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	<title>शिमला ग्रामीण विधानसभा Archives - हिमाचल वॉचर</title>
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	<description>एक सामाजिक जागृति</description>
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		<title>आगामी विधानसभा चुनाव के लिए  मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बेटे विक्रमादित्य का नाम शिमला ग्रामीण से किया प्रस्तावित</title>
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		<dc:creator><![CDATA[तरुण शर्मा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Jan 2017 05:43:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Featured]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिमला-</strong>  आखिरकार एक लंबे वक्त के बाद हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने पुत्र विक्रमादित्य सिंह के लिए आगामी विधानसभा चुनावों के लिए शिमला ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से  नए सम्भावित उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम  प्रस्तावित किया है। पिता द्वारा पुत्र का नाम  अपने  विधानसभा क्षेत्र से प्रस्तावित करने के बाद अब देखना यह है कि जब टिकट का बंटवारा होगा उस समय क्या विक्रमादित्य सिंह को शिमला ग्रामीण से टिकेट मिलेगा? (वैसे उस समय यह सब ओपचारिकता भर ही होगा) अगर ऐसा होता है तो इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आज़माते नज़र आएंगे। जैसे की इस देश में होता आया है पिता द्वारा पुत्र को अपनी विरासत देना।  </p>
<p>खैर चुनाव लड़ना ,जीतना ,हारना यह सब अलग बात है लेकिन भारत में परिवारवाद और वंशवाद वालो के लिए चुनाव लड़ना काफी मायने रखता है। लेकिन कुछ ऐसे भी राजनीतिज्ञ है  जो किसी भी राजनीती की पृष्ठभूमि से नहीं आते। हम प्राय देखते हैं कि चुनावो के समय में साधारण आदमी या आम आदमी का चुनाव लड़ना या उसे टिकट मिलना जैसी ख़बरें बहुत कम सुनने को मिलती है।   आम तौर पर देखें तो लोकतांत्रिक भारत देश में परिवारवाद और वंशवाद  परंपरा को तवज्जो दी जाती रही है।  </p>
<p>हिमाचल का राजनीतिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि हिमाचल भी परिवारवाद और वंशवाद से अछूता नहीं रहा है। हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार के पुत्र कुश परमार नाहन से विधायक रहे। वर्तमान  में जुब्बल कोटखाई के विधयाक हिमाचल के दूसरे मुख्यमंत्री ठाकुर राम लाल के पोते हैं। हमीरपुर से संसद और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में नेता विपक्ष प्रेमकुमार धूमल के सुपुत्र हैं।</p>
<p>इसी तरह से हिमाचल से कई ऐसे मंत्री व विधायक है तो अपने परिवार या वंशवाद के आधार पर राजनीती में आये हैं। यह कहना गलत नहीं हैं कि परिवार से पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीती में आना गलत है लेकिन अब परिवारवाद के सामने आम आदमी का राजनीती में आना  मुश्किल  सा हो गया है।  यह तो जनता,आम आदमी को ही चुनना है की उन्हें क्या पसंद है।   </p>
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