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	<title>Global Warming Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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	<description>एक सामाजिक जागृति</description>
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	<title>Global Warming Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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	<item>
		<title>वैज्ञानिकों का खुलासा- हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से चढ़ रहा हिमाचल के पहाड़ों  का तापमान</title>
		<link>https://hindi.himachalwatcher.com/2016/07/16/himachals-hydro-power-projects-causing-rise-in-temperature/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[हिमाचल वॉचर]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Jul 2016 10:33:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य खबरे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं,अध्ययन के अनुसार लारजी और पंडोह डैम के निर्माण के बाद कुल्लू-मनाली के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। शिमला- हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं। हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों के वाटर रेजरवायरों से उत्सर्जित मिथेन गैस से ठंडे पहाड़ों का [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं,अध्ययन के अनुसार लारजी और पंडोह डैम के निर्माण के बाद कुल्लू-मनाली के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है।</strong></p>
<p><strong>शिमला- </strong> हाइड्रो प्रोजेक्टों के अंधाधुंध निर्माण से भी पहाड़ तपने लगे हैं। हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों के वाटर रेजरवायरों से उत्सर्जित मिथेन गैस से ठंडे पहाड़ों का पारा चढ़ रहा है। डैमों से निकलने वाली सीएच-4 मिथेन गैस आबोहवा को गर्म कर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा दे रही है।<br />
ठंड के चलते प्रदेश के जिन इलाकों में साल भर ऊन के कपड़े पहनने पड़ते थे, वहां अब गर्मियों में पंखे और कूलर चल रहे हैं। हिमाचल के कई इलाकों में पन बिजली परियोजनाओं के विशाल डैमों के निर्माण से मई- जून में तापमान 33 से 41 डिग्री तक चढ़ रहा है।</p>
<p>इनके बनने से पहले यहां तापमान 20 और 24 डिग्री के बीच रहता था। जीबी पंत नेशनल पर्यावरण अनुसंधान केंद्र मौहल के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।</p>
<p><strong>वैज्ञानिकों के अध्ययन में हुआ खुलासा</strong></p>
<p>संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक जेसी कुनियाल की अगुवाई में हुए इस अध्ययन के अनुसार लारजी और पंडोह डैम के निर्माण के बाद कुल्लू-मनाली के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है।</p>
<p>इसरो की मदद से मनाली के कोठी में स्थापित ऑब्जर्वेटरी के आंकड़े बताते हैं कि इसका असर ग्लेशियरों पर भी दिखने लगा है। पहले जहां मनाली क्षेत्र के लोग साल भर ऊनी कोट पहने रखते थे।</p>
<p>अब इस क्षेत्र में लोगों को घरों में पंखे लगाने पड़ रहे हैं। इसी तरह गोबिंद सागर डैम के निर्माण से पहले बिलासपुर और पौंग डैम बनने से पहले कांगड़ा में भी इतनी गर्मी नहीं पड़ती थी।</p>
<p><strong>सेब की फसल पर भी असर</strong></p>
<p>बागवानी उपनिदेशक रोशन लाल का कहना है कि कुछ अरसा पहले तक कुल्लू के बजौरा में सेब की फसल होती थी, लेकिन तापमान में एकाएक बढ़ोतरी से अब सेब की बेल्ट बजौरा के बजाय रायसन तक खिसक गई है।</p>
<p>कुल्लू फल उत्पादक मंडल के अध्यक्ष महेंद्र उपाध्याय का कहना है कि पहले तापमान कम रहने से पूरा साल पहाड़ों पर बर्फ रहती थी। इससे फसल भी बेहतर रहती थी। सेब की सेल्फ लाइफ ज्यादा थी।</p>
<p>पंखे- कूलर यहां के लिए अनजानी चीजें थीं। लेकिन गर्मी बढ़ने से फसल को तुड़ान के एकदम बाद मार्केट में लाना पड़ता है ताकि यह खराब न हो जाए।</p>
<p><strong>लेह-लद्दाख की ओर मुड़ रहे सैलानी</strong></p>
<p>हिमालय के जानकार और इतिहासकार छेरिंग दोरजे का कहना है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले कर्नल जॉनसन, रैनिक, मिनिकन एवं थॉमस जैसे अंग्रेज अफसरों ने कुल्लू व मनाली का मौसम इंग्लैंड की तरह होने के चलते यहां बसने का इरादा बनाया था।</p>
<p>लेकिन, अब अंग्रेज सैलानी भी गर्मियों के मौसम में यहां ठहरने की बजाए लेह-लद्दाख का रुख करने लगे हैं।</p>
<p>Photo: WikiMedia/Representational image</p>
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		<title>तेज़ी से पिघल रहे ग्लेशियर, हिमाचल की अधिकतर नदियां खतरे में, कुछ दशकों में 50% ग्लेशियर पिघलने की आशंका</title>
		<link>https://hindi.himachalwatcher.com/2016/04/25/isro-report-on-melting-of-himalayan-glaciers/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[हिमाचल वॉचर]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Apr 2016 12:06:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हिमाचल की सतलुज, रावी, पार्वती और ब्यास नदियों के हिम स्रोत पिछले 25 वर्षों में 450 वर्गमीटर तक सिकुड़ चुके हैं,रेडिएशन से बीमारियां फैलने का खतरा, अगले पचास वर्षों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका है,ग्लेशियर पिघलने से एशिया के इंडो-गंगेटिक एरिया में रह रही विश्व की 40 फीसदी आबादी पर अनाज और [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हिमाचल की सतलुज, रावी, पार्वती और ब्यास नदियों के हिम स्रोत पिछले 25 वर्षों में 450 वर्गमीटर तक सिकुड़ चुके हैं,रेडिएशन से बीमारियां फैलने का खतरा, अगले पचास वर्षों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका है,ग्लेशियर पिघलने से एशिया के इंडो-गंगेटिक एरिया में रह रही विश्व की 40 फीसदी आबादी पर अनाज और पेयजल का संकट गहराएगा</strong></p>
<p><strong>शिमला-</strong>  ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालय से निकलने वाली नदियों के हिम स्रोत चिंताजनक रफ्तार से सिकुड़ रहे हैं। हिमाचल की सतलुज, रावी, पार्वती और ब्यास नदियों के हिम स्रोत पिछले 25 वर्षों में 450 वर्गमीटर तक सिकुड़ चुके हैं। इन नदियों को सदानीरा करने वाले ग्लेशियर 21 से 28 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघल रहे हैं।</p>
<p>पार्वती नदी के ग्लेशियर सबसे अधिक तेज रफ्तार से पिघल रहे हैं। इसका खुलासा इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) की अध्ययन रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर पिछले 25 वर्षों में 850 मीटर सिकुड़ा है।</p>
<p>इसरो के वैज्ञानिक डॉ. अनिल वी. कुलकर्णी के नेतृत्व में हुई स्पॉट स्टडी और सेटेलाइट इमेजरी में यह तथ्य सामने आए हैं कि बड़ा शिकरी, छोटा शिकरी, म्याड़, मुर्खिला, पार्वती और दूधन जैसे ग्लेशियर हर वर्ष 21 से 28 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघल रहे हैं।</p>
<p><strong>किस नदी में कितने छोटे-बडे़ ग्लेशियर</p>
<p>नदी   ग्लेशियर<br />
रावी&#8212;172<br />
चंद्रभागा&#8212;1278<br />
ब्यास&#8212;277<br />
सतलुज&#8212;926<br />
(पार्वती ब्यास की सहायक नदी है)</strong></p>
<p><strong>ग्लेशियर पिघलने से यहां बन रही झील, ला सकती है तबाही</strong></p>
<p>हिमाचल की अधिकतर नदियां इन्हीं ग्लेशियरों से निकलती हैं। रिपोर्ट में आगाह किया है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देने वाली ग्रीन हाउस गैसों एवं कार्बन के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो अगले पचास वर्षों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका है।</p>
<p><strong>गोपांग घाटी में बनी बड़ी झील, मनाली-लेह मार्ग को खतरा</strong></p>
<p>डॉ. अनिल वी. कुलकर्णी के अनुसार लाहौल में ग्लेशियरों के पिघलने से गेपांग घाटी में बड़ी झील बन गई है। इससे सिस्सू गांव तथा मनाली-लेह मार्ग को खतरा बन गया है। इन झीलों का आकार बढ़ता रहा तो ये भारत-पाक के लिए वाटर बम बनकर भारी तबाही ला सकती हैं।</p>
<p>हिमालयन पर्यावरण अनुसंधान केंद्र मौहल के वैज्ञानिक जेसी कुनियाल ने बताया कि इसरो के अध्ययन में उक्त चिंताएं सामने आई थीं। नासा की ओर से सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों से यह बात पुख्ता हो गई है।</p>
<p><strong>ग्लेशियर पिघलने से गहराएगा पेयजल संकट</strong></p>
<p>ग्लेशियर पिघलने से एशिया के इंडो-गंगेटिक एरिया में रह रही विश्व की 40 फीसदी आबादी पर अनाज और पेयजल का संकट गहराएगा। वन, हरित क्षेत्र और वन्य प्राणियों पर संकट के साथ पारिस्थितिक और पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा जाएगा। सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी इसका असर पड़ेगा।</p>
<p><strong>रेडिएशन से बीमारियां फैलने का खतरा</strong></p>
<p>इसरो की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियरों के बर्फ के रूप में रेडिएशन को नियंत्रित न करने से बीमारियां फैलने भी संभावना बनी हुई है। ग्लेश्यिर रेडिएशन को कंट्रोल कर रहे हैं।</p>
<p>इसरो की रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। पहले तो हमें इससे होने वाले खतरे से बचना होगा। वहीं ये भी सोचना होगा कि ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार को कैसे कम किया जाएगा। पर्यावरण प्रदूषण को कैसे रोका जाए। इसमें आम लोगों और पर्यटकों का सहयोग जरूरी है।</p>
<p> रवि ठाकुर, विधायक, लाहौल स्पीति</p>
<p>Photo: Wiki Media</p>
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		<item>
		<title>हिमाचल पर तबाही के संकेत, 4 तीव्रता वाले भूकंप के 5 झटकों से लोग दहशत में</title>
		<link>https://hindi.himachalwatcher.com/2016/02/11/earhquake-in-himachal-pradesh/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[तरुण शर्मा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2016 12:39:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य खबरे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शिमला&#8211;  हिमाचल के पहाड़ों से प्रकृति के खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। हफ्ते के भीतर बुधवार को चंबा की धरती तीसरी बार हिल गई। बुधवार को 4 तीव्रता वाले भूकंप के झटकों से हैरान लोग किसी अनहोनी को लेकर दहशत में हैं। हफ्ते के भीतर बुधवार को चंबा की धरती तीसरी बार थर्राई। 4 तीव्रता [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिमला</strong>&#8211;  हिमाचल के पहाड़ों से प्रकृति के खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। हफ्ते के भीतर बुधवार को चंबा की धरती तीसरी बार हिल गई। बुधवार को 4 तीव्रता वाले भूकंप के झटकों से हैरान लोग किसी अनहोनी को लेकर दहशत में हैं। हफ्ते के भीतर बुधवार को चंबा की धरती तीसरी बार थर्राई।</p>
<p>4 तीव्रता वाले भूकंप के पांच झटकों से लोग दहशत में हैं। एक घर को आंशिक नुकसान भी हुआ है। पहला झटका सुबह 11:14, दूसरा 11:24, तीसरा 11:29, चौथा 11:31 और पांचवां 12:03 बजे महसूस किया गया। सिलसिले वार झटकों से भयभीत होकर लोग घरों से बाहर निकल आए।</p>
<p>कई घंटे ये लोग घरों से बाहर ही रहे। इससे पहले 4 फरवरी को तीन, 9 फरवरी को रात करीब नौ बजे 4.4 तीव्रता वाले भूकंप के झटके महसूस किए गए थे। बीते मंगलवार रात 8:43 बजे लाहौल में भी 4.4 तीव्रता का भूकंप आया है। हिमाचल के पहाड़ों से प्रकृति के खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। हफ्ते के भीतर बुधवार को चंबा की धरती तीसरी बार हिल गई।</p>
<h2>बदल रहा पहाड़ों पर बर्फबारी का ट्रेंड</h2>
<p>वहीं, पहाड़ों पर बर्फबारी का ट्रेंड बदल रहा है। नई सदी में अब दिसंबर के बजाय फरवरी-मार्च माह में ज्यादा बर्फबारी हो रही है। बर्फबारी के दस साल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। साल 2000 से 2015 तक दिसंबर महीने में सिर्फ 13 दिन बर्फ गिरी।</p>
<p>वहीं, इस दौरान फरवरी में 44 दिन और मार्च में 15 दिन बर्फ गिरी। वैज्ञानिक इसे खतरनाक संकेत मान रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग के असर ने पहाड़ों पर बर्फबारी का ट्रेंड बदल दिया है। अब नवंबर-दिसंबर के मुकाबले फरवरी-मार्च में ज्यादा बर्फबारी हो रही है।</p>
<p>शिमला शहर में बर्फबारी के दस साल के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। हिमाचल में बीते दस साल से बर्फबारी भी कम हो रही है। नब्बे के दशक में जहां औसतन हर साल 130 से 262 सेंटीमीटर बर्फ रिकॉर्ड की गई।</p>
<p>वहीं वर्ष 2000 के बाद कभी साल में 120 सेंटीमीटर से अधिक बर्फ नहीं गिरी। साल 2001 में 186, 2006-07 में 120, 2007-08 में 34, 2008-09 में 43, 2010-11 में 31.5 और 2014-15 में 83 सेंटीमीटर बर्फबारी हुई। 2011-12 में 119 सेंटीमीटर बर्फ गिरी थी।</p>
<h2शिमला में नवंबर में 20 साल से नहीं गिरी बर्फ </h2>
<p>पहाड़ों पर बर्फबारी के बदलते ट्रेंड के लिए मौसम विशेषज्ञ अधिकतम तापमान में हो रही वृद्धि को जिम्मेदार मानते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अंधाधुंध भवन निर्माण, बढ़ता प्रदूषण और पेड़ कटान इसके लिए जिम्मेदार हैं। इसी कारण बर्फबारी के ट्रेंड में बदलाव आ रहा है।</p>
<p>साल 2015 में लाहौल स्पीति और किन्नौर जिला की ऊंची चोटियों में तो अप्रैल और मई महीने में भी बर्फबारी हुई थी। राजधानी शिमला में साल 2005 के नवंबर, दिसंबर और साल 2006 के जनवरी, फरवरी और मार्च महीने में बर्फबारी नहीं हुई थी। साल 2009-10 में नाममात्र 1.8 सेंटीमीटर पूरे सीजन में बर्फबारी रिकॉर्ड की गई।</p>
<p>शिमला में साल 1995 में नवंबर महीने के दौरान बर्र्फ गिरी थी। उस समय 7.8 सेंटीमीटर बर्फ रिकॉर्ड की गई। इसके बाद अभी तक नवंबर में बर्फबारी नहीं हुई है। मौसम विभाग के निदेशक डॉ मनमोहन सिंह की मानें तो ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहाड़ों में बर्फबारी का ट्रेंड बदल रहा है।</p>
<p>बीते कुछ सालों से फरवरी और मार्च में बर्फबारी हो रही है। दिसंबर की जगह जनवरी में अधिक बर्फबारी हो रही है। अधिकतम और न्यूनतम तापमान बढ़ने से ऐसा हो रहा है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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