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	<title>हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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		<title>कोरोना में इस्तेमाल किए जा रहे मास्क अब समुद्री जीव जंतुओं की ले रहे जान:डॉ. जिस्टू</title>
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		<dc:creator><![CDATA[हिमाचल वॉचर]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Mar 2022 13:51:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य खबरे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शिमला- कोरोना काल में इस्तेमाल किए जा रहे मास्क अब बड़े पैमाने पर समुद्री जीव जंतुओं जान ले रहे हैं। कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन का अभाव सभी जीव जंतुओं और मनुष्यों के लिए खतरा है। सड़कों से लेकर पहाड़ी नालों और नदियों में कचरा फेंकने के गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। यह बात उमंग फाउंडेशन [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिमला-</strong> कोरोना काल में इस्तेमाल किए जा रहे मास्क अब बड़े पैमाने पर समुद्री जीव जंतुओं जान ले रहे हैं। कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन का अभाव सभी जीव जंतुओं और मनुष्यों के लिए खतरा है। सड़कों से लेकर पहाड़ी नालों और नदियों में कचरा फेंकने के गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। </p>
<p>यह बात उमंग फाउंडेशन <em>&#8220;स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार और सामाजिक दायित्व&#8221; </em>विषय ने मानवाधिकार संरक्षण के 26वें साप्ताहिक वेबिनार में हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एचएफआरआई) में वैज्ञानिक वनस्पति-विज्ञानी डॉक्टर वनीत जिस्टू ने कही। </p>
<p>उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र के लिए अलग ढंग से नीतियां बनाने की जरूरत है। विकास के लिए पनबिजली परियोजनाएं एवं उद्योग जरूरी हैं। लेकिन उनसे पर्यावरण को नुकसान न हो, इसके लिए प्रभावी निगरानी तंत्र होना चाहिए। </p>
<p>डॉ. वनीत जिस्टू ने पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार द्वारा किए गए अनेक प्रावधानों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने  स्वच्छ पर्यावरण पर जोर देकर कहा कि स्वच्छ पर्यावरण एक प्रमुख मानवाधिकार है और इसे लागू कराने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार केंद्र सरकार की योजनाओं से पर्यावरण संरक्षण में मदद मिल रही है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है। हमारे वन और वनस्पतियां ग्लोबल वार्मिंग का असर कम करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में मनुष्य ने उन्हें सम्मान नहीं दिया। हमने कंक्रीट के जंगल बना दिए और हमारे जीवनदाता वनों को काटा जाता रहा, जबकि वनों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में झाड़ियों के  कम होने या समाप्त होने से धरती पर सभी प्रकार का जीवन समाप्त हो जाएगा। अनेक प्रकार की औषधियां सिर्फ हिमालय क्षेत्र में ही मिलती हैं जो समाप्त हो रही हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि हिमालय के ग्लेशियरों, नदियों और वनों से दुनिया की बहुत बड़ी आबादी का जीवन जुड़ा हुआ है।  उद्योगों के रासायनिक और शहरी प्लास्टिक कचरे से पहाड़ों को स्थाई नुकसान पहुंच रहा है। पनबिजली परियोजनाओं एवं अन्य उद्योगों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की सख्त निगरानी की जरूरत है। </p>
<p>डॉ. जिस्टू ने यह भी  बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल कट रहे हैं तो शहरी क्षेत्रों में हरे-भरे पार्क विकसित नहीं किए जाते। वनीकरण के नाम पर अक्सर विदेशी प्रजाति के पौधे लगाए जाते हैं जिन पर गिलहरी, पक्षी, कीट-पतंगे आदि भी अपना घर नहीं बनाते। जैव विविधता को बचाए रखना बहुत जरूरी है। </p>
<p>डॉ. वनीत जिस्टू ने कहा कि युवाओं में नई चेतना लाकर ही हम धरती को रहने लायक बना सकते हैं।</p>
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