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एचपीयू का नया कारनामा: रिजल्ट में छात्रों को मिले 500 में से 552 नंबर, 100 में से 180
विवि की इस तरह की लापरवाही छठे सेमेस्टर के छात्रों पर भारी पड़ गई है। अंतिम सेमेस्टर होने के कारण छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। इस कारण वह न तो कई जॉब के लिए अप्लाई कर पाएंगे और न ही अन्य तरह की सुविधाएं ले पाएंगे।
शिमला- हिमाचल प्रदेश विशविद्यालय ने एक बार फिर से छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया है। इस बार जो डीएमसी छात्रों को उनकी कड़ी मेहनत के बाद मिलती है, उसमें ही गड़बड़ कर दी। ऐसे में छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। विवि की ओर से एमसीए की छठे सेमेस्टर जो डिटेल मार्कशीट (डीएमसी) दी है, उसमें कुल अंक 500 दिए गए है जबकि यह 600 नंबर का होता है।
अधर में छात्रों का भविष्य
बता दें कि डीएमसी छात्रों को दी गई है, उसमें 600 की जगह 500 कुल अंक बताए गए है। हैरानी बात यह है कि छात्रों को 500 कुल अंक देने के बाद भी उसके जो प्राप्तांक बताए गए है वह 545 दिए हैं। एेसे में सोचने वाली बात यह है कि कैसे एक छात्र के कुल अंक से अधिक अंक हो सकते है। विवि की इस तरह की लापरवाही छठे सेमेस्टर के छात्रों पर भारी पड़ गई है। अंतिम सेमेस्टर होने के कारण छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। इस कारण वह न तो कई जॉब के लिए अप्लाई कर पाएंगे और न ही अन्य तरह की सुविधाएं ले पाएंगे।
पांच तरह के होते हैं प्रेजेंटेशन
छठे सेमेस्टर की परीक्षा 600 नंबर की होती है। इसमें लिखित परीक्षा नहीं होती है। जबकि सिर्फ प्रेजेंटेशन होती है। एमसीए छठे सेमेस्टर में पांच तरह के प्रेजेंटेशन होते हैं। जिसमें सिस्टम डिजाइन, लांग बुक, सेमिनार, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, वाइवा वायस होते हैं। प्रोजेक्ट रिपोर्ट 200 नंबर की होती है, जबकि जो डीएमसी छात्रों को दी गई है, उसमें 100 नंबर ही दर्शाए गए है। जबकि छात्रों ने जो अंक प्राप्त किए है, वह 100 में से 180 व 178 दिए गए हैं। इस तरह की लापरवाही कैसे हुई, इस बारे में विवि प्रशासन भी हैरान है।
सुधार के बारे में कोई नहीं दे रहा जानकारी
छठे सेमेस्टर की परीक्षा में कुल 500 नंबर दिए गए। जबकि उसके प्राप्तांक 552 दिए गए। कुल अंकों से ज्यादा प्राप्त किए गए नंबर दिए। लगभग आधे से ज्यादा छात्रों की जो डीएमसी दिए गए है, वह इसमें कुल अंक इसी तरह से दिए गए हैं। छात्रा का कहना है कि उसको जो अंक दिए गए है, वह 545 है। जबकि कुल अंक 500 दिए गए हैं। यह 600 में से होने चाहिए थे। जबकि विवि की लापरवाही के कारण इस डीएमसी में गलत अंक छाप दिए गए। इस कारण अब इसमें कैसे सुधार होगा, इस बारे में कोई भी बताने को तैयार नहीं है।
उठ रहे हैं ऐसे सवाल
डीएमसी को कंप्यूटराइज्ड बनाया गया है। मैन्युअल बनाने पर गलती हो सकती है, जबकि कंप्यूटर पर कैसे गलती हो सकती है।
एक स्टूडेंट की डीएमसी में गलती मानी जा सकती है, लेकिन अधिकतर छात्रों की डीएमसी में कैसे गलती कर दी गई।
जब एग्जामिनर की ओर से अंक तालिका भेजी गई, कंप्यूटर पर बनाने से पहले इसे क्यों चेक नहीं किया गया।
परीक्षा शाखा के अधिकारियों को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, आखिर किस तरह की चेकिंग यहां होती है।
पहले भी हो चुकी है लापरवाही
विवि प्रशासन की ओर से लापरवाही का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई तरह की लापरवाही सामने आई है। रूसा में कई विषय ऐसे थे जिसकी छात्रों ने परीक्षा ही नहीं दी थी, लेकिन उनमें उन्हें पास किया गया था। इसी तरह मार्कशीट पर छात्राें के पिता की जगह माता का नाम लिखने के भी मामले सामने आ चुके हैं।
इनका क्या है कहना
एचपीयू के परीक्षा नियंत्रक डॉ. जेएस नेगी ने कहा है कि मुझे अभी तक इसकी कोई जानकारी नहीं है। छठे सेमेस्टर की डीएमसी में इस तरह कैसे लापरवाही हो सकती है, इसकी जांच की जा सकती है। अभी मुझे इसकी सूचना नहीं मिली है, शिकायत आती है तो कार्रवाई भी होगी, छात्रों की डीएमसी भी ठीक करवाई जाएगी।
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हिमाचल की तीन ग्राम पंचायतों में 435 एकड़ भूमि पर लगे 76,000 से अधिक सेब के पौधे
शिमला- डॉ यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के विस्तार शिक्षा निदेशालय में पहाड़ी कृषि एवं ग्रामीण विकास एजेंसी(हार्प), शिमला द्वारा एक अनुभव-साझाकरण कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इस कार्यशाला में जिला किन्नौर के निचार विकास खंड के रूपी, छोटा कम्बा और नाथपा ग्राम पंचायतों के 34 किसानों ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर जीएम नाबार्ड डॉ. सुधांशु मिश्रा मुख्य अतिथि रहे जबकि नौणी विवि के अनुसंधान निदेशक डॉ रविंदर शर्मा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत की।
संस्था के अध्यक्ष डॉ. आर एस रतन ने कहा कि यह कार्यक्रम एकीकृत आदिवासी विकास परियोजना के तहत रूपी, छोटा कम्बा और नाथपा ग्राम पंचायतों में वर्ष 2014 से आयोजित किया जा रहा है। परियोजना को नाबार्ड द्वारा वित्त पोषित किया गया है और इसे हार्प द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
उन्होंने यह बताया कि यह एक बागवानी आधारित आजीविका कार्यक्रम है जिसे किसानों की भागीदारी से लागू किया गया है। इन तीन ग्राम पंचायतों में 435 एकड़ भूमि पर 76,000 से अधिक सेब के पौधे लगाए गए हैं और 607 परिवार लाभान्वित हुए हैं।
डॉ. सुधांशु मिश्रा ने यह भी कहा कि नाबार्ड हमेशा सामाजिक-आर्थिक उत्थान कार्यक्रमों के संचालन में आगे रहा है। उन्होंने इस कार्यशाला में भाग लेने वाले किसानों से अपने सहयोग से विभिन्न कार्यक्रमों को सफल बनाने का आग्रह किया।
अनुसंधान निदेशक डॉ. रविंदर शर्मा और विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. दिवेंद्र गुप्ता ने नाबार्ड और हार्प के प्रयासों की सराहना की और किसानों को आश्वासन दिया कि विश्वविद्यालय किसानों को तकनीकी रूप से समर्थन देने के लिए हमेशा तैयार है।
डॉ. नरेद्र कुमार ठाकुर ने कहा कि हार्प ने कृषक समुदाय के समन्वय से दुर्गम क्षेत्रों में कठिन परिस्थितियों में काम किया है। इस अवसर पर एक किसान-वैज्ञानिक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें भाग लेने वाले किसानों के तकनीकी प्रश्नों को संबोधित किया गया।
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हिमाचल सरकार पुलिसकर्मियों का कर रही है शोषण
पुलिसकर्मियों की डयूटी बेहद सख्त है,कई-कई बार तो चौबीसों घण्टे वर्दी व जूता उनके शरीर में बंधा रहता है।थानों में खाने की व्यवस्था तीन के बजाए दो टाइम ही है,राजधानी शिमला के कुछ थानों के पास अपनी खुद की गाड़ी तक नहीं है,हैड कॉन्स्टेबल से एएसआई बनने के लिए सत्रह से बीस वर्ष भी लग जाते हैं।
शिमला सीटू राज्य कमेटी ने प्रदेश सरकार पर कर्मचारी विरोधी होने का आरोप लगाया है। कमेटी ने यह कहा है कि वह हिमाचल प्रदेश के पुलिसकर्मियों की मांगों का पूर्ण समर्थन करती है। आरोप लगाते हुए सीटू ने कहा है कि प्रदेश सरकार पुलिसकर्मियों का शोषण कर रही है।
राज्य कमेटी ने प्रदेश सरकार से यह मांग की है कि वर्ष 2013 के बाद नियुक्त पुलिसकर्मियों को पहले की भांति 5910 रुपये के बजाए 10300 रुपये संशोधित वेतन लागू किया जाए व उनकी अन्य सभी मांगों को बिना किसी विलंब के पूरा किया जाए।
सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा व महासचिव प्रेम गौतम ने प्रदेश सरकार पर कर्मचारी विरोधी होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जेसीसी बैठक में भी कर्मचारियों की प्रमुख मांगों को अनदेखा किया गया है। उन्होंने कहा कि जेसीसी बैठक में पुलिसकर्मियों की मांगों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।
सीटू कमेटी ने कहा कि सबसे मुश्किल डयूटी करने वाले व चौबीस घण्टे डयूटी में कार्यरत पुलिसकर्मियों को इस बैठक से मायूसी ही हाथ लगी है। इसी से आक्रोशित होकर पुलिसकर्मी मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे। उनके द्वारा पिछले कुछ दिनों से मैस के खाने के बॉयकॉट से उनकी पीड़ा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पुलिस कर्मियों के साथ ही सभी सरकारी कर्मचारी नवउदारवादी नीतियों की मार से अछूते नहीं है। कमेटी ने कहा कि पुलिसकर्मियों की डयूटी बेहद सख्त है। कई-कई बार तो चौबीसों घण्टे वर्दी व जूता उनके शरीर में बंधा रहता है।
कमेटी ने यह भी कहा है कि थानों में स्टेशनरी के लिए बेहद कम पैसा है व आईओ को केस की पूरी फ़ाइल का सैंकड़ों रुपये का खर्चा अपनी ही जेब से करना पड़ता है। थानों में खाने की व्यवस्था तीन के बजाए दो टाइम ही है। मैस मनी केवल दो सौ दस रुपये महीना है जबकि मैस में पूरा महीना खाना खाने का खर्चा दो हज़ार रुपये से ज़्यादा आता है। यह प्रति डाइट केवल साढ़े तीन रुपये बनता है, जोकि पुलिस जवानों के साथ घोर मज़ाक है। यह स्थिति मिड डे मील के लिए आबंटित राशि से भी कम है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के जमाने के बने बहुत सारे थानों की स्थिति खंडहर की तरह प्रतीत होती है जहां पर कार्यालयों को टाइलें लगाकर तो चमका दिया गया है परन्तु कस्टडी कक्षों,बाथरूमों,बैरकों,स्टोरों,मेस की स्थिति बहुत बुरी है। इन वजहों से भी पुलिस जवान भारी मानसिक तनाव में रहते हैं।
सीटू ने कहा कि पुलिस में स्टाफ कि बहुत कमी है या यूं कह लें कि बेहद कम है व कुल अनुमानित नियुक्तियों की तुलना में आधे जवान ही भर्ती किये गए हैं जबकि प्रदेश की जनसंख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी है यहाँ तक पुलिस के पास रिलीवर भी नहीं है।
आरोप लगाते हुए कमेटी ने कहा कि प्रदेश की राजधानी शिमला के कुछ थानों के पास अपनी खुद की गाड़ी तक नहीं है। वहीं पुलिस कर्मी निरन्तर ओवरटाइम डयूटी करते हैं। इसकी एवज में उन्हें केवल एक महीना ज़्यादा वेतन दिया जाता है। इस से प्रत्येक पुलिसकर्मी को वर्तमान वेतन की तुलना में दस से बारह हज़ार रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। उन्हें लगभग नब्बे साप्ताहिक अवकाश,सेकंड सैटरडे,राष्ट्रीय व त्योहार व अन्य छुट्टियों के मुकाबले में केवल पन्द्रह स्पेशल लीव दी जाती है।
सीटू कमेटी ने यह भी कहा कि वर्ष 2007 में हिमाचल प्रदेश में बने पुलिस एक्ट के पन्द्रह साल बीतने पर भी नियम नहीं बन पाए हैं। इस एक्ट के अनुसार पुलिसकर्मियों को सुविधा तो दी नहीं जाती है परन्तु कर्मियों को दंडित करने के लिए इसके प्रावधान बगैर नियमों के भी लागू किये जा रहे हैं जिसमें एक दिन डयूटी से अनुपस्थित रहने पर तीन दिन का वेतन काटना भी शामिल है। पुलिसकर्मियों की प्रोमोशन में भी कई विसंगतियां हैं व इसका टाइम पीरियड भी बहुत लंबा है। हैड कॉन्स्टेबल से एएसआई बनने के लिए सत्रह से बीस वर्ष भी लग जाते हैं।
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किन्नौर में लापता पर्यटकों में से 2 और के शव बरामद, 2 की तालाश जारी,आभी तक कुल 7 शव बरामद
शिमला रिकोंगपिओ में 14 अक्तुबर को उत्तरकाशी के हर्षिल से छितकुल की ट्रैकिंग पर निकले 11 पर्यटकों में से लापता चार पर्वतारोहीयों में से दो पर्वतारोहियों के शवो को आई.टी.बी.पी व पुलिस दल द्वारा पिछले कल सांगला लाया गया था जहां सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सांगला में दोनों शवों का पोस्टमार्टम किया गया।
यह जानकारी देते हुए उपायुक्त किन्नौर अपूर्व देवगन ने बताया कि इन दोनों की पहचान कर ली गई है जिनमे मे एक उतरकाशी व दूसरा पश्चिम बंगाल से सम्बंधित था।
उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन किन्नौर द्वारा आज एक शव वाहन द्वारा उतरकाशी को भेज दिया गया है जहाँ शव को जिला प्रशासन उतरकाशी को सौंपा जाएगा। जब कि दूसरा शव वाहन द्वारा शिमला भेजा गया है जिसे शिमला में मृतक के परिजनों को सौंपा जायेगा।
उपायुक्त अपूर्व देवगन ने बताया कि अभी भी लापता दो पर्यटकों की तलाश आई.टी.बी.पी के जवानों द्वारा जारी है। उल्लेखनीय है कि गत दिनों उतरकाशी से छितकुल के लिये 11 पर्वतारोही ट्रेकिंग पर निकले थे जो बर्फबारी के कारण लमखंगा दर्रे में फंस गये थे जिसकी सूचना मिलने पर जिला प्रशासन द्वारा सेना के हेलीकॉप्टर व आई.टी.बी.पी के जवानों की सहायता से राहत व बचाव कार्य आरम्भ किया था। सेना व आई.टी.बी.पी के जवानों ने 21 अक्टूबर को दो पर्यटकों को सुरक्षित ढूंढ निकाला था। इसी दौरान उन्हें अलग अलग स्थानों पर पाँच ट्रेकरों के शव ढूंढ निकलने में सफलता मिली थी। जबकि 4 पर्यटक लापता थे जिसमे से राहत व बचाव दल को 22 अक्तुबर को 2 शव ढूढ़ निकालने में सफलता मिली थी। अभी भी दो पर्यटक लापता हैं जिनकी राहत व बचाव दल द्वारा तलाश जारी है।
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