हिमाचली सभा का आयोजन हुआ। इस्स सभा का आयोजन हिमाचल मे काँगड़ा ज़िले के श्रीमान विरेंद्र ठाकुर जी और उनकी धर्म पत्नी श्रीमती मिनाक्षि कटोच ने किया। यहाँ हिमाचल के विभिन्न भागों से आए हुए कई महानुभावों से मिलने का और उन्हें जांने का मौक़ा मिला। मुझे विदेश मे अपना प्रदेश मिला।

हिमाचल की संस्कृति वी झलक मिली उसे कभी अपने घर मे मैंने कभी सराहा ही नहीं। यहाँ दूर विदेश मे उन्हें इसे संजोकर इक ही सूत्र मे पिरोकर रखने के प्रयास से मैं स्वयं बहुत प्रभावित हुई और अपने हिमाचाली होने पर गर्व भी हुआ। दूर विदेश मार अपने प्रदेश का होना अपने आप मे ही एक गौरव पूर्ण बात है।

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राेहडू-ठियाेग-हाटकाेटी सड़क नाेबल पुरस्कार जीतने लायक, मुख्यमंत्री विकास के मसीहा

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इस लिए बस यही कहते आए हैं आैर कहते रहेगें कि “राजा साहब सब ठीक है ! आप विकास के मसीहा है आैर राेहडू में विकास के जाे आयाम स्थापित हुए हैं उससे राेहडू की जनता गद गद है

शिमला- सच में राेहडू व जुबबल काेटखाई वाले सहनशीलता की मिसाल हैं। सहनशीलता की कैटेगिरी में अगर काेई नाेबल पुरस्कार मिलता है उसके सही हक़दार हम है। राेहडू वालाें काे लायलटी का नाेबल पुरस्कार अलग से मिलना चाहिए। देखिए न आठ सालाें से राेहडू ठियाेग हाटकाेटी सड़क की दूरदशा झेल रहे हैं उफ़ तक नहीं करते। बेचारे राजनीति के गलियारे में चहलक़दमी करने वाले नेता है बस जिनका दिल हमारी मासूमियत पर पसीज जाता है।

ये भी पढ़ें:क्यों हिमाचल सेब उत्पादकों वास्तव में राेहडू हाटकाेटी मार्ग से परेशान हैं- देखिये तस्वीरों में

भाजपा की सरकार हाे ताे कांग्रेस से हमारा हाल नहीं देखा जाता कांग्रेस की सरकार हाे ताे भाजपा का कलेजा फट जाता है पर हम कुछ नहीं बाेलेगें अरे भई हम सब जानते हैं इसमें हमारा क्या राेल है। वर्ल्ड बैंक का पराेजैकट है टेंडर लग चुका है कंपनी काे काँप साैंपा गया है इसमें ताे सरकार भी कुछ नहीं कर सकती । सहनशीलता आैर उस पर ये समझदारी क्या बात है जी ताे फिर नाेबल पुरस्कार ताे बनता ही है न। रही बात राेहडू वालाें की हम ताे लायलटी की वह मिसाल है कि दुनियाँ में नहीं मिलेगी। टूरिज़म के नाम पर हमें बाबा जी का ठूललू मिला, राेहडू शिमला सडक की दूरदशा मिली, पार्किंग है नहीं, शाैचलय उपलब्ध नहीं, अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं पर हम लायल है पहले मुख्यमंत्री देते रहे अब वाे जिसे कहें उसे जीताते रहेंगे। ये लायलटी की बेमिसाल मिसाल हुई की नहीं।

ऐसा नहीं है कि हमारे पास कुशल नेतृत्व या नेता नहीं है ! बहुत है! भाजपा में भी है आैर कांग्रेस में भी है। गिनना है ताे पीडब्ल्यूडी व आईपीएच के कांट्रेक्टराें की सूचि ले लिजिए। नेतृत्व की ऐसी क्षमता है इन सभी नेताआें में कि अपने टैंडराें के अलावा हर विकास कार्य के बारे में बहुत दूरदर्शी हैं ये। ये जाे सडक बन रही है या यूँ कहिए कि बन ही नहीं रही इन नेताआें काे दे दी जाती ताे बहुत सालाें पहले बन गई हाेती। चांशल पर एशिया का सबसे बढ़ा सकी सलाेप विकसित हाे गया हाेता!

चंदरनाहन, मुरालडंडा, गिरी गंगा में अब तक पर्यटन स्थल विकसित हाे गए हाेते बस अगर यह सब ठेकेदारी प्रथा से हाेता। ख़ैर जाे है साे है कैसे कह दें कि हम खुश नहीं हैं। आख़िर लायलटी भी काेई चीज़ है। इस लिए बस यही कहते आए हैं आैर कहते रहेगें कि “राजा साहब सब ठीक है ! आप विकास के मसीहा है आैर राेहडू में विकास के जाे आयाम स्थापित हुए हैं उससे राेहडू की जनता गद गद है
Shimla Roads

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