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	<title>HP Government Schools Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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		<title>बख्‍शो जैसे खिलाड़ियों पर रहम खाए हिमाचल सरकार, आठ महीने हो गए अभी तक दाखिला नहीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[हिमाचल वॉचर]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Aug 2016 10:24:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>आठ महीने हो गए, उसे दाखिला नहीं मिला। अब सरकारी अफसर कह रहे हैं वह ट्रायल में फेल हो गई है। उन्हें लगता है गांव की एक गरीब लड़की बिना किसी ट्रेनिंग के जिंदगी भर हर रेस में अव्वल रहेगी। इसलिए उसका घर बैठना ही ठीक है। शिमला- हिमाचल में खेल विधेयक को लेकर खेल [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong style="line-height: 1.5;">आठ महीने हो गए, उसे दाखिला नहीं मिला। अब सरकारी अफसर कह रहे हैं वह ट्रायल में फेल हो गई है। उन्हें लगता है गांव की एक गरीब लड़की बिना किसी ट्रेनिंग के जिंदगी भर हर रेस में अव्वल रहेगी। इसलिए उसका घर बैठना ही ठीक है।</strong></p>
<p><strong style="line-height: 1.5;">शिमला-</strong><span style="line-height: 1.5;"> हिमाचल में खेल विधेयक को लेकर खेल जारी है। सरकार चाहती है कि वह जल्द से जल्द हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एचपीसीए) को अपने कब्जे में लेकर राज्य को खेल पर फोकस करे। राजभवन इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल कर बैठ गया है।</span></p>
<p>राज्य की चिर प्रतीक्षित खेल नीति सरकारी फाइलों में कैद है। खिलाड़ियों का कोई पुरसाहाल नहीं। बख्शो देवी आपको याद होगी जिसने ऊना जिले में नंगे पांव दौड़कर गोल्ड मेडल जीता था। सूबे का हर खेल प्रेमी उसके साथ खड़ा था। सरकार ने कहा था उसे स्पोर्ट्स हॉस्टल में दाखिला देंगे।</p>
<h3>विडियो देखें</h3>
<p><iframe src="https://www.youtube.com/embed/Fhetuqhp4Tc" width="700" height="400" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>आठ महीने हो गए, उसे दाखिला नहीं मिला। अब सरकारी अफसर कह रहे हैं वह ट्रायल में फेल हो गई है। उन्हें लगता है गांव की एक गरीब लड़की बिना किसी ट्रेनिंग के जिंदगी भर हर रेस में अव्वल रहेगी। इसलिए उसका घर बैठना ही ठीक है। आप समझ सकते हैं इस राज्य में खिलाड़ियों के लिए सरकार किस कद्र संवेदनहीन है।</p>
<p>ये भी पढ़ें: <a href="https://himachalwatcher.com/2015/12/29/baksho-collapses-on-racing-track-experiences-severe-pain-in-stomach/" target="_blank">पेट में गंभीर दर्द की वजह से बख्‍शो रेसिंग ट्रैक पर गिरी</a></p>
<p>खेल विधेयक एक अच्छी शुरुआत हो सकती थी, लेकिन अगर इसके पीछे गंदी राजनीति न होती। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एचपीसीए) के अकेले शो मैन हैं। इसके जरिए उन्होंने खेल की दुनिया में हिमाचल को एक नई पहचान दी।</p>
<p>इसके जरिये उन्हें भी खेल की दुनिया में एक पहचान मिली। आज वह बीसीसीआई के अध्यक्ष हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि इस स्टेडियम के जरिये वह क्रिकेट के सिरमौर बने। सरकार की यही दिक्कत है और यही आरोप भी कि अनुराग ने इसे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है।</p>
<p><strong>बख्‍शों पर अब ये है विभाग का तर्क</strong></p>
<p>अब उसका तर्क है कि वह ट्रायल में हार गई उसे कैसे दाखिला दें? खेल विभाग को लगता है ये उड़नपरी आसमान से बन कर आई है। वह हर बार जीतेगी। जबकि सच ये है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली इस लड़की के घर में दो वक्त का पौष्टिक खाना तक नसीब में नहीं।</p>
<h3>विडियो देखें</h3>
<p><iframe src="https://www.youtube.com/embed/gbGbH3RTdRA" width="700" height="400" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>बेवा मां है और छोटे भाई बहन। आज के इस प्रतियोगी युग में बिना ट्रेनिंग बिना संतुलित खुराक के अगर खेल विभाग समझता है कि कोई पीटी उषा बन जाएगी तो इसे नासमझी ही कहा जा सकता है। विभाग अगर जिला स्तर पर ही बख्शो की ट्रेनिंग का इंतजाम कर देता तो उसके पंखों को नई उड़ान मिल जाती। बख्शो को ईश्वर लंबी जिंदगी देगा लेकिन बतौर एक खिलाड़ी वह उम्मीद की रेस लगभग हार चुकी है।</p>
<p>अब सरकार की सारी ऊर्जा सिर्फ खेल विधेयक पर खर्च हो रही है। राज्यपाल ने इसे रोक रखा है। उनके पास तीन विकल्प हैं। वह विधेयक को अनुमति दे सकते हैं। दूसरा अनुमति न देकर उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं और तीसरा राष्ट्रपति की अनुमति के लिए उसे सुरक्षित रख सकते हैं। वह इसे सुरक्षित कब तक रख सकते हैं इसकी कोई समय सीमा संविधान में नहीं।</p>
<p>ये भी पढ़ें: <a href="https://himachalwatcher.com/2015/12/24/heart-melting-story-of-himachals-barefoot-athlete-who-ran-into-hearts-of-people/" target="_blank">नंगे पैर दौड़ने वाली धावक ने किया हिमाचल को चकित </a></p>
<p>और तो और राज्यपाल के बिल वापस भेजने की समय सीमा भी संविधान ने तय नहीं की है। अनुच्छेद 173 में सिर्फ इतना कहा गया है कि राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग करते हुए बिल को वापस भेज सकता है। संविधान के अनुच्छेद 200 के प्रथम उपबंध में जितना शीघ्र संभव हो सके वाक्य का जरूर प्रयोग किया गया है। लेकिन यह शब्दावली भी अस्पष्ट है।</p>
<p>क्योंकि जैसा कि संविधानविद हरि विष्णु कामद ने कहा &#8211; किसी को भी नहीं मालूम कि जितना शीघ्र संभव हो सके वाक्य का क्या अर्थ है। खैर ये कानूनी भाषा और कानूनी दांव पेच हैं। सच तो यह है कि सरकार बिल पर दस्तखत के लिए राजभवन को मजबूर नहीं कर सकती। कोर्ट भी इसमें सरकार की कोई मदद कर सकेगा कहना कठिन है। असल मुद्दा ये है कि सरकार को अब ये खेल बंद करना चाहिए।</p>
<p>जरूरत इस बात की है कि वह खेल और खिलाड़ियों के प्रति संवेदनशील हो। लेकिन दिक्कत ये है कि संवेदना के लिए कोई कानून नहीं लाया जा सकता। राजनेताओं और अफसरों की तरबियत (ग्रूमिंग)ऐसी होनी चाहिए कि वे इस पहलू पर स्वत: गौर करें। राजनीति से कुछ हासिल नहीं होगा। अखबार की अपनी सीमाएं हैं। एक चीनी कहावत है- आप घोड़े को नदी तक ले जा सकते हैं लेकिन उसे पानी पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।</p>
<p>File Photo</p>
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