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	<title>हिमाचल मनोरोगी अस्पताल Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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	<description>एक सामाजिक जागृति</description>
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		<title>हिमाचल में बेसहारा भटकते मनोरोगियों के लिए इन्साफ की लड़ाई में प्रशासन और पुलिस कर रही हाई कोर्ट के आदेशों की अवमानना</title>
		<link>https://hindi.himachalwatcher.com/2017/02/18/mental-health-activist-of-himachal-pradesh-subhash-kumar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[तरुण शर्मा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Feb 2017 11:56:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[एच डब्ल्यू कम्युनिटी]]></category>
		<category><![CDATA[न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान]]></category>
		<category><![CDATA[मानसिक पीड़ित]]></category>
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		<category><![CDATA[मुख्य सचिव वीसी फारका]]></category>
		<category><![CDATA[हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शिमला- भारत अभी भी नागरिकों को सही मायने में साक्षर बनाने में बहुत पिछड़ा हुआ है! सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है! सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ना और लिखना तो सीख जाते हैं पर सही मायने में साक्षर नागरिक नहीं बना पाते! कान्वेंट और निजी स्कूल बच्चों को करियर ओरिएंटेड ( Career Oriented) [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिमला-</strong> भारत अभी भी नागरिकों को सही मायने में साक्षर बनाने में बहुत पिछड़ा हुआ है! सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है! सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ना और लिखना तो सीख जाते हैं पर सही मायने में साक्षर नागरिक नहीं बना पाते! कान्वेंट और निजी स्कूल बच्चों को करियर ओरिएंटेड ( Career Oriented) ही बना पाते हैँ! पर इन स्कूलों की भरी-भरकम फीस भी आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही हैँ! गैर सरकारी संस्थाओ और कुछ सामाजिक कार्यकर्तों को छोड़ कर आम आदमी का रूझान सामाजिक कार्यों की ओर बहुत कम देखने को मिलता है! एक नागरिक का सही अर्थों में साक्षर होना समाज के लिए वरदान साबित हो सकता है! और शिमला के रहने वाले एक संवेदनशील नागरिक, सुभाष कुमार (43), इसी बात का प्रमाण हैँ!</p>
<p>हाल ही में शिमला की एक गैर सरकारी संस्था ने हिमाचल की सड़कों पर घूमते, बेघर, और बेसहारा मानसिक रोगियों का संवेदनशील मुद्दा उठाया! जिला प्रशाशन और पुलिस पर यह आरोप लगा की ऐसे लोगों के बारें में जानकारी मिलने पर भी कोई कदम नहीं उठाया जाता! प्रशाशन व पुलिस दोनों ही अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते पाए गए ! संस्था ने एक प्रेस वार्ता में यंहा तक कहा की उपायुक्त और पुलिस अधीक्षकों ने संविधान के मानसिक शवस्थ्य अधिनियम, 1987 की जानकारी होने से इंकार कर दिया! ऐसे कई वाक्य हैं जहाँ जिला पुलिस को बेसहारा मनोरोगियों की जानकारी दी गयी है परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है!</p>
<p>इससे सड़कों पर भटकते बेसहारा मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो हो ही रहा है पर इसी के साथ यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है। प्रशानिक अधिकारी और पुलिस चाहे कुछ भी कहे लेकिन सच कुछ और ही है!</p>
<p>ये पहली बार का वाकया नहीं है! साल 2011 में सुभाष ने इसी मुद्दे को लेकर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (CWPIL 18/2011) दायर कर पहली बार मनोरोगियों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण का अहम् मुद्दा उठाया! सुभाष के जहन में ये बात पहली बार तब उठी जब उन्होंने एक मानसिक रूप से बीमार और बेसहारा वृद्धा को फटे कपड़ों में नाहन बाजार की सड़क पर घूमते देखा! जब सुभाष ने नजदीकी पुलिस चौकी में इसकी इत्तिला देकर इस वृद्धा की मदद की मांग की तो थाना प्रभारी ने ऐसे किसी भी प्रावधान के बारें में जानकारी होने से इंकार कर दिया व उस वृद्धा को बचाने में असमर्थता व्यक्त की!</p>
<p>सुभाष को इस बात पर विश्वाश नहीं हुआ की भारत के संविधान में कंही इन लाचार और अभागे नागरिकों के लिए कोई प्रावधान नहीं है! सुभाष ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत प्रशाशन से इन लोगों के बचाव पर पुलिस की भूमिका पर जानकारी मांगी! जवाब में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि मानसिक स्वस्थ्य अधिनियम 1987 के अध्याय 4, अनुभाग 23 के तहत कोई भी थाना प्रभारी ऐसे लोगों को अपनी सुरक्षा में लेकर न्यायालय में पेश कर सकता है व उसके बाद न्यायालय आगे की करवाई के आदेश दे सकता है !</p>
<p>जवाब पाते ही सुभाष ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्या न्यायाधीश को एक भावुक परंतु तथ्यों पर आधारित एक पत्र लिखा और कहा,</p>
<p><em><strong>हम हमेशा लोगों के कल्याण (welfare) की, विकास, नौकरीयों और जीने के लिए बेहतर वातवरण की मांग करते हैं ! सब अपनी मांगों को लेकर एक लंबी कतार में खड़े हैँ ! इन्ही सब लोगों के बीच जो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं कुछ ऐसे भी अभागे हैं जो अपने अधिकारों के लिए खुद नहीं लड़ सकते क्योंकि मानसिक रूप से वे इस काबिल ही नहीं के ये समझ सकें की मौलिक अधिकार क्या चीज़ है या &#8221; वेलफेयर&#8221; (welfare) का क्या अर्थ है !</strong></em></p>
<p><em><strong>हमे अक्सर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त ऐसे लोग सड़कों पर अमानवीय हालात में, कई बार अर्धनग्न अवस्था में, कूड़े से खाना ढूंढते और फुटपाथ पर सोते मिलते हैं जिनका कोई सहारा नहीं ! मैंने एसी ही एक वृद्धा के संरक्षण हेतु पुलिस के पास पहुंचा लेकिन पुलिस अधिकारी ने ऐसी किसी भी जिम्मेदारी होने की बात से इनकार किये जिसके तहत ऐसे मनोरोगियों को बचाया जा सके!</strong></em></p>
<p>इस याचिका में सुभाष ने न्यायालय से इन मनोरोगियों के लिए न्याय की मांग उठाई! इसी याचिका (CWPIL 18/2011) का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने 4 जून 2015 को अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अनुछेद 23 के पालन को सख्त निर्देश दिए!</p>
<p>कोर्ट ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को कहा कि अनुछेद 23 के अन्तर्गत हर पुलिस अधीक्षक का दायित्व होगा कि वह अपने ज़िले में बेसहारा, इधर-उधर घूमने वाले मनोरोगियों को अपने संरक्षण में लेकर 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करे। इसके बाद धारा 24 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट मनोरोगी व्यक्ति की चिकित्सा के सन्दर्भ में कानून के अनुसार आदेश जारी कर उपयुक्त कार्यवाही कर सकता है।</p>
<p>उच्च न्यायालय ने याचिका पर दिए गए निर्देशों में यह स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि,</p>
<p><em><strong>मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 (Mental Health Act,1987) क्लॉज़ (clause) 2 (l) के अंतर्गत मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति का मतलब है वह व्यक्ति जिसे किसी भी तरह के मानसिक रोग के कारण उपचार की जरुरत हो ! क्लॉज़ (clause) 2(q) के अंतर्गत मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति के इलाज व देखभाल के लिए मनोरोगी अस्पताल या नर्सिंग होम का प्रावधान है ! इन अस्पतालों का मतलब है कि जो या तो सरकार द्वारा बनाये गए हों और जिनके रखरखाव का जिम्मा भी सरकार का हो या ऐसा अस्पताल जो किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा मानसिक रोगियों के इलाज और देखभाल के लिये बनाया गया हो!</strong></em></p>
<p>यही मुद्दा साल 2017 में शिमला की एक गैर सरकारी संगठन, उमंग फाउंडेशन, द्वारा भी उठाया गया जिसमे स्नष्टा ने आरोप लगाया कि हिमाचल प्रदेश पुलिस सड़क पर बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के बारे में प्रदेश हाईकोर्ट के इस आदेश को नकारने में भी नहीं हिचकिचा रही !</p>
<p>सुभाष की याचिका पर दिए इस निर्देश के आधार पर संस्था प्रदेश के मुख्य सचिव वीसी फारका के पास पहुंची जिसे देखने के बाद विवश होकर मुख्य सचिव को यह आश्वाशन देना पड़ा कि राज्य सरकार संविधान, कानून और हाईकोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन करवाएगी। उन्होंने कहा की बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के संरक्षण, सुरक्षा, इलाज और पुनर्वास उनकी निजी प्राथमिकता रहेगा।</p>
<p><a href="http://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh.jpg" alt="mentally ill in Himachal Pradesh" width="650" height="495" class="alignnone size-full wp-image-10306" srcset="https://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh.jpg 650w, https://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh-300x228.jpg 300w, https://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh-80x60.jpg 80w, https://hindi.himachalwatcher.com/wp-content/uploads/2017/02/mentally-ill-in-Himachal-Pradesh-552x420.jpg 552w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></a></p>
<p>सुभाष ने इस बात पर ख़ुशी जाहिर कि है इस संस्था ने इस मुहीम को आगे बढ़ाया है और इन मानसिक रूप से लाचार लोगों के मौलिक अधिकारों कि सुरक्षा के लिए आवाज उठाई है! सुभाष की सभी नागरिकों से भी यही प्राथर्ना है कि जब भी लोग किसी सड़क पर भटकते या फुटपाथ पड़े मनोरोगी को देखें तो नज़दीकी पुलिस थाने में जाकर थाना प्रभारी को इसकी इत्तला देने से न कतरायें क्योंकि पुलिस कानूनी तौर पर ऐसे लोगों का संज्ञान लेने के लिए बाध्य है ! अगर कोई अधिकारी इंकार करे तो उन्हें सिर्फ इस याचिका पर दिए गए उच्च न्यायालय के आदेश कि एक प्रति देने कि जरूरत है ! साथ ही साथ सुभाष का यह भी कहना है कि जादू टोने और भूत प्रेत में फसे सभी लोगों को मनोचिकित्सा की जरूरत है! समय पर इलाज़ न मिलने पर रोगियों की हालात बिगड़ सकती है!  सुभाष का मनना है की वो इस अभियान को और आगे बढ़ाएंगे और ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आते रहेंगे!</p>
<p>उल्लेखनीय है की ऐसे मामलों में इलाज का पूरा खर्च सरकार उठाती है। ठीक होने के बाद मनोरोगी यदि अपने परिवार वालों का पता बताता है तो उसे सरकारी खर्चे पर उसके घर भेजने का भी कानूनी प्रावधान है। यदि ठीक होने के बाद वह किसी कारण से अपने घर नहीं लौट सकता है तो सरकार को उसके पुनर्वास केंद्र में रहने का प्रबंध करना पड़ता है।</p>
<p>संस्था का कहना है कि दुर्भाग्यवश हिमाचल में कुछ अपवादों को छोड़कर बेसहारा मनोरोगियों से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के प्रावधानों का पालन बिल्कुल नहीं किया जा रहा। संस्था ने कई जिला पुलिस अधीक्षकों को ऐसे मनोरोगियों की जानकारी दी, परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है। इससे इन बेसहारा मनोरोगियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है।</p>
<p>संस्था के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि न्यायालय के निर्देशों को देखने के बाद मुख्य सचिव ने आश्वासन दिया है की कानूनी प्रावधानों और न्यायालय के आदेशों का पूरी तरह पालन करने के निर्देश जारी किए जा रहे हैं। इनमें पुलिस विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को संबंधित कानूनों और अदालती फैसलों की जानकारी देना, आम जनता तथा विद्यार्थियों को मनोरोगियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना, पुलिस थाना स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से मनोरोगियों की पहचान करना एवं हर थाने में मनोरोगी से संबंधित मामलों को देखने के लिए एक अधिकारी को दायित्व देना शामिल है।</p>
<p>मानसिक स्वस्थ्य और इससे जुड़ी बिमारियों के बारें में लोगों में जागरूकता न होना बहुत बड़ी चिंता का विषय है! हाल ही में में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमे <a href="https://himachalwatcher.com/2017/02/03/miscreants-beat-mentally-ill-man-in-shimla-police-and-district-admin-allegedly-denied-rescue/">एक भटके हुए मानसिक रोगी को</a> जिला शिमला में कई जगह लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा और उनके लातों और घूंसों को भी सहन पड़ा! मानसकि रोगों के लक्षण लोगों को डरा सकते हैँ और मानसिक स्वस्थ्य के बारे में जागरूकता न होने के कारण ये रोगी लोगों की गलतफमी का शिकार हो सकते हैँ ! पर असल में एक सभ्य और लोकतान्त्रिक समाज में इस तरह के व्यव्हार से अमानवीय कुछ नहीं हो सकता जिसमे एक मानसिक रूप से लाचार इंसान को अज्ञानता के कारण लोगों का गुस्सा सहन पड़े!</p>
<p>The post <a href="https://hindi.himachalwatcher.com/2017/02/18/mental-health-activist-of-himachal-pradesh-subhash-kumar/">हिमाचल में बेसहारा भटकते मनोरोगियों के लिए इन्साफ की लड़ाई में प्रशासन और पुलिस कर रही हाई कोर्ट के आदेशों की अवमानना</a> appeared first on <a href="https://hindi.himachalwatcher.com">हिमाचल वॉचर</a>.</p>
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